जीतनराम मांझी:आखिर है क्या विवादित राजनीतिक बयानों के पीछे का खेल? – Union Minister Jitan Ram Manjhi’s Statement Demanding A Separate Electorate (electoral College) For Scs And S


केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के प्रमुख जीतन राम मांझी एक बार फिर अपने बयान को लेकर राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। इस बार उन्होंने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए अलग निर्वाचक मंडल की मांग उठाई है। उनका तर्क है कि जब तक दलित और आदिवासी समुदाय अपने प्रतिनिधि स्वयं नहीं चुनेंगे, तब तक उन्हें वास्तविक राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिल सकेगा।

यह प्रस्ताव भारतीय संविधान की वर्तमान व्यवस्था से अलग है। संविधान ने अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए विधानसभाओं और संसद में आरक्षित सीटों की व्यवस्था तो की है, लेकिन पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था नहीं है। यही कारण है कि मांझी के बयान ने राजनीतिक और संवैधानिक दोनों स्तरों पर व्यापक बहस छेड़ दी है।

हालांकि, यह पहला अवसर नहीं है जब मांझी अपने किसी बयान को लेकर विवादों में आए हों। बिहार की राजनीति में वे लंबे समय से बेबाक और असामान्य टिप्पणियों के लिए पहचाने जाते रहे हैं। दलित समाज से आने वाले नेता होने के नाते उन्होंने कई ऐसे मुद्दे उठाए, जिन पर गंभीर विमर्श हुआ, लेकिन कई बार उनकी भाषा और शैली विवाद का कारण भी बनी।

चर्चित विवादित बयान

1. ब्राह्मणों और पुजारियों पर टिप्पणी एक सार्वजनिक सभा में मांझी ने कहा था कि पहले दलित समुदाय के लोग सत्यनारायण भगवान की पूजा नहीं करते थे, लेकिन अब जब पुजारी उनके घर आते हैं और भोजन ग्रहण नहीं करते, तो उन्हें अपमान का अनुभव होता है। इस बयान को लेकर ब्राह्मण संगठनों ने तीखा विरोध दर्ज कराया।

2. भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल अप्रैल 2022 और मार्च 2023 में दिए गए बयानों में मांझी ने कहा कि वे भगवान राम को ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं मानते। उनका कहना था कि राम का चरित्र साहित्यकारों द्वारा रचा गया है। उन्होंने रावण को राम से अधिक विद्वान भी बताया, जिसके बाद व्यापक राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया हुई।

3. कमीशन पर टिप्पणी दिसंबर 2025 में एक पार्टी कार्यक्रम के दौरान मांझी ने विकास कार्यों में कमीशन लेने को लेकर ऐसा बयान दिया, जिसे विपक्ष और सहयोगी दलों ने भ्रष्टाचार का समर्थन बताया। बाद में इस बयान को लेकर काफी विवाद हुआ।

4. नेताओं के ‘हनीमून’ पर टिप्पणी 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने विपक्षी नेताओं पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि संकट के समय कुछ नेता “हनीमून मनाने” निकल जाते हैं। इस टिप्पणी को राजनीतिक शिष्टाचार के विरुद्ध बताया गया।

5. चुनाव न लड़ने वाले नेताओं की तुलना मांझी ने अपनी पार्टी के गठन के समय उन्होंने चुनाव न लड़ने वाले नेताओं की तुलना “बांझ महिलाओं” से कर दी थी। इस बयान की विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने आलोचना की।

6. पुलिस मुठभेड़ पर टिप्पणी हाल में बिहार की एक चर्चित पुलिस मुठभेड़ पर मांझी ने कहा कि यदि कोई पुलिस पर हथियार तानता है तो उसे छोड़ा नहीं जा सकता। विपक्ष ने इस टिप्पणी को न्यायिक प्रक्रिया और कानून के शासन के संदर्भ में अनुचित बताया।

राजनीति और बयानबाजी

मांझी के समर्थकों का कहना है कि वे दलित समाज के सवालों को बिना लाग-लपेट के सामने रखते हैं और स्थापित राजनीतिक विमर्श को चुनौती देते हैं। दूसरी ओर, उनके आलोचकों का आरोप है कि उनके कई बयान सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देते हैं और समाधान की बजाय विवाद पैदा करते हैं। कई अवसरों पर मांझी स्वयं भी यह कहते रहे हैं कि उनके बयानों को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किया गया।



लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है और सामाजिक न्याय, राजनीतिक प्रतिनिधित्व तथा समान अवसर जैसे विषयों पर खुली बहस भी आवश्यक है। किंतु संवैधानिक पदों पर आसीन नेताओं के शब्द केवल व्यक्तिगत राय नहीं होते; उनका व्यापक सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव पड़ता है। इसलिए उनसे तथ्यपरक, संतुलित और संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप भाषा की अपेक्षा की जाती है।

आखिरकार, किसी भी लोकतंत्र की शक्ति केवल मतभेदों में नहीं, बल्कि संवाद की गुणवत्ता में निहित होती है। सामाजिक न्याय की लड़ाई जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक यह भी है कि वह संवैधानिक मूल्यों, तथ्यपरक तर्कों और समावेशी दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़े। यही किसी भी वरिष्ठ जननेता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। जबकि, मांझी के राजनीतिक सफर में ऐसे कई बयान आए हैं, जिन्होंने देश और राज्य की सियासत में भूचाल ला दिया है।



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