नई दिल्ली (Surplus Government Employees Reallocation). जब कोई सरकारी विभाग बंद होता है या डिजिटल हो जाता है तो वहां अलग तरह की समस्या होती है. काम खत्म होने से वहां के एंप्लॉइज को ‘सरप्लस’ यानी जरूरत से ज्यादा घोषित कर दिया जाता है. नियम के मुताबिक, इन कर्मचारियों को नौकरी से निकाला नहीं जाता, बल्कि इन्हें ‘सरप्लस पूल’ में डाल दिया जाता है. वहां से इन्हें दूसरे विभागों में खाली पदों पर भेजा जाता है. सुनने में यह प्रक्रिया बेहद आसान लगती है, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है.
Surplus Government Employees Reallocation कोई सरकारी विभाग खत्म होने पर कर्मचारियों को शिफ्ट करना आसान नहीं है फोटो सोर्स istockphoto.com
सरकारी सिस्टम की धीमी स्पीड के कारण री-एलोकेशन की प्रक्रिया में कई बार सालों लग जाते हैं. इस लंबे इंतजार के दौरान इन कर्मचारियों का रोजाना बस एक ही काम होता है- ऑफिस जाना, हाजिरी लगाना और वापस घर आ जाना. कोई भी काम किए बिना हर महीने इनके खाते में पूरी सैलरी आ जाती है. बाहर से देखने वालों को भले ही यह ‘बिना काम के दाम’ वाली लॉटरी लग सकती है. लेकिन असल में यह कर्मचारियों की मानसिक स्थिति और देश के खजाने, दोनों को अंदर ही अंदर खोखला कर रही है.
कुर्सी है, सैलरी है, बस काम गायब है!
सरप्लस पूल में शामिल होने के बाद कर्मचारियों की जिंदगी अजीब से ठहराव पर आ जाती है. सुबह उठकर तैयार होना, समय पर ऑफिस पहुंचना और शाम को घर लौट आना.. यह रूटीन तो बना रहता है, लेकिन उनकी टेबल पर काम कुछ नहीं होता. जो एंप्लॉई सालों से एक्टिव रहकर फाइलें निपटा रहे थे, वे अचानक खुद को बिल्कुल बेकार महसूस करने लगते हैं. यह स्थिति किसी भी आत्मसम्मान वाले इंसान के लिए बेहद असहज करने वाली होती है.
मानसिक सेहत पर पड़ता है असर
बिना काम के खाली बैठने से इंसान का दिमाग बीमार होने लगता है. सरप्लस कर्मचारियों में हीनभावना पनपने लगती है. उन्हें लगता है कि सिस्टम के लिए अब उनकी कोई वैल्यू नहीं बची है. ऑफिस में दूसरे काम करने वाले सहकर्मियों का नजरिया भी इनके प्रति बदल जाता है. इससे इन्हें अक्सर ताने या उपेक्षा झेलनी पड़ती है. इसका असर उनकी मेंटल हेल्थ पर पड़ता है. वे डिप्रेशन, भयंकर एंग्जायटी और नींद न आने जैसी समस्याओं का शिकार होने लगते हैं. जो नौकरी उनके गर्व का कारण थी, वही मानसिक बोझ बन जाती है.
सरकारी खजाने पर करोड़ों का चटका
एक तरफ एंप्लॉई मानसिक तनाव से गुजर रहे होते हैं तो दूसरी तरफ देश के टैक्सपेयर्स का पैसा पानी की तरह बह रहा होता है. बिना किसी प्रोडक्टिविटी या आउटपुट के, हर महीने इन कर्मचारियों को करोड़ों रुपये की सैलरी और भत्ते दिए जाते हैं. यह सरकारी खजाने का नुकसान है. जिन रुपयों का इस्तेमाल विकास कार्यों या नई नौकरियां बढ़ाने में हो सकता था, वह सिर्फ प्रशासनिक ढिलाई और सुस्त फाइल्स की वजह से एक जगह ब्लॉक होकर रह जाता है.
री-एलोकेशन की प्रक्रिया इतनी सुस्त क्यों?
सवाल उठता है कि आखिर इस ट्रांसफर या री-एलोकेशन में सालों क्यों लग जाते हैं? दरअसल, इसके पीछे अलग-अलग विभागों के बीच तालमेल की भारी कमी है. एक विभाग से दूसरे विभाग में ट्रांसफर के लिए कई तरह की कानूनी और प्रशासनिक फॉर्मेलिटी होती हैं. इसके अलावा, स्किल मैचिंग (यानी पुराने एंप्लॉई की योग्यता नए विभाग के काम के लायक है या नहीं) को परखने और उन्हें जरूरी ट्रेनिंग देने में भी लंबा वक्त बर्बाद हो जाता है.
इसका सही समाधान क्या है?
इस डबल नुकसान से बचने के लिए सरकार को फास्ट-ट्रैक डिजिटल री-एलोकेशन सिस्टम बनाना होगा. जैसे ही कोई विभाग बंद या डिजिटल हो, अधिकतम तीन महीने के अंदर एंप्लॉइज की स्किल मैपिंग कर उन्हें नए विभागों में भेज दिया जाना चाहिए. खाली समय में उनके लिए री-स्किलिंग (नई तकनीक सीखना) के क्रैश कोर्स चलाए जाने चाहिए, जिससे वे खाली बैठकर डिप्रेशन का शिकार न हों और सरकारी खजाने का पैसा भी सही जगह इस्तेमाल हो सके.
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