अमेरिका-USSR ने भारत को द‍िया था वीटो पावर का ऑफर, अब UNSC में सदस्यता के लिए संघर्ष, 3 पेच – us ussr offered india unsc permanent seat with veto but nehru rejects china factor face off with tajikistan


नई दिल्ली/न्यूयॉर्क: भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 2028-29 कार्यकाल के लिए अस्थाई सदस्य बनने की दावेदारी पेश की है। यहां भारत का मुकाबला ताजिकिस्तान से होने वाला है जिसे इस्लामिक देशों के संगठन OIC का समर्थन हासिल हो चुका है। हालांकि भारत को अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और ज्यादातर यूरोपीय देशों का समर्थन हासिल है लेकिन अस्थाई सदस्य बनने के लिए दो तिहाई वोटों की जरूरत होती है।

जून 2027 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 82वें सत्र के दौरान चुनाव आयोजित किए जाएंगे जिसमें 193 सदस्य देश वोट डालेंगे। भारत अभी तक 1950–51, 1967–68, 1972–73, 1977–78, 1984–85, 1991–92, 2011–12 और 2021–22 में सदस्य रह चुका है लेकिन इस बार ताजिकिस्तान की उम्मीदवारी और ओआईसी के समर्थन की वजह से पेंच फंस गया है।

भारतीय नेता लगातार स्थायी सदस्यता के लिए दलीलें पेश कर रहे हैं लेकिन जानकारों का कहना है कि कई वजहों से भारत को जल्द ही UN सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता मिलने की संभावना कम है। आजादी के बाद भारत को अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ ने दो अलग अलग मौकों पर अनौपचारिक रूप से स्थायी सदस्यता की पेशकश की थी जिसे तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने ठुकरा दिया था। अमेरिकी प्रस्ताव पर नेहरू का मानना था कि अमेरिका ऐसा भारत-चीन के बीच दरार डालने के लिए कर रहा है।

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भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर ने कैम्पेन लॉंच किया।

भारत UNSC का स्थायी सदस्य क्यों नहीं बन पा रहा, 3 वजह

भारतीय नेता दशकों से यह तर्क देते रहे हैं कि देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का स्थायी सदस्य बनने का हकदार है। एक उभरती हुई महाशक्ति के तौर पर भारत का मानना है कि उसे इस अहम मंच पर सीट देने से गलत तरीके से रोका गया है।
सुरक्षा परिषद में सुधार की वकालत करने वाले कई विदेशी नेताओं और अंतरराष्ट्रीय समूहों ने भी सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी का समर्थन किया है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र में वीटो पावर हासिल करने से पहले भारत को तीन मुख्य चुनौतियों से पार पाना होगा।

पहली चुनौती- चीन का विरोध: सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से चीन को छोड़कर बाकी सभी देशों जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस ने भारत की दावेदारी का साफ तौर पर समर्थन किया है। क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत के करीबी प्रतिद्वंद्वी होने के नाते चीन नई दिल्ली के पक्ष का समर्थन करने को तैयार नहीं है।

चीन एकमात्र एशियाई देश है जिसके पास सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट है। इससे उसकी ताकत और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा बढ़ती है और चीन शायद ही इस जगह को भारत के साथ साझा करना चाहेगा। चीन का भारत के साथ सीमा विवाद भी है इसलिए चीन UNSC के ढांचे में बदलाव करने के किसी भी चार सदस्यों के प्रयास का विरोध करेगा।

दूसरी चुनौती- बिना वीटो पावर के सदस्यता पर असहमति: कुछ पक्षों ने बिना वीटो पावर के भारत को UNSC की सदस्यता मिलने की संभावना जताई है। ‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ (UfC) जैसे ग्रुप जिसका नेतृत्व इटली करता है और जिसमें कनाडा, मैक्सिको, स्पेन, पाकिस्तान, दक्षिण कोरिया और तुर्की जैसे देश शामिल हैं उसने जनरल असेंबली के कामकाज को मजबूत करने और गैर-स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने की वकालत की है।

