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धार भोजशाला विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को राहत देते हुए हाई कोर्ट के नमाज पर पाबंदी वाले फैसले को बदल दिया. कोर्ट ने शुक्रवार को नमाज के लिए अलग स्थान देने और परिसर में किसी भी तरह के ढांचागत बदलाव पर रोक लगाने का निर्देश दिया है. जानिए क्या है विवाद और इसका टाइमलाइन?
दिल्ली. धार भोजशाला विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को बड़ी राहत देते हुए इंदौर हाई कोर्ट के नमाज पर पाबंदी वाले फैसले को बदल दिया है. मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि भोजशाला परिसर के पास ही एक वैकल्पिक और खुली जगह पर मुस्लिम पक्ष को शुक्रवार (जुमे) की नमाज अदा करने के लिए उपलब्ध कराई जाए. सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यह कोई अंतिम फैसला नहीं है, बल्कि केवल अंतरिम व्यवस्था है. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को भी आदेश दिया है कि वह अदालत की अनुमति के बिना विवादित परिसर में किसी भी तरह का ढांचागत बदलाव या नया निर्माण नहीं करेगा.
कब शुरू हुआ था विवाद?
11वीं सदी (1034 ईस्वी) में परमार राजवंश के प्रतापी राजा भोज ने धार में ज्ञान की देवी वाग्देवी (मां सरस्वती) के एक भव्य मंदिर और संस्कृत अध्ययन केंद्र भोजशाला का निर्माण कराया था. इसके बाद 14वीं सदी में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण और बाद के मुस्लिम शासकों के दौर में इस परिसर के धार्मिक और ढांचागत स्वरूप में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए. मुस्लिम समुदाय इस स्थान को प्रसिद्ध सूफी संत कमालुद्दीन चिश्ती की दरगाह की उपस्थिति के कारण ‘कमल मौला मस्जिद’ के रूप में मानने लगा, जिससे दोनों पक्षों के बीच इस स्थल पर मालिकाना हक को लेकर सदियों पुराना गतिरोध शुरू हो गया.
ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1904 के दौरान इसकी ऐतिहासिकता और दोनों समुदायों की धार्मिक संवेदनशीलता को देखते हुए इसे प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम के तहत एक संरक्षित स्मारक घोषित किया गया था. इसके बाद उपजे विवादों को शांत करने के लिए वर्ष 1935 में धार रियासत के दीवान ने एक प्रशासनिक आदेश जारी किया था, जिसके तहत मुस्लिमों को शुक्रवार के दिन जुमे की नमाज पढ़ने और हिंदू समुदाय को विशेष धार्मिक अवसरों पर पूजा-अर्चना करने की अनुमति दी गई थी. यही व्यवस्था लंबे समय तक दोनों पक्षों के बीच शांति का आधार बनी रही. हालांकि, विवाद खत्म नहीं हुआ. ऐसे में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने स्थिति को संभालने के लिए 7 अप्रैल 2003 को एक नई साझा व्यवस्था लागू की. इस व्यवस्था के तहत हिंदुओं को मंगलवार को परिसर के भीतर पूजा करने और मुस्लिमों को शुक्रवार दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच जुमे की नमाज अदा करने का अधिकार मिला.
इस कानूनी लड़ाई में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ नामक संगठन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मार्च 2024 में परिसर का व्यापक वैज्ञानिक सर्वे और उत्खनन कराने का आदेश दे दिया. एएसआई की टीम ने कई दिनों तक ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार और आधुनिक तकनीकों के जरिए परिसर के भीतर गहन पुरातात्विक सर्वे किया और अपनी विस्तृत रिपोर्ट अदालत को सौंपी. इसी सर्वे की रिपोर्ट के आधार पर 15 मई 2026 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया. हाई कोर्ट के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में पुरातात्विक साक्ष्यों के हवाले से पूरे भोजशाला परिसर को वाग्देवी का मंदिर माना. इसके साथ ही कोर्ट ने एएसआई की 2003 वाली साझा व्यवस्था को पूरी तरह निरस्त करते हुए वहां नमाज पढ़ने पर पूरी तरह रोक लगा दी.
हाईकोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को जिला प्रशासन के माध्यम से मस्जिद निर्माण के लिए धार जिले में ही किसी अन्य स्थान पर अलग जमीन मांगने की सलाह दी थी. हाई कोर्ट के इसी फैसले को मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहन की विशेष पीठ ने यह नया आदेश सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को बदलते हुए नमाजियों के आने-जाने के लिए प्रवेश और निकास की विशेष प्रशासनिक व्यवस्था करने को कहा है. शीर्ष अदालत ने दोनों समुदायों से क्षेत्र में पूरी तरह से शांति, कानून व्यवस्था और धैर्य बनाए रखने की अपील की है. कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह इस मामले से जुड़ी सभी याचिकाओं को संकलित कर बहुत जल्द इसकी रोजाना सुनवाई शुरू करेगी, ताकि इस संवेदनशील विवाद का एक स्थायी और न्यायसंगत कानूनी समाधान निकाला जा सके.
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