दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि सरकारी भर्ती में यदि किसी विशेष विषय में बैचलर डिग्री अनिवार्य है, तो केवल उसी विषय में मास्टर डिग्री होने से उम्मीदवार पात्र नहीं होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भर्ती नियमों का सख्ती से पालन जरूरी है।

जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस विनोद कुमार की डिवीजन बेंच ने 15 जुलाई के फैसले में कहा कि किसी विशेष विषय में बैचलर डिग्री चुनना छात्रों का एक ‘सोचा-समझा अकादमिक फैसला’ होता है। ऐसे स्टूडेंट्स अपने करियर को उसी फील्ड में आगे बढ़ाने के लिए शुरू से ही विशेषज्ञता हासिल करते हैं। इसलिए उन्हें उन उम्मीदवारों के बराबर नहीं रखा जा सकता, जिन्होंने सामान्य बीए किया और बाद में उसी कोर्स में मास्टर डिग्री ले ली।
दोनों श्रेणियों को समान मानना सही नहीं: दिल्ली हाई कोर्ट
कोर्ट ने कहा कि सामान्य बीए (पास) करने वाले छात्रों के पास करियर के ज्यादा विकल्प होते हैं, जबकि विशेष बैचलर डिग्री लेने वाले स्टूडेंट्स शुरुआत से ही एक खास क्षेत्र में खुद को समर्पित करते हैं। ऐसे में दोनों श्रेणियों के उम्मीदवारों को समान मानना सही नहीं होगा।
बेंच ने यह भी कहा कि नियोक्ता (Employer) को यह तय करने का अधिकार है कि वह किसी विशेष पद के लिए उसी अकादमिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को प्राथमिकता दे, जिनके लिए भर्ती नियम बनाए गए हैं।
किस मामले पर आया हाई कोर्ट का फैसला
यह फैसला डीएसएसएसबी द्वारा डोमेस्टिक साइंस टीचर के नियुक्ति पत्र रद्द किए जाने से जुड़े मामले में आया। संबंधित उम्मीदवारों के पास बीए (पास) और होम साइंस में मास्टर डिग्री थी, लेकिन भर्ती नियमों के अनुसार जरूरी होम साइंस/डोमेस्टिक साइंस में बैचलर डिग्री उनके पास नहीं थी।
हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल का फैसला पलटते हुए कहा कि मास्टर डिग्री उस अनिवार्य बैचलर डिग्री का विकल्प नहीं हो सकती, जिसे भर्ती नियम स्पष्ट रूप से जरूरी बताते हैं। हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का हवाला देते हुए कहा कि एंट्री लेवल नौकरियों में मूल योग्यता रखने वाले उम्मीदवारों के अवसरों की भी रक्षा करना जनहित में है।
