खेलों में एआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। रिलायंस फाउंडेशन, एसएआई और इन्फोसिस जैसी संस्थाएं खिलाड़ियों की ट्रेनिंग, प्रदर्शन विश्लेषण, चोट की रोकथाम और नए टैलेंट की पहचान में एआई तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं, हालांकि इंसानी कोच की भूमिका अब भी अहम है।

रिलायंस फाउंडेशन के जेम्स हिलियर बताते हैं कि AI से नतीजे बदल रहे हैं। उन्होंने भारत के सबसे तेज स्प्रिंटर गुरिंदरवीर सिंह को 10.09 सेकेंड का रिकॉर्ड बनाने में मदद की। उन्होंने ‘OptoJump’ से गुरिंदरवीर की एक ‘डिजिटल प्रोफाइल’ बनाई और चेक किया कि 9.98 सेकेंड में रेस कैसे पूरी की जा सकती है। गोस्पोर्ट्स फाउंडेशन और इन्फोसिस ने खिलाड़ियों का ‘डिजिटल जुड़वां’ बनाया है। नंदन कामत कहते हैं कि यह लैब की तरह है। हम जीते-जागते खिलाड़ी पर रिस्क लिए बिना डाइट और ट्रेनिंग के टेस्ट कर सकते हैं, जिससे चोट का खतरा नहीं रहता।
AI कितनी भी आगे बढ़ जाए, लेकिन यह इंसानी समझ और अपनापन नहीं दे सकती। आखिर में एक कोच को खिलाड़ी के साथ बैठकर उसकी मानसिक परेशानियों, डर और चुनौतियों पर बात करनी ही पड़ती है। तकनीक आपके लिए दौड़ नहीं सकती और न ही ओलंपिक फाइनल में 60 हजार दर्शकों के सामने खेलने या दौड़ने का दबाव संभाल सकती है।
जेम्स हिलियर, एथलेटिक्स डायरेक्टर, रिलायंस फाउंडेशन
गांवों तक पहुंचा AI कोच
यह तकनीक गांव-कस्बों तक पहुंच रही है। प्रकाश पादुकोण समर्थित स्टार्टअप ‘मचाए’ ने बैडमिंटन AI कोच ऐप बनाया है। फाउंडर प्रतीश राज बताते हैं कि उनके भाई तुषार ने अकादमी खोली थी। बच्चों की रिपोर्ट पैरेंट्स को देने के लिए यह ऐप बनाया, जो वीडियो देखकर ग्रिप और फुटवर्क सुधारता है। तकनीक ने 22 साल के ब्लाइंड पैरा-स्वीमर हिमांशु नांदल की जिंदगी आसान की है। पहले पूल की दीवार से टकराकर बहुत चोटें लगती थीं। उनके पिता ही उन्हें हर कदम गाइड करते थे। आज वह स्मार्ट घड़ियों से ट्रेनिंग ट्रैक करते हैं। हालांकि हिमांशु कहते हैं कि AI अभी 50-60% ही सही है और इतना महंगा है कि हर खिलाड़ी इसे नहीं ले सकता।
डेटा की सीमाएं भी हैं बड़ी चुनौती
ब्राजील के फुटबॉलरों और चेन्नई के एकस्ट्राएज ऐप से नया टैलेंट खोज जा रहा है। रिलायंस फाउंडेशन की दुर्गा वल्हिया बताती हैं कि वे AI से टैलेंट ही नहीं खोजते, बल्कि एक्स-रे पढ़कर डरू की चोरी भी पकड़ते हैं। लेकिन डेटा की भी लिमिट है। कामत कहते हैं कि डेटा प्राइवेट मेडिकल जानकारी है, जिसे यूं ही शेयर नहीं कर सकते। अंत में कोच हिलियर के शब्द दिल छू लेते हैं, ‘मशीनें चाहे जितनी एडवांस हो जाएं, वो इंसानी जज्बात नहीं समझ सकतीं। ओलंपिक फाइनल में जब 60,000 लोगों की भीड़ हो, तो कोई कंप्यूटर नहीं, बल्कि एक इंसानी कोच ही हौसला दे सकता है।’
ट्रेनिंग में बढ़ रहा AI का इस्तेमाल
- स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) ने खिलाड़ियों की चोट पर नजर रखने के लिए स्पीड AI प्रोग्राम शुरू किया है।
- रिलायंस फाउंडेशन धावकों के प्रदर्शन का विश्लेषण करने के लिए ऑप्टोजंप AI टूल का इस्तेमाल कर रहा है।
- गोस्पोर्ट्स फाउंडेशन और इन्फोसिस ने मिलकर डिजिटल एथलीट ट्विन प्रोजेक्ट शुरू किया है, जिससे खिलाड़ियों की ट्रेनिंग और प्रदर्शन को बेहतर बनाया जा सके।