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Compassionate Demotion In Government Jobs: प्रमोशन की दौड़ के बीच सरकारी नौकरी में ऐसा अनोखा नियम है, जहां एंप्लॉई खुद आगे बढ़कर अपने लिए डिमोशन मांगते हैं. भारी-भरकम सैलरी और हाई-फाई रुतबा छोड़कर छोटे पद पर आने की इस मजबूरी के पीछे सेहत का बिगड़ना है या पारिवारिक दबाव? जानिए कम्पैशनैट डिमोशन से जुड़ी हर डिटेल.
Compassionate Demotion Rules: कंपैशनेट डिमोशन में सैलरी को लेकर समस्या आती है
नई दिल्ली (Compassionate Demotion In Government Jobs). आमतौर पर नौकरीपेशा दुनिया में हर कोई प्रमोशन के पीछे भागता है. सभी चाहते हैं कि उनका पद बड़ा हो और सैलरी भारी-भरकम. लेकिन सरकारी तंत्र में एक ऐसा भी नियम है, जहां एंप्लॉई खुद आगे बढ़कर अपने लिए डिमोशन की मांग करता है. इसे प्रशासनिक भाषा में ‘कम्पैशनैट डिमोशन’ या ‘अनुकंपा पदावनति’ कहा जाता है. सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन कई बार जिंदगी और परिस्थितियों से हारकर यह कदम उठाना पड़ता है.
कम्पैशनैट डिमोशन की जरूरत क्यों पड़ती है?
ऊंचे पदों पर जिम्मेदारी और काम का दबाव बहुत ज्यादा होता है. कई बार उम्र बढ़ने के साथ या किसी गंभीर बीमारी (जैसे पैरालिसिस, हार्ट की बीमारी या रीढ़ की हड्डी की समस्या) के कारण कर्मचारी उस बड़े पद के साथ न्याय नहीं कर पाते. कई बार अधिकारियों को लगातार फील्ड ड्यूटी या दौरों पर जाना पड़ता है, जो खराब सेहत में मुमकिन नहीं होता. ऐसे में नौकरी गंवाने या बार-बार मेडिकल लीव लेने के बजाय एंप्लॉई किसी डेस्क जॉब या कम जिम्मेदारी वाले निचले पद पर आना बेहतर समझते हैं.
सामाजिक और पारिवारिक दबाव भी है वजह
सिर्फ सेहत ही नहीं, कई बार घरेलू परिस्थितियां भी इसके लिए जिम्मेदार होती हैं. मान लीजिए किसी कर्मचारी के घर में बुजुर्ग माता-पिता बहुत बीमार हैं या बच्चे को विशेष देखभाल की जरूरत है. बड़े पद पर रहते हुए ट्रांसफर का डर बना रहता है. ऐसे में कर्मचारी अपने होम टाउन या मनचाही जगह पर टिके रहने के लिए स्वेच्छा से डिमोशन ले लेते हैं. समाज में भले ही इसे ‘पदावनति’ या पीछे हटना कहा जाए, लेकिन एक परिवार को बिखरने से बचाने के लिए यह बेहद प्रैक्टिकल फैसला होता है.
यह ऑप्शन किन विभागों में मिलता है?
यह ऑप्शन मुख्य रूप से केंद्रीय सेवा (Central Government Jobs), राज्य सरकार (State Government), रेलवे, बैंकिंग सेक्टर और सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) में मिलती है. सिविल सेवा मैनुअल (जैसे फंडामेंटल रूल्स या FR 15) के तहत अगर कोई कर्मचारी लिखित में आवेदन देता है कि वह अपने मौजूदा पद की जिम्मेदारियां संभालने में असमर्थ है तो सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) उसकी अर्जी पर विचार करता है. बशर्ते, उस निचले कैडर में पद खाली हो और कर्मचारी उसके लिए क्वॉलिफाइड भी हो.
ऐसे मामले में सैलरी का क्या होता है?
अनुकंपा पदावनति यानी कम्पैशनैट डिमोशन की सबसे बड़ी दिक्कत सैलरी और सीनियरिटी पर फंसती है. जब कोई खुद डिमोशन मांगता है तो उसकी सीनियरिटी उस नए कैडर में सबसे नीचे चली जाती है. वह अपने से जूनियर रहे लोगों से भी पीछे हो जाता है. सरकार उसका बेसिक पे प्रोटेक्ट करने की कोशिश करती है. लेकिन वह उस निचले पद के अधिकतम पे-स्केल से ज्यादा नहीं हो सकता. इसके अलावा, एक बार डिमोशन मंजूर होने के बाद कर्मचारी दोबारा आसानी से पुराने पद पर वापस जाने का दावा नहीं कर सकता.
विभाग पूरी मेडिकल जांच और वाजिब वजहें देखने के बाद ही इसे मंजूरी देता है, जिससे इस नियम का कोई गलत फायदा न उठा सके.
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Deepali Porwal is a seasoned bilingual journalist with 11 years of experience in the media industry. She currently works with News18 Hindi, focusing on the Education and Career desk. She is kno…और पढ़ें