नई दिल्ली. ‘बैज़बॉल’ एक ऐसी रणनीति जो हाल के समय में इसके आसपास बना माहौल किसी उन्माद से कम नहीं रहा है. ऐसा लगने लगा था कि मैच की परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, इंग्लैंड अगर बल्ले और गेंद दोनों से आक्रामक खेल दिखाए, तो वह विरोधी टीम को आसानी से उड़ा देगा. कई लोगों का मानना था कि यह तरीका परिस्थितियों से परे है. 2025 में लीड्स में भारत के खिलाफ पहले टेस्ट में मिली जीत ने इस नैरेटिव को और मजबूती दी और ‘बैज़बॉल’ का कद और बढ़ा दिया.
मैकुलम की कहानी से भारत और टीम के कोच गौतम गंभीर के लिए सबक है
लेकिन क्या इसने खिलाड़ियों को जरूरत से ज्यादा बेपरवाह बना दिया? क्या इस आक्रामकता और लापरवाही के बीच की रेखा बहुत पतली नहीं है? उदाहरण के तौर पर, दूसरे टेस्ट में एजबेस्टन की सपाट पिच पर भारत को पहले बल्लेबाजी के लिए आमंत्रित करना महज दुस्साहस ही कहा जा सकता है. वहीं, बर्मिंघम में दूसरे दिन की शाम को बड़े शॉट खेलने की कोशिश करना जोखिम भरा था, और जब क्वालिटी बल्लेबाज भी ऐसा करने लगे, तो यह तर्क से परे नजर आया. मैक्कुलम का बोरिया बिस्तर बंधना कहीं ना कहीं भारतीय कप्तान के लिए एक संदेश की तरह है और समय रहते प्लान बी पर भी काम करने की जरूरत है.
भारतीय टीम ने लिखा मैक्कुलम के अंत का इंट्रो
बर्मिंघम टेस्ट से पहले, पिछले साल के भारत के खिलाफ दूसरे टेस्ट की याद ताजा हो गई थी और यह सवाल उठने लगा था कि क्या वही ब्रेंडन मैकुलम के पतन की शुरुआत थी, जिन्हें रविवार को इंग्लैंड के टेस्ट कोच पद से हटा दिया गया. अगर बर्मिंघम टेस्ट के किसी एक पल को टर्निंग पॉइंट कहा जाए, तो वह जो रूट का आकाश दीप की शानदार गेंद पर आउट होना था. अगर रूट टिके रहते, तो शायद इंग्लैंड मैच नहीं हारता. लेकिन उनके आउट होने के बाद आसपास के बल्लेबाजों ने वही जोखिम भरे शॉट खेलना जारी रखा. यही वजह है कि ‘बैज़बॉल’ पर सवाल उठना जरूरी हो गया था. अगर इसमें लचीलापन और समझदारी के लिए जगह नहीं है, तो यह लंबे समय तक सफल नहीं हो सकता. जिद से झूठी आक्रामकता तो पैदा हो सकती है, लेकिन यह सालों तक जीत दिलाने वाला फॉर्मूला नहीं बन सकती.
कप्तान ने ठोंकी ताबूत में आखिरी कील
मैकुलम के नेतृत्व में इंग्लैंड कभी यह स्वीकार करता नजर नहीं आया कि ‘बैज़बॉल’ हर बार काम नहीं करेगा. यह कुछ मौकों पर सफल हो सकता है, लेकिन ऐसी परिस्थितियां भी आएंगी जहां धैर्य और टिककर खेलने की जरूरत होगी. विपक्षी टीमों को, सच कहें तो, ‘बैज़बॉल’ से कोई परेशानी नहीं थी. बल्कि वे इसका स्वागत करती थीं उन्हें पता था कि अगर वे कुछ ओवर तक इंग्लैंड को शांत रख सकें, तो एक गलत शॉट जरूर निकलेगा. इंग्लैंड की मानसिकता ही ऐसी थी कि वह अपना तरीका बदलने को तैयार नहीं था. क्या ‘बैज़बॉल’ के पास कोई बैकअप प्लान था? क्या मैकुलम के दौर में इंग्लैंड किसी और तरीके से खेलना जानता था? सच तो यह है कि मैकुलम ने अपने खिलाड़ियों को ढलने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया, और यही बात अंततः उनके खिलाफ गई. शायद यह सिर्फ समय की बात थी न्यूजीलैंड के खिलाफ आखिरी टेस्ट जिस तरह से खत्म हुआ, वह कई मायनों में खेल के साथ न्याय नहीं था. बेन स्टोक्स का खुद को ओपनिंग के लिए प्रमोट करना गैरजरूरी था. वह कितने भी अच्छे खिलाड़ी क्यों न हों, उन्हें ऐसा करने देना एक अजीब फैसला था. यही शायद आखिरी कील साबित हुई.
गंभीर और भारतीय क्रिकेट के लिए सबक
मैकुलम की कहानी से भारत के लिए भी एक सबक है. यह एकतरफा सोच के खतरों को उजागर करता है और यह बताता है कि हर टीम के पास ‘प्लान बी’ होना जरूरी है. भारत पहले ही देख चुका है कि इंग्लैंड की परिस्थितियों में ज्यादा जोखिम भरा खेल कैसे उल्टा पड़ सकता है. अब मैकुलम की विदाई के बाद, गौतम गंभीर के पास भी सोचने के लिए काफी कुछ है कि किन बदलावों की जरूरत है. आखिरकार, खेल किसी भी विचारधारा से बड़ा होता है और कोई भी रणनीति यह दावा नहीं कर सकती कि उसने खेल के हर पहलू को साध लिया है. मैकुलम ने यह सबक कठिन तरीके से सीखा और इसकी कीमत चुकाई. उम्मीद है कि गंभीर इससे सीखेंगे अपने लिए और भारत के लिए.