माला दीक्षित, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 22 के तहत मिलने वाला प्राथमिकता का अधिकार यानी पहले खरीदने का हक, कृषि भूमि यानी खेती की जमीन पर भी लागू होगा।
अदालत ने कहा है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 जो क्लास वन उत्तराधिकारियों को किसी अन्य सह उत्तराधिकारी द्वारा ट्रांसफर की जाने वाली संपत्ति खरीदने की प्राथमिकता देने वाला अधिकार देती है, कृषि भूमि पर भी समान रूप से लागू होती है।
इसका मतलब है कि अगर परिवार में किसी सदस्य को विरासत में जमीन मिली है और वो अपने हिस्से को किसी बाहरी व्यक्ति को बेचना चाहता है तो उसे पहले अपने ही परिवार के अन्य क्लास वन उत्तराधिकारियों को मौका देना होगा।
हिंदुओं के पैतृक संपत्ति के अधिकार पर असर डालने वाला यह दूरगामी प्रभाव वाला फैसला न्यायमूर्ति संजय करोल और एन. कोटीश्वर सिंह ने महिंदर तथा अन्य बनाम पूरन सिंह मामले में सुनाया है। कोर्ट ने महिंदर की अपील खारिज करते हुए पहली अपीलीय अदालत और हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया है जिसने माना था कि धारा 22 कृषि भूमि पर भी लागू होगी।
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इस मामले में याचिकाकर्ता और प्रतिवादी भाई-भाई थे जिन्होंने क्लास वन उत्तराधिकारियों की हैसियत से पिता की कृषि भूमि विरासत में पाई थी। इनमें से कुछ उत्तराधिकारियों ने विरासत में मिली अपने हिस्से की कृषि भूमि मिल कर 28 दिसंबर 2011 को तीसरे पक्ष यानी श्रीमती पूनम को बेच दी। लेकिन परिवार के एक अन्य सदस्य ने इसका विरोध किया और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 22 का आधार लेते हुए सिविल कोर्ट में वाद दायर कर बिक्री को चुनौती दे दी।
उसका कहना था कि धारा 22 के तहत उसे पहले खरीदने का अधिकार है। यानी बाहर वाले को बेचने से पहले परिवार को मौका मिलना चाहिए। सिविल कोर्ट ने यह कहते हुए वाद खारिज कर दिया कि कृषि भूमि पर ऐसा अधिकार लागू नहीं होता।
वह अपीलीय अदालत गया और पहली अपीलीय अदालत ने सिविल कोर्ट का फैसला पलट दिया। जमीन बेचने वाला पक्ष फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट गया, लेकिन हाई कोर्ट ने अपीलीय अदालत का फैसला सही ठहराया और याचिका खारिज कर दी। इसके बाद महिंदर व अन्य ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि पहले आत्म प्रकाश बनाम हरियाणा राज्य केस में प्रि-एम्शन यानी पहले खरीदने के अधिकार को असंवैधानिक बताया गया है इसलिए इस मामले में भी ये लागू नहीं होगा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ये दलील खारिज कर दी।
कोर्ट ने कहा कि धारा 22 कोई सामान्य प्रि-एम्शन कानून नहीं है, बल्कि यह उत्तराधिकार यानी विरासत से जुड़ा अधिकार है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पंजाब प्रि-एम्शन एक्ट और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 दोनों पूरी तरह अलग हैं। पंजाब के कानून में तो दूर के रिश्तेदार, किराएदार और सहमालिक तक को भी पहले खरीदने का अधिकार मिल जाता था, लेकिन हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 में ऐसा नहीं है।
इसमें अधिकार सिर्फ और सिर्फ क्लास वन उत्तराधिकारियों तक ही सीमित है जैसे बेटे,बेटी, पत्नी, मां यानी वही लोग जिन्हें एक ही व्यक्ति से विरासत में संपत्ति मिली है। इसलिए उस फैसले को लागू करके धारा 22 को खारिज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने फैसले में कहा कि अगर कहीं और की गई टिप्पणियों के आधार पर ठीक से बनाए गए कानून को इतनी आसानी से रद किया जा सकता है, तो अराजकता की स्थिति बन जाएगी।
इसमें उन अहम सिद्धांतों और उन स्थापित सीमित आधारों को नुकसान पहुंचेगा, जिनके जरिये ये जांचा जाता है कि ठीक से बनाया गया कोई कानून संविधान के अनुरूप है कि नहीं। कोर्ट ने पंजाब एक्ट की धारा 15 और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 की तुलना करते हुए कहा कि भले ही दोनों धाराएं प्रि-एम्शन यानी पहले खरीदने के अधिकार से जुड़ी हैं लेकिन वे एक जैसी नहीं हैं।
जस्टिस कोटीश्वर सिंह ने अलग से सहमति वाले दिये फैसले में कानून के असली मकसद को लागू करते हुए कहा कि धारा 22 के तहत मिला पहले खरीदने का यानी प्रि-एम्शन का अधिकार असल में उत्तराधिकार से जुड़ा मामला है और कुछ नहीं।
यह अधिकार अलग थलग नहीं होता, बल्कि हिंदुओं के बीच गहराई से जुड़ा होता है। यह सह-मालिकों पर लागू नहीं होता, जिन्होंने संपत्ति मिल कर खरीदी है, या उन लोगों के बीच भी नहीं जिनके बीच उत्तराधिकार का कोई संबंध नहीं है। यह अधिकार सिर्फ उन पक्षों के बीच पैदा होता है जो सह-वारिस हैं और जिन्हें इस कानून के तहत संपत्ति विरासत में मिली है।
यह अनजान लोगों के बीच लागू नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि जिस पल इस लेनदेन से हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम द्वारा मान्यता प्राप्त और बनाई गई उत्तराधिकार की स्थिति हट जाती है, धारा 22 के तहत मिलने वाला अधिकार भी खत्म हो जाता है। हालांकि, पहले बताए गए प्रि-एम्शन का इस्तेमाल करने से जमीन का ट्रांसफर होगा, लेकिन यह असल में और पूरी तरह से उत्तराधिकार से जुड़ा है। इसलिए यह अधिकार उत्तराधिकार से अलग नहीं है।
संसद ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम बनाते समय, बिना वसीयत के मरने वाले व्यक्ति की सभी संपत्तियों (जिसमें खेती की जमीन भी शामिल है) के लिए क्लास वन के उत्तराधिकारियों को उत्तराधिकार का अधिकार दिया था। साथ ही इन अधिकारों पर एक शर्त भी लगाई थी कि अगर कोई उत्तराधिकारी अपनी विरासत में मिली हिस्सेदारी को ट्रांसफर करना चाहता है तो उसे पहले इसे अपने सह-उत्तराधिकारियों को आफर करना होगा। प्राथमिकता का अधिकार और उत्तराधिकार का अधिकार एक ही कानूनी ढांचे के दो हिस्से हैं जो इस एक्ट के तहत हिन्दुओं से जुड़े हैं।