ईरान में 14 महीने की बच्ची के ताबूत का जिक्र करते हुए रिटायर्ड मेजर जनरल जीडी बख्शी भावुक हो गए। उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिका की आलोचना करते हुए कहा कि शोक के माहौल में ‘नाटक’ जैसी बयानबाजी करना बेहद शर्मनाक है। उन्होंने कहा कि बदतमीजी की भी हद होती है।

जीडी बख्शी ने कहा कि जब इजराइल और अमेरिका ने ईरान के खिलाफ अभियान शुरू किया था, तब यह दावा किया जा रहा था कि ईरानी जनता अपनी सरकार से नाराज है और कुछ ही समय में तख्तापलट हो जाएगा। लेकिन खामेनेई के जनाजे में लाखों लोगों की मौजूदगी ने इन दावों को पूरी तरह गलत साबित कर दिया। उनके मुताबिक, लोगों की भारी भीड़ ने यह दिखा दिया कि ईरान की जनता अपने देश, अपनी सभ्यता और अपने धार्मिक नेतृत्व के साथ मजबूती से खड़ी है।
ट्रंप की बयानबाजी पर साधा निशाना
बख्शी ने कहा कि जनाजे जैसे संवेदनशील मौके पर भी ट्रंप की ओर से धमकी भरे बयान देना बेहद आपत्तिजनक है। उन्होंने आरोप लगाया कि लगातार बमबारी और सैन्य दबाव के बावजूद अमेरिका अपने लक्ष्य हासिल नहीं कर सका। उनके अनुसार, ईरान की मिसाइल और ड्रोन निर्माण क्षमता अब भी बरकरार है और 40 दिन तक चले हमलों के बावजूद रणनीतिक बढ़त अमेरिका को नहीं मिल सकी। उन्होंने कहा कि किसी देश की जनता के शोक के बीच इस तरह की भाषा दुनिया को गलत संदेश देती है।
‘सिर्फ हवाई हमलों से सरकारें नहीं बदलतीं’
रिटायर्ड मेजर जनरल ने कहा कि सैन्य इतिहास बताता है कि केवल हवाई हमलों के दम पर किसी सरकार का तख्तापलट नहीं किया जा सकता। उन्होंने इराक युद्ध का उदाहरण देते हुए कहा कि जमीनी सेना के बिना सत्ता परिवर्तन संभव नहीं होता। उनका दावा था कि भौगोलिक दृष्टि से विशाल और पहाड़ी इलाकों वाले ईरान में किसी भी बड़े सैन्य अभियान के लिए बेहद बड़ी संख्या में सैनिकों की आवश्यकता होगी, जो अमेरिका के लिए आसान नहीं है।
तेल की कीमतों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी जताई चिंता
बख्शी ने कहा कि पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर डाल रहा है। उनके मुताबिक, यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी आ सकती है, जिससे वैश्विक महंगाई और आर्थिक संकट गहरा सकता है। उन्होंने कहा कि रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों पर दबाव बढ़ रहा है और इसका असर दुनिया के कई देशों पर दिखाई देगा।
‘ईरान नहीं झुका, जनता पहले से ज्यादा एकजुट हुई’
बख्शी ने कहा कि जनाजे के दौरान लगे नारे और उमड़ी भीड़ यह संदेश दे रही थी कि बाहरी दबाव के बावजूद ईरान की जनता पहले से अधिक एकजुट हुई है। उन्होंने दावा किया कि सैन्य और राजनीतिक दबाव के बावजूद ईरान की आंतरिक एकता कमजोर नहीं हुई, बल्कि और मजबूत हुई है। उनके अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी देश की जनता की इच्छाशक्ति को केवल सैन्य कार्रवाई से नहीं तोड़ा जा सकता।
