नई दिल्ली: सोने में निवेश हमेशा सुरक्षित माना जाता है, लेकिन जब बात इसे बेचने की आती है तो असली खेल टैक्स का शुरू होता है। हालिया रिपोर्ट बताती है कि सोना बेचने (Gold Selling) पर आपका टैक्स इस बार पर निर्भर करता है कि आपने सोना किस रूप में खरीदा था- फिजिकल ज्वेलरी (Physical Gold), गोल्ड ETF, डिजिटल गोल्ड (Digital Gold) या Soverign Gold Bond। यही वजह है कि एक ही कीमत पर खरीदा गया सोना अलग-अलग निवेशकों के लिए अलग टैक्स बोझ पैदा कर सकता है।
फिजिकल ज्वेलरी (Physical Gold)
सबसे पहले बात करते हैं फिजिकल गोल्ड यानी ज्वेलरी, कॉइन या बार की, तो इसमें टैक्स का नियम थोड़ा सख्त है। अगर आप इसे खरीदने के 24 महीने के अंदर बेचते हैं, तो होने वाला मुनाफा आपकी इनकम में जुड़ जाता है और उसी के हिसाब से टैक्स लगता है। वहीं 24 महीने के बाद बेचने पर इसे लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन माना जाता है, जिस पर 12.5% टैक्स देना होता है।
Gold ETF
दूसरी तरफ, Gold ETF निवेशकों के लिए अपेक्षाकृत ज्यादा टैक्स-फ्रेंडली माना जाता है। इसमें सिर्फ 12 महीने की होल्डिंग के बाद ही लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन का फायदा मिल जाता है और 12.5% टैक्स देना होता है। अगर इससे पहले बेचते हैं तो मुनाफा आपके टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्सेबल होगा। यही वजह है कि शॉर्ट से मीडियम टर्म निवेश के लिए ETF को बेहतर विकल्प माना जाता है।
डिजिटल गोल्ड
Gold Mutual Funds भी इसी कैटेगरी में आते हैं, लेकिन इनमें लॉन्ग टर्म बनने के लिए 24 महीने का समय जरूरी होता है। इसके बाद 12.5% टैक्स लागू होता है। यानी ETF के मुकाबले इसमें लॉक-इन जैसा समय ज्यादा है, जो निवेशकों के फैसले को प्रभावित कर सकता है।
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सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड
अब बात करें Sovereign Gold Bond (SGB) की, जिसे पहले सबसे ज्यादा टैक्स-एफिशिएंट माना जाता था। अगर आपने SGB को सीधे RBI से खरीदा है और मैच्योरिटी (8 साल) तक होल्ड किया है, तो उस पर मिलने वाला कैपिटल गेन पूरी तरह टैक्स-फ्री होता है। हालांकि, इसमें मिलने वाला 2.5% सालाना ब्याज आपके इनकम स्लैब के अनुसार टैक्सेबल रहता है।
टैक्स प्लानिंग में क्या है अहम?
टैक्स प्लानिंग में सबसे अहम बात होल्डिंग पीरियड की होती है। उदाहरण के तौर पर, अगर आपने गोल्ड ETF में निवेश किया और 11 महीने में बेच दिया, तो आपको अपने स्लैब के हिसाब से भारी टैक्स देना पड़ सकता है। लेकिन अगर सिर्फ एक महीने और इंतजार कर 12 महीने पूरे कर लेते हैं, तो वही मुनाफा 12.5% टैक्स में आ जाएगा। यानी सही टाइमिंग से हजारों-लाखों रुपये की बचत हो सकती है।
निवेशकों के लिए सलाह
एक और बड़ी गलती जो निवेशक अक्सर करते हैं, वह है खरीद की पूरी लागत को सही तरीके से नहीं जोड़ना। ज्वेलरी खरीदते समय दिए गए making Charges और GST को अगर आप लागत में शामिल नहीं करते, तो आपका प्रॉफिट ज्यादा दिखेगा और उसी हिसाब से ज्यादा टैक्स देना पड़ेगा।