जापान में जन्म, भारत बना कर्मभूमि: गांधी और बुद्ध के संदेश देने वाली 88 वर्षीय कात्सु सान की प्रेरक कहानी


शांति, सद्भाव समर्पण की जीती-जागती मिसाल कात्सु होरी उची

शांति, सद्भाव समर्पण की जीती-जागती मिसाल कात्सु होरी उची (ETV Bharat)

नई दिल्ली: जब इरादों में इंसानियत की सेवा का संकल्प हो और दिल में विश्व शांति की तड़प तो सरहदें भी छोटी पड़ जाती हैं. जापान की धरती पर जन्मीं और पिछले 68 वर्षों से भारत को अपनी कर्मभूमि बनाकर बैठी 88 वर्षीय कात्सु होरी उची (कात्सु सान) इसका एक जीवंत उदाहरण हैं. कात्सु सान का जीवन केवल दो देशों के बीच के सांस्कृतिक संबंधों की कहानी नहीं है, बल्कि ये बुद्ध की करुणा और महात्मा गांधी के सत्य-अहिंसा के सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारने की एक अद्भुत साधना है.

असफलता के बाद बदला जीने का रास्ता: 28 अगस्त 1938 को जापान में जन्मीं कात्सु सान के दो बड़े भाई और एक छोटी बहन थी. युवावस्था में वह एक फिजिकल डॉक्टर बनना चाहती थीं, जिससे लोगों के शारीरिक दुखों को दूर कर सकें, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. वह प्रवेश परीक्षा में सफल नहीं हो सकीं. इस असफलता से निराश होने के बजाय उन्होंने अपने गुरु फूजी गुरुजी के मार्गदर्शन को स्वीकार किया. गुरुजी ने उन्हें मन का चिकित्सक बनने की सलाह दी—एक ऐसा डॉक्टर जो इंसानी रूह व समाज के जख्मों पर मरहम लगा सके.यही वह मोड़ था जिसने कात्सु सान के जीवन की दिशा हमेशा के लिए बदल दी.

88 वर्षीय कात्सु सान की प्रेरक कहानी (ETV Bharat)

भारत आगमन और अध्यात्म से जुड़ाव: वर्ष 1958 में इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिलेशंस (ICCR) के एक सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम के तहत उन्हें हिंदी सीखने के लिए भारत आने का अवसर मिला. वह महज 3 साल के लिए भारत आई थीं, जिसे बाद में 1 साल के लिए और बढ़ा दिया गया. लेकिन भारत की मिट्टी, यहां की संस्कृति व अध्यात्म ने उन पर ऐसा जादू किया कि वह यहीं की होकर रह गईं. वर्ष 1986 से तो वह लगातार भारत में ही रह रही हैं. इससे पहले वह भारत आती- जाती रहीं. वर्ष 2001 से भारत सरकार ने उन्हें भारत की नागरिकता दे दी और वह अब भारत की नागरिक भी हैं. उन्होंने कहा कि भारत का नागरिक होना उनके लिए एक गर्व की बात है. कात्सु सान कहती हैं कि जब मैं पहली बार भारत आई थी, तो मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे इस देश से इतना लगाव हो जाएगा. भगवान बुद्ध को और गहराई से जानने की चाह ने मुझे यहीं रोक लिया. मैं भारत का शुक्रिया अदा करती हूं कि मुझे बुद्ध व गांधी की इस पावन धरती पर शरण मिली.

कात्सु होरी उची का जीवन परिचय

कात्सु होरी उची का जीवन परिचय (ETV Bharat)

21 साल तक गलियों में गूंजा शांति का महामंत्र: कात्सु सान ने विश्व शांति के संकल्प को पूरा करने के लिए दिल्ली की सड़कों व गलियों में घूम-घूमकर लगातार 21 वर्षों तक बौद्ध धर्म के महामंत्र का जाप किया. इस दौरान वह राजघाट के पास स्थित ‘गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा’ में रहीं. दशकों तक नियम से राजघाट जाकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि पर दीप प्रज्वलित करती रहीं. आज 88 वर्ष की उम्र में भी, जब शरीर पहले जैसा साथ नहीं देता, उनका जज्बा कम नहीं हुआ है. वह अक्सर पूर्णिमा को राजघाट जाकर बापू को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करना नहीं भूलतीं हैं.

इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म-कात्सु होरी उची

इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म-कात्सु होरी उची (ETV Bharat)

इंद्रप्रस्थ पार्क में ‘विश्व शांति स्तूप’ दे रहा शान्ति का संदेश: उनके गुरु महात्मा गांधी के विचारों से बेहद प्रभावित थे. भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने बापू का समर्थन भी किया था. अपने गुरु की इच्छा को पूरा करने के लिए कात्सु सान ने साल 2003 में दिल्ली के इंद्रप्रस्थ पार्क में ‘विश्व शांति स्तूप’ के निर्माण की नींव रखी. साल 2007 में यह भव्य स्तूप बनकर तैयार हुआ. वर्ष 2003 से ही वह इसी स्तूप परिसर में रहकर मानवता की सेवा कर रही हैं.

कात्सु होरी उची को लेकर जानिए कुछ खास बातें

कात्सु होरी उची को लेकर जानिए कुछ खास बातें (ETV Bharat)

हाल ही में 1 से 3 जुलाई (2026) तक जापान की प्रधानमंत्री सानाए तकाइची भारत दौरे पर थीं. व्यस्तता के कारण वह कात्सु सान से नहीं मिल सकीं. इस पर बिना किसी शिकायत के कात्सु सान ने बड़े ही ऊंचे विचार व्यक्त किए. उन्होंने कहा कि,

वह देश की प्रधानमंत्री हैं, उन पर भारत-जापान को आगे ले जाने की बड़ी जिम्मेदारी है. मुझे कोई मलाल नहीं है. हमारा लक्ष्य केवल यह होना चाहिए कि दोनों देश तरक्की करें और विश्व में शांति बनी रहे.

“भारत के पास है दुनिया का खजाना, बस जागने की जरूरत है”: कात्सु सान भारत को दुनिया का सबसे सर्वश्रेष्ठ देश मानती हैं. उनका कहना है कि भारत व जापान का रिश्ता ‘सूर्य और चंद्रमा’ जैसा है, जो एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं. वह गर्व से कहती हैं कि भारत से ही बौद्ध धर्म जापान गया, जिसकी बदौलत आज जापान इस ऊंचाई पर है. युवाओं और देशवासियों को प्रेरित करते हुए वह कहती हैं कि भारत में पूरी दुनिया का खजाना है, चाहे वह इतिहास हो या दर्शन. यहां किसी चीज की कमी नहीं है. कमी है तो बस जागरूकता की. लोग जो भी काम करें, पूरी निष्ठा व लगन से करें.

विश्व शांति के लिए दोष मढ़ने की प्रवृत्ति खत्म करनी होगी -कात्सु होरी उची

विश्व शांति के लिए दोष मढ़ने की प्रवृत्ति खत्म करनी होगी -कात्सु होरी उची (ETV Bharat)

विश्व शांति के लिए दोष मढ़ने की प्रवृत्ति खत्म करनी होगी : विश्व शांति के लिए दूसरों की गलतियों पर उंगली उठाना बंद करना होगा. कमियों को सुधारें, क्योंकि दोष मढ़ने से सिर्फ युद्ध व तनाव की स्थिति पैदा होती है. उन्होंने कहा कि सच्चा धर्म वही है जो इंसानियत सिखाए. दूसरों के दुखों का निवारण कर उन्हें आनंद प्रदान करना ही जीवन का असली उद्देश्य होना चाहिए. अगर भारत के लोग इस दिशा में काम करेंगे, तो भारत को ‘विश्व गुरु’ बनने से कोई नहीं रोक सकता है.

कात्सु होरी उची के समाजिक और अध्यात्मिक कार्य

कात्सु होरी उची के समाजिक और अध्यात्मिक कार्य (ETV Bharat)

कात्सु सान आज के दौर के लिए बड़ी प्रेरणा :88 वर्ष की आयु में भी चेहरे पर वही पुरानी सौम्य मुस्कान व आंखों में विश्व शांति की चमक लिए कात्सु सान आज की इस भागदौड़ भरी, तनावग्रस्त दुनिया के लिए एक बहुत बड़ी प्रेरणा हैं. उनका जीवन हमें सिखाता है कि राष्ट्र की सीमाएं सिर्फ नक्शों पर होती हैं, दिल तो पूरी वसुधा को ही अपना कुटुंब (वसुधैव कुटुंबकम) मान लेता है. कात्सु सान का समर्पण आने वाली कई पीढ़ियों को मानवता, शांति व निस्वार्थ सेवा की राह दिखाता रहेगा.

शांति, सद्भाव समर्पण की जीती-जागती मिसाल कात्सु होरी उची

शांति, सद्भाव समर्पण की जीती-जागती मिसाल कात्सु होरी उची (ETV Bharat)

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