कांस्टेबल भर्ती ने दिखाया यूपी के पलायन का दर्द, कॉर्पोरेट पर भारी सरकार की सुरक्षित जॉब


सरकारी बनाम कॉर्पोरेट सुरक्षा

सरकारी बनाम कॉर्पोरेट सुरक्षा (Photo Credit: ETV Bharat)

लखनऊ: यूपी के पूर्वांचल और बुंदेलखंड के गांवों के जो युवा सालों पहले दिल्ली के कारखानों और मुंबई के ढाबों में दिहाड़ी करने के लिए निकल गए थे, वे अचानक परीक्षा केंद्रों पर लौट आए हैं. दिल्ली के आनंद विहार और मुंबई सेंट्रल से आने वाली ट्रेनों में पैर रखने की जगह नहीं बची है. यह रिवर्स माइग्रेशन है, जहां परदेस में जूझ रहा युवा अपनी जड़ों की तरफ लौटने के लिए कांस्टेबल की इस वर्दी को आखिरी लाइफलाइन मान रहा है. आखिर कॉर्पोरेट की नौकरी पर यह सरकारी सुरक्षित जॉब क्यों भारी पड़ रही है, चलिए आगे समझते हैं. अविनाश कुमार के संपादन के साथ संवाददाता प्रशांत मिश्रा की खास रिपोर्ट.

रेलवे स्टेशनों से लेकर परीक्षा केंद्रों तक भीड़: दरअसल, उत्तर प्रदेश पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा 2026 के दौरान रेलवे स्टेशनों, बस स्टैंडों और सड़कों सहित परीक्षा केंद्रों पर भारी भीड़ दिखाई दे रही थी. यह उत्तर प्रदेश सरकार के लिए 32 हजार से अधिक पदों पर भर्ती के लिए आए 28 लाख से अधिक आवेदनों की सुरक्षित परीक्षा कराने की चुनौती दे रही थी, लेकिन ये भीड़ में आए तमाम युवाओं के लिए घर वापसी का मौका था, जिसके लिए युवाओं ने दिल्ली, मुंबई, सूरत, अहमदाबाद, पुणे व नोएडा एनसीआर से कूच किया था.

कांस्टेबल भर्ती ने दिखाया यूपी के पलायन का दर्द (Video Credit: ETV Bharat)

घर वापसी का सुनहरा मौका बन गई: कांस्टेबल भर्ती कॉर्पोरेट सेक्टर में नौकरी कर उत्तर प्रदेश के युवाओं के लिए घर वापसी का सुनहरा मौका बन गई है. बड़ी संख्या में दूसरे राज्यों में नौकरी कर रहे प्रदेश के युवाओं ने यूपी पुलिस परीक्षा में हिस्सा लिया, भले ही उन्हें इसके लिए छुट्टी लेकर सैलरी कटवाने का दर्द क्यों ना झेलना पड़ा हो.

युवा क्यों चुन रहे हैं सरकारी नौकरी

युवा क्यों चुन रहे हैं सरकारी नौकरी (Photo Credit: ETV Bharat)

उम्मीद हुई कि घर में भी बेहतर नौकरी पा सकते हैं: परीक्षा में शामिल होने वाले इटौंजा थाना क्षेत्र के रहने वाले देवेश द्विवेदी ने बताया कि वह गुजरात में एक कंपनी में कैशियर की नौकरी करते हैं. उन्हें वहां पर 25 हजार रुपये सैलरी मिलती है. जब उन्हें यूपी में भर्ती परीक्षा के बारे में जानकारी मिली थी, तो उनके अंदर यह उम्मीद पैदा हुई थी कि वह अपने घर में भी बेहतर जॉब पा सकते हैं. इसीलिए उन्होंने कांस्टेबल भर्ती परीक्षा के लिए आवेदन किया था. उन्होंने लखनऊ पहुंचकर परीक्षा में हिस्सा लिया.

भर्ती के आंकड़े (2026)

भर्ती के आंकड़े (2026) (Photo Credit: ETV Bharat)

उन्होंने बताया कि नौकरी के लिए युवाओं को बाहर जाना पड़ता है. ऐसे में जब सरकारी नौकरी निकलती है तो हमें उम्मीद मिलती है कि हम घर वापसी कर सकते हैं. मैं छुट्टी लेकर परीक्षा देने आया था.

इसी तरह लखनऊ के अकिल खान ने बताया कि मैं पिछले 4 साल से हैदराबाद में एक कारखाने में काम कर रहा हूं. वहां पर मेरा काम सुपरवाइजर का है. मुझे सैलरी के तौर पर 30000 महीने मिलता है. अभी मेरी उम्र 25 साल है. ऐसे में मैं कांस्टेबल भर्ती परीक्षा देकर यूपी में ही नौकरी करना चाहता हूं, जिससे कि मैं अपने परिवार के साथ रह सकूं.