उनका तर्क है कि गैर-स्थायी सदस्यों को शामिल करने से UN ज्यादा जवाबदेह और सभी का प्रतिनिधित्व करने वाला बनेगा क्योंकि इससे फैसले लेने की प्रक्रिया तेज होगी। लेकिन सवाल यह है कि अगर भारत को वीटो पावर के बिना कोई अहम सीट मिलती है तो क्या होगा? क्या इसे बड़े लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में एक टुकड़ों में उठाया गया कदम माना जा सकता है? नई दिल्ली इस व्यवस्था का समर्थन नहीं करता है।

तीसरी चुनौती- क्षेत्रीय उलझन: भारत को अपने ही क्षेत्र से अपनी लीडरशिप को लेकर बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। भारत इस क्षेत्र पर असर तो डालता है लेकिन पूरी तरह से नहीं। दक्षिण एशिया भारत और चीन के बीच मुकाबले का अखाड़ा बन गया है और भले ही भारत-पाकिस्तान की दुश्मनी पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाता है लेकिन भारत से जुड़े ऐसे कई बड़े मुद्दे हैं जो नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव और यहां तक कि भूटान के लोगों को भी परेशान करते हैं। बांग्लादेश का भारत के साथ विवाद हर दिन का हेडलाइन है।

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नेहरू ने यूएन सुरक्षा परिषद की सीट क्यों ठुकराई ?

अमेरिका ने 1950 में दिया था प्रस्ताव- अगस्त 1950 में अमेरिका ने तत्कालीन चीनी सरकार यानि ताइवान/ROC को हटाकर भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का स्थायी सदस्य बनाने का अनौपचारिक सुझाव दिया था। लेकिन पंडित नेहरू ने इसे एक औपचारिक प्रस्ताव मानने से इंकार कर दिया क्योंकि उस समय मुख्य चीन (PRC) को संयुक्त राष्ट्र में मान्यता देने का विवाद चल रहा था। नेहरू का मानना था कि अमेरिका, भारत और चीन के बीच दरार पैदा करने के लिए ऐसा कर रहा है।
सोवियत संघ ने 1955 में दिया था UNSC का प्रस्ताव- 1955 में सोवियत संघ के तत्कालीन प्रधानमंत्री निकोलाई बुल्गानिन ने भारत को सुरक्षा परिषद में छठा स्थायी सदस्य बनाने का एक अनौपचारिक विचार साझा किया था। नेहरू ने इस प्रस्ताव को भी यह कहते हुए टाल दिया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के ढांचे में चीन जैसे बड़े देश को बाहर रखकर कोई बदलाव करना ठीक नहीं होगा और पहले चीन को यूएन में जगह मिलनी चाहिए।

भारत को स्थायी सदस्य बनने के लिए करना होगा इंतजार

अक्टूबर 1971 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में मतदान के जरिए ताइवान को हटाकर पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाया गया था। और उसके बाद भारत लगातार यूएनएससी की स्थायी सदस्यता की मांग करता रहा है। लेकिन मौजूदा हालात को देखकर लगता नहीं है कि भारत को स्थायी सदस्यता और वीटो पावर अगले कुछ वर्षों में मिल पाएगी।

अभिजात शेखर आजाद

लेखक के बारे मेंअभिजात शेखर आजादअभिजात शेखर आजाद नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में इंटरनेशनल अफेयर्स, डिफेंस जर्नलिस्ट हैं। उनके पास अलग अलग न्यूज चैनलों और डिजिटल पत्रकारिता में करीब 17 सालों का अनुभव है। वे अंतरराष्ट्रीय राजनीति (International Politics), वैश्विक कूटनीति (Global Diplomacy) और रक्षा रणनीति (Defense Strategy) के विशेषज्ञ माने जाते हैं। उन्होंने इन वर्षों में 3 अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध, इजरायल-हमास युद्ध, मिडिल ईस्ट, अफगानिस्तान युद्ध, ISIS के खिलाफ संघर्ष, भारत पाकिस्तान संघर्ष जैसे अहम अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं को कवर किया है।

