नई दिल्ली. संजय मांजरेकर को कभी भारतीय क्रिकेट में सुनील गावस्कर का असली उत्तराधिकारी माना जाता था. क्रिकेट उन्हें विरासत में मिला था. उनके पिता विजय मांजरेकर उस दौर के दिग्गज बल्लेबाज थे, जब भारतीय क्रिकेट अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने पैर जमाने के लिए संघर्ष कर रहा था. हालांकि, नियति का खेल देखिए कि जब सीनियर मांजरेकर का निधन हुआ, तब संजय महज 18 साल के थे. उस वक्त तक उन्होंने रणजी ट्रॉफी में अपना डेब्यू भी नहीं किया था. इसके बावजूद, विजय मांजरेकर को हमेशा से यह गहरा भरोसा था कि उनका बेटा एक दिन न सिर्फ क्रिकेट खेलेगा, बल्कि टीम इंडिया की जर्सी भी पहनेगा.
संजय मांजरेकर को कभी अगला सुनील गावस्कर कहा जाता था.
संजय मांजरेकर (Sanjay Manjrekar) जब तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेले, उनकी पहचान एक तकनीकी रूप से बेहद सक्षम और ठोस बल्लेबाज के तौर पर रही. विशेष रूप से विदेशी पिचों पर उनका रिकॉर्ड बेहद शानदार और अनुकरणीय रहा. उनकी इसी लाजवाब और परफेक्ट बल्लेबाजी तकनीक के कारण साथी खिलाड़ी उन्हें कई बार ‘मिस्टर परफेक्ट’ कहकर बुलाते थे. हालांकि, क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर का नजरिया थोड़ा अलग था. सचिन उन्हें ‘मिस्टर परफेक्ट’ नहीं, बल्कि ‘मिस्टार डिफरेंट’ नाम से बुलाते थे, जो उनके अनूठे व्यक्तित्व को दर्शाता था.
संजय मांजरेकर को कभी अगला सुनील गावस्कर कहा जाता था.
करियर का असमय अंत
इतनी काबिलियत के बावजूद, संजय मांजरेकर अपने करियर में वह ऐतिहासिक बुलंदी हासिल नहीं कर पाए, जिसकी उम्मीद समकालीन क्रिकेट जगत और प्रशंसकों ने उनसे लगा रखी थी. उनके करियर का ग्राफ उम्मीद के मुताबिक लंबा नहीं खिंच सका. इस असमय अंत के पीछे की चौंकाने वाली वजह खुद संजय मांजरेकर ने सालों बाद दुनिया के सामने रखी. साल 2018 में लॉन्च हुई अपनी आत्मकथा ‘इंपर्फेक्ट’ में उन्होंने खुलकर कई बड़े खुलासे किए. मांजरेकर ने साफ तौर पर स्वीकार किया कि राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली के भारतीय क्रिकेट क्षितिज पर उदय की वजह से उनका अंतरराष्ट्रीय करियर जल्दी खत्म हो गया.
1996 का इंग्लैंड दौरा और ‘समय पूरा’ होने का अहसास
मांजरेकर ने अपनी किताब में लिखा कि जब उन्होंने खेल को अलविदा कहने का मन बनाया, तब वे टीम के एक महत्वपूर्ण बल्लेबाज थे और आउट ऑफ फॉर्म तो बिल्कुल भी नहीं थे. लेकिन 1996 के ऐतिहासिक इंग्लैंड दौरे ने उनके सोचने का जरिया पूरी तरह बदल दिया. उस दौरे पर राहुल द्रविड़ से तो हर किसी को उम्मीदें थीं कि वे शानदार प्रदर्शन करेंगे, लेकिन सौरव गांगुली का प्रदर्शन सबके लिए एक बड़ा और सुखद सरप्राइज बनकर सामने आया.
संजय ने अपनी आत्मकथा में बेहद ईमानदारी से लिखा कि राहुल द्रविड़ को देखकर ऐसा लगता था कि वे सीधे टीम इंडिया के लिए ही बने हैं. जिस तरह से द्रविड़ और गांगुली ने इंग्लैंड की परिस्थितियों में बल्लेबाजी की, उसे देखकर संजय समझ चुके थे कि अब उनका ‘समय पूरा’ हो चुका है और युवाओं के लिए रास्ता छोड़ना ही बेहतर होगा. संन्यास लेने के बाद, मांजरेकर ने खुद को समेटने के बजाय कमेंट्री बॉक्स का रुख किया और बतौर बेबाक कमेंटेटर दुनिया भर में अपनी एक बिल्कुल अलग और मजबूत पहचान बनाई.
सचिन तेंदुलकर की आलोचना और प्लेइंग-11 का विवाद
संजय मांजरेकर अपनी इसी बेबाकी के लिए जाने जाते हैं और अपनी किताब में उन्होंने सचिन तेंदुलकर की आलोचना करने से भी गुरेज नहीं किया. हालांकि, उन्होंने अपनी बात बेहद संतुलित और मीठे शब्दों में रखी. मांजरेकर ने लिखा कि जब सचिन अपने करियर के अंतिम पड़ाव से गुजर रहे थे, तब कई बार उनकी वजह से टीम में कुछ गलत चीजें घट रही थीं. यह वह दौर था जब सचिन बेहद खराब फॉर्म से जूझ रहे थे, लेकिन महज एक बेहद प्रतिष्ठित और महान खिलाड़ी होने की वजह से, तत्कालीन चयनकर्ताओं या प्रबंधन में से किसी में भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि उन्हें प्लेइंग-11 से बाहर का रास्ता दिखा सके. मांजरेकर का मानना था कि खराब फॉर्म में रहते हुए भी किसी खिलाड़ी का लगातार टीम में बने रहना, बाहर बैठे दूसरे प्रतिभाशाली युवाओं के साथ एक क्रूर मजाक जैसा था.