Isro Scientist Resignation Reason: भारत में प्राइवेट कल्चर और स्टार्टअप्स की आंच अब उस सेक्टर तक पहुंच गई है, जिसको देश के गौरव से देखा जाता है. यह सेक्टर है भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो. पिछले एक साल में करीब 100 से सवा सौ के बीच वैज्ञानिकों ने इसरो से किनारा किया है. इन इस्तीफों की वजह से अंतरिक्ष विभाग ने नियम में बदलाव किया है. केंद्र सरकार के इस विभाग ने साइंटिस्ट्स के इस्तीफे को स्वीकार करने के नियमों में बदलाव किया है. अब कई वैज्ञानिक इसरो को छोड़कर स्पेस स्टार्टअप के साथ जुड़ गए हैं. सवाल है कि वो कौन सी वजहें हैं, जिसकी वजह से इसरो से ब्रेन-ड्रेन हो रहा है.
प्राइवेट सेक्टर में बढ़ते अवसरों के बीच भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के कम से कम 100 वैज्ञानिकों ने इस्तीफा दे दिया है. इस मामले में पूर्व एक्सपर्ट्स ने बताया कि आखिर क्यों कम वेतन, करियर के विकल्प और नई स्पेस कंपनियां वैज्ञानिकों के इस पलायन की मुख्य वजह बन रही हैं. ऐसे समय में जब भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अपने सबसे महत्वाकांक्षी दौर में प्रवेश कर रहा है, इसरो से अनुभवी वैज्ञानिकों के बाहर निकलने को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं. इसमें मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन ‘गगनयान’ से लेकर उन्नत सैटेलाइट्स की लॉन्चिंग और डीप स्पेस की खोज शामिल हैं.
रिपोर्ट्स के मुताबिक हाल के सालों में इसरो से कम से कम 100 वैज्ञानिकों ने इस्तीफा दे दिया है, जिससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या भारत की यह शीर्ष अंतरिक्ष एजेंसी टैलेंट्स को अपने साथ बनाए रखने की चुनौती का सामना कर रही है. इसरो के साथ ही साथ रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के पूर्व वैज्ञानिकों का कहना है कि इस पलायन के पीछे की वजहों में बेहतर सैलरी पैकेज, प्राइवेट सेक्टर में बढ़ते अवसर और पेशेवरों के बीच करियर के बदलते ऑप्शन शामिल हैं.
प्राइवेट सेक्टर का माहौल क्या है?
स्पेस सेक्टर को करीब 6 साल पहले 2020 में जब प्राइवेट कंपनियों के लिए खोला गया, तब से स्काईरूट एयरोस्पेस, अग्निकुल कॉसमॉस, पिक्सेल, बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस, ध्रुव स्पेस, दिगंतरा और कई अन्य स्टार्टअप्स ने भारत के एयरोस्पेस सेक्टर की तस्वीर बदल दी है. प्राइवेट कंपनियां अच्छी सैलरी, स्टॉक ऑप्शन, फ्लेक्सिबिलिटी और तेजी से काम करने वाले माहौल में काम करने का मौका देती हैं. यहां आइडियाज ड्रॉइंग बोर्ड से हार्डवेयर तक तेजी से पहुंचते हैं. ये कंपनियां रॉकेट, सैटेलाइट, प्रोपल्शन और स्पेस-बेस्ड सर्विस ऐसी रफ्तार से बना रही हैं, जिसकी कुछ साल पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी.
एक्सपर्ट्स ने हालांकि यह चेतावनी भी दी है कि इन इस्तीफों को एक बड़े संकट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि इसरो के प्रोजेक्ट्स बड़ी टीमों और स्थापित सिस्टम्स के आधार पर काम करते हैं. इसरो के वैज्ञानिकों का मानना है कि संगठन के मजबूत कामकाजी माहौल की सराहना करते हुए कहा कि इसरो, प्रोफेशनलिज्म और ह्यूमैनिटेरियन वर्क कल्चर का एक आइडियल मिश्रण है, जहां अच्छी सुविधाएं हैं.
इसके बावजूद एक्सपर्ट्स का मानना है कि प्राइवेट सेक्टर और विदेशों में मिलने वाले अवसरों की तुलना में सरकारी वेतन अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है. डीआरडीओ के पूर्व वैज्ञानिक रवि गुप्ता ने कहा कि प्रतिभाओं का यह पलायन देश को प्रभावित कर रहा है. डीआरडीओ ने भी इसी तरह की समस्याओं का सामना किया है और लगातार होने वाले इस्तीफे महत्वपूर्ण प्रॉजेक्ट्स को प्रभावित कर सकते हैं.
प्राइवेट सेक्टर और बदलते विकल्प
इस बारे में मुख्य चिंताओं में से एक यह है कि भारतीय वैज्ञानिकों की तुलना अगर वैश्विक स्तर पर उनके समकक्ष दूसरे देशों के साइंटिस्ट से किया जाए तो यहां बहुत कम भुगतान किया जाता है. भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र (प्राइवेट स्पेस सेक्टर) के खुलने से रोजगार का सिनेरियो भी पूरी तरह बदल गया है. सैटेलाइट निर्माण, लॉन्च सेवाएं, स्पेस एप्लिकेशन और डिफेंस टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में प्राइवेट कंपनियों के कदम रखने से अब अनुभवी वैज्ञानिकों के पास सरकारी संगठनों के बाहर भी कई बेहतरीन विकल्प मौजूद हैं.
डीआरडीओ के पूर्व महानिदेशक सेल्वामूर्ति विलियम के अनुसार ऐसा जरूरी नहीं है कि यह इसरो के खराब वर्क कल्चर की वजह से ऐसा हो रहा है. भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था और प्राइवेट सेक्टर अधिक वेतन और बेहतर लाभों के साथ नए अवसर पैदा कर रहा है.
मजबूत सिस्टम के कारण संकट नहीं!
इसरो के पूर्व डेप्युटी डायरेक्टर अरूप दासगुप्ता का कहना है कि व्यक्तिगत रूप से किसी के जाने से चल रहे मिशनों को कोई खतरा नहीं होता है. उन्होंने कहा कि अगर एक या दो लोग चले जाते हैं, तो कोई प्रोजेक्ट पटरी से नहीं उतरता है. हमारे पास एक मजबूत प्रणाली मौजूद है. अस्थायी रूप से थोड़ी रुकावट आ सकती है, लेकिन काम चलता रहता है. उन्होंने आगे कहा कि इसरो का विशाल पैमाना और टीम-आधारित नजरिया ऐसे बदलावों को आसानी से संभालने में मदद करता है.
दासगुप्ता ने कहा कि इसमें कुछ भी असामान्य या चिंताजनक नहीं है। इसरो में लगभग 18 हजार लोग काम करते हैं. इसके प्रोजेक्ट्स कई एक्सपर्ट्स के टीम वर्क होते हैं. अगर कोई जाता है, तो उसकी जगह लेने के लिए दूसरा व्यक्ति मौजूद होता है. ऐसा पहले भी हुआ है और आगे भी होगा.
भले ही इसरो भारत के सबसे सम्मानित वैज्ञानिक संस्थानों में से एक बना हुआ है लेकिन खास टैलेंट के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा सरकारी अनुसंधान संगठनों के सामने एक बड़ी चुनौती को दर्शाती है. एक ऐसी अर्थव्यवस्था में अत्यधिक कुशल वैज्ञानिकों को अपने साथ बनाए रखना जहां निजी कंपनियां काफी अधिक वेतन और करियर के नए अवसर दे सकती हैं.