अभिजात शेखर आजाद वैश्विक राजनीति का विश्लेषण करते हैं और भारत पर उसका क्या असर होगा, इसका एनालिसिस करते हुए विश्लेषणात्मक स्टोरी लिखते हैं। इसके अलावा इंटरनेशनल डिफेंस सेक्टर पर उनकी खास नजर होती है। हथियारों की खरीद बिक्री, अंतर्राष्ट्रीय हथियार व्यापार पर वो करीबी नजर रखते हैं। रक्षा जगत में अंदरूनी पहुंच होने की वजह से डिफेंस मामलों पर उनकी सटीक खबरों का काफी प्रभाव है।

विशेषज्ञता- इंटरनेशनल डिप्लोमेसी के साथ साथ डिफेंस सेक्टर की खबरों के विश्लेषण में अच्छी पकड़। भारतीय वायुसेना और नौसेना और डिफेंस इंटेलिजेंस में पैठ। जियो-पॉलिटिक्स को लेकर अभिजात शेखर आजाद के अनुमान अकसर सही साबित होते हैं। उनकी विशेषज्ञता केवल समाचार रिपोर्टिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि वे जटिल अंतरराष्ट्रीय संबंधों को भारतीय दर्शकों के लिए सरल और प्रभावी ढंग से समझाने के लिए जाने जाते हैं। राफेल डील से लेकर अत्याधुनिक मिसाइल टेक्नोलॉजी और वैश्विक शक्ति संतुलन पर सैकड़ों विश्लेषणात्मक लेख।

पत्रकारिता अनुभव: अभिजात शेखर आजाद के पत्रकारिता में करीब 17 सालों का अनुभव है। उन्होंने 2009 से पत्रकारिता में अपना कैरियर शुरू किया था और उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग में अच्छी पकड़ बनाई। उन्होंने समाचार प्लस और ज़ी मीडिया जैसे संस्थानों में काम किया। उन्होंने पश्चिम बंगाल विश्वविद्यालय से अंग्रेजी पत्रकारिता में स्नातक किया है।

पुरस्कार: अभिजात को ज़ी मीडिया में बेहतरीन लेखन के लिए ‘बेस्ट राइटर’ अवार्ड मिल चुका है। इसके अलावा उन्हें दो बार ENBA अवार्ड भी मिला है।

अभिजात के खास इंटरव्यू:
अभिजात शेखर आजाद का ‘बॉर्डर-डिफेंस’ नाम से साप्ताहिक वीडियो इंटरव्यू आता है, जिसमें वो सैन्य अधिकारियों और डिप्लोमेट्स से बात करते हैं। उन्होंने कई बड़े चेहरे जैसे DRDO के वैज्ञानिक और ब्रह्मोस मिसाइल बनाने वाले वैज्ञानिक अतुल दिनकर राणे, डीआरडीओ वैज्ञानिक हरि बाबू चौरसिया, भारतीय सेना के पूर्व आर्मी चीफ वेद मलिक, लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन, लेफ्टिनेंट जनरल संजय वर्मा, एयर मार्शल रवि कपूर, एयर फोर्स अधिकारी विजयेन्द्र के ठाकुर, फाइटर पायलट आरके नारंग, डिप्लोमेट एसडी मुनि, डिप्लोमेट सी उदय भाष्कर, डिप्लोमेट अनिल त्रिगुणायत, डिप्लोमेस रोबिंदर सचदेव, नौसेना कैप्टन श्याम कुमार समेत कई एयरफोर्स और नौसेना अधिकारियों का इंटरव्यू ले चुके हैं।… और पढ़ें



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