धीमे-धीमे उम्र हो रही है चार-पांच साल का मौका मेरे पास और है. अगर इस दौरान यूपी में कहीं अच्छी जगह नौकरी नहीं मिली तो मुझे जीवन भर बाहर ही नौकरी करनी पड़ेगी. अकिल का परिवार मोहिबुल्लापुर रेलवे स्टेशन के पास पल्टन छावनी में रहता है.

लखनऊ विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ इकनोमिक्स के प्रो हिलाल अहमद ने बताया, पूर्वांचल और बुंदेलखंड के जिलों से रोजगार की तलाश में युवा महानगरों को जाते हैं. आज भी बड़ी संख्या में युवा अपने रोजगार के अवसरों की तलाश कर रहे हैं.

भर्ती के आंकड़े (2023)

भर्ती के आंकड़े (2023) (Photo Credit: ETV Bharat)

उत्तर प्रदेश लंबे समय से ऐसे राज्यों की तरह है. जहां बड़ी संख्या में युवा रोजगार के लिए दूसरे राज्यों के लिए अस्थाई पलायन करते हैं. पूर्वांचल के कुछ जिले जैसे आजमगढ़, जौनपुर, मऊ, बलिया, गाजीपुर, व देवरिया से युवा रोजगार बड़ी सख्या में दिल्ली और मुंबई का रुख करते हैं. बुंदेलखंड के चित्रकूट, बांदा, महोबा, हमीरपुर से बड़ी संख्या में युवा गुजरात और महाराष्ट्र के औद्योगिक क्षेत्रों में नौकरी के लिए जाते हैं.

क्या कहते हैं जानकार: इकोनॉमी के अध्यापक कन्हैया पांडे ने बताया, उदारीकरण के 35 साल बाद भी आज सरकारी नौकरी के प्रति लोगों को मोह कम नहीं हुआ है. 32 हजार ज्यादा पदों पर 28 लाख से अधिक दावेदार यूपी मैं नौकरी की चाहत नहीं जरुरत को दर्शाता है. सवाल ये है कि इस युग को कॉपरेट युग कहा जाता है, फिर भी कॉस्टेबल जैसे पद जिस पर सैलरी की कुछ खास नही हैं.

पांडे ने बताया कि वर्ष 1991 में भारत ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीति को अपनाया गया, जिसके बाद ये उम्मीद थी कि निजी क्षेत्र के विस्तार के साथ ही सरकारी नौकरियों पर भारतियों की निर्भरता कम होती जाएगी.

सरकारी नौकरी को प्राथमिकता: भारत में आईटी सेक्टर, सर्विस इंडस्ट्री, स्टार्टअप और कॉर्पोरेट संस्कृति के बढ़ने से रोजगार के पर्याप्त अवसर होंगे, लेकिन 35 साल बाद भी उत्तर प्रदेश में कॉपरेट सेक्टर लोगों को सुरक्षित नौकरी देने में कामयाब नहीं हुआ है. लोग आज भी सामिजक सुरक्षा के लिए कम सैलरी पर भी सरकारी नौकरी को प्राथमिकता देते हैं. सुरक्षित भविष्य व स्थायुत्व के लिए यूपी का युवा निजी क्षेत्र की नौकरियों की अपेक्षा सरकारी नौकरी को अधिक स्थाई सुरक्षित व सम्मानजनक मानता है.

एक्सपर्टस का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश में कॉपरेट सेक्टर के लिए माहौल थोड़ा बेहतर हुआ है. बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश में निवेश पहुंचा है और उत्तर प्रदेश का इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत हुआ है. उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर, लखनऊ, वाराणसी जैसे शहरों में कॉरपोरेट सेक्टर में नौकरियां बढ़ी है, जिनमें लोगों को रोजगार मिल भी रहा है.

कॉपरेट सेक्टर में नौकरियां है, उससे कई गुना ज्यादा अनुपात में उत्तर प्रदेश में युवाओं की जनसंख्या है. ऐसे में कारपोरेट सेक्टर से युवाओं को नौकरी दे पाना संभव नहीं. इसके विपरीत यदि कॉरपोरेट सेक्टर में पर्याप्त मात्रा में नौकरियां हो भी दी जाएं, तो तब भी उत्तर प्रदेश की युवाओं की पहली पसंद सरकारी नौकरी रहेगी. क्योंकि, सरकारी नौकरी में स्थायित्व होता है. ऐसे में युवा कम सैलरी पर भी सरकारी विभागों में नौकरी करना पसंद करते हैं.
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