जून 2027 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 82वें सत्र के दौरान चुनाव आयोजित किए जाएंगे जिसमें 193 सदस्य देश वोट डालेंगे। भारत अभी तक 1950–51, 1967–68, 1972–73, 1977–78, 1984–85, 1991–92, 2011–12 और 2021–22 में सदस्य रह चुका है लेकिन इस बार ताजिकिस्तान की उम्मीदवारी और ओआईसी के समर्थन की वजह से पेंच फंस गया है।
भारतीय नेता लगातार स्थायी सदस्यता के लिए दलीलें पेश कर रहे हैं लेकिन जानकारों का कहना है कि कई वजहों से भारत को जल्द ही UN सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता मिलने की संभावना कम है। आजादी के बाद भारत को अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ ने दो अलग अलग मौकों पर अनौपचारिक रूप से स्थायी सदस्यता की पेशकश की थी जिसे तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने ठुकरा दिया था। अमेरिकी प्रस्ताव पर नेहरू का मानना था कि अमेरिका ऐसा भारत-चीन के बीच दरार डालने के लिए कर रहा है।
भारत UNSC का स्थायी सदस्य क्यों नहीं बन पा रहा, 3 वजह
भारतीय नेता दशकों से यह तर्क देते रहे हैं कि देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का स्थायी सदस्य बनने का हकदार है। एक उभरती हुई महाशक्ति के तौर पर भारत का मानना है कि उसे इस अहम मंच पर सीट देने से गलत तरीके से रोका गया है।
सुरक्षा परिषद में सुधार की वकालत करने वाले कई विदेशी नेताओं और अंतरराष्ट्रीय समूहों ने भी सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी का समर्थन किया है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र में वीटो पावर हासिल करने से पहले भारत को तीन मुख्य चुनौतियों से पार पाना होगा।
पहली चुनौती- चीन का विरोध: सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से चीन को छोड़कर बाकी सभी देशों जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस ने भारत की दावेदारी का साफ तौर पर समर्थन किया है। क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत के करीबी प्रतिद्वंद्वी होने के नाते चीन नई दिल्ली के पक्ष का समर्थन करने को तैयार नहीं है।
चीन एकमात्र एशियाई देश है जिसके पास सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट है। इससे उसकी ताकत और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा बढ़ती है और चीन शायद ही इस जगह को भारत के साथ साझा करना चाहेगा। चीन का भारत के साथ सीमा विवाद भी है इसलिए चीन UNSC के ढांचे में बदलाव करने के किसी भी चार सदस्यों के प्रयास का विरोध करेगा।
दूसरी चुनौती- बिना वीटो पावर के सदस्यता पर असहमति: कुछ पक्षों ने बिना वीटो पावर के भारत को UNSC की सदस्यता मिलने की संभावना जताई है। ‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ (UfC) जैसे ग्रुप जिसका नेतृत्व इटली करता है और जिसमें कनाडा, मैक्सिको, स्पेन, पाकिस्तान, दक्षिण कोरिया और तुर्की जैसे देश शामिल हैं उसने जनरल असेंबली के कामकाज को मजबूत करने और गैर-स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने की वकालत की है।
उनका तर्क है कि गैर-स्थायी सदस्यों को शामिल करने से UN ज्यादा जवाबदेह और सभी का प्रतिनिधित्व करने वाला बनेगा क्योंकि इससे फैसले लेने की प्रक्रिया तेज होगी। लेकिन सवाल यह है कि अगर भारत को वीटो पावर के बिना कोई अहम सीट मिलती है तो क्या होगा? क्या इसे बड़े लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में एक टुकड़ों में उठाया गया कदम माना जा सकता है? नई दिल्ली इस व्यवस्था का समर्थन नहीं करता है।
तीसरी चुनौती- क्षेत्रीय उलझन: भारत को अपने ही क्षेत्र से अपनी लीडरशिप को लेकर बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। भारत इस क्षेत्र पर असर तो डालता है लेकिन पूरी तरह से नहीं। दक्षिण एशिया भारत और चीन के बीच मुकाबले का अखाड़ा बन गया है और भले ही भारत-पाकिस्तान की दुश्मनी पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाता है लेकिन भारत से जुड़े ऐसे कई बड़े मुद्दे हैं जो नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव और यहां तक कि भूटान के लोगों को भी परेशान करते हैं। बांग्लादेश का भारत के साथ विवाद हर दिन का हेडलाइन है।
नेहरू ने यूएन सुरक्षा परिषद की सीट क्यों ठुकराई ?
अमेरिका ने 1950 में दिया था प्रस्ताव- अगस्त 1950 में अमेरिका ने तत्कालीन चीनी सरकार यानि ताइवान/ROC को हटाकर भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का स्थायी सदस्य बनाने का अनौपचारिक सुझाव दिया था। लेकिन पंडित नेहरू ने इसे एक औपचारिक प्रस्ताव मानने से इंकार कर दिया क्योंकि उस समय मुख्य चीन (PRC) को संयुक्त राष्ट्र में मान्यता देने का विवाद चल रहा था। नेहरू का मानना था कि अमेरिका, भारत और चीन के बीच दरार पैदा करने के लिए ऐसा कर रहा है।
सोवियत संघ ने 1955 में दिया था UNSC का प्रस्ताव- 1955 में सोवियत संघ के तत्कालीन प्रधानमंत्री निकोलाई बुल्गानिन ने भारत को सुरक्षा परिषद में छठा स्थायी सदस्य बनाने का एक अनौपचारिक विचार साझा किया था। नेहरू ने इस प्रस्ताव को भी यह कहते हुए टाल दिया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के ढांचे में चीन जैसे बड़े देश को बाहर रखकर कोई बदलाव करना ठीक नहीं होगा और पहले चीन को यूएन में जगह मिलनी चाहिए।
भारत को स्थायी सदस्य बनने के लिए करना होगा इंतजार
अक्टूबर 1971 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में मतदान के जरिए ताइवान को हटाकर पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाया गया था। और उसके बाद भारत लगातार यूएनएससी की स्थायी सदस्यता की मांग करता रहा है। लेकिन मौजूदा हालात को देखकर लगता नहीं है कि भारत को स्थायी सदस्यता और वीटो पावर अगले कुछ वर्षों में मिल पाएगी।
