जुलाई CPI डेटा: महंगाई के आंकड़ों का आपकी जेब और EMI पर होगा सीधा असर
भारत में जुलाई महीने के रिटेल महंगाई (CPI) के आंकड़े बुधवार, 12 अगस्त को शाम 4:00 बजे जारी किए जाएंगे। यह समय भारतीय समयानुसार (IST) है। इन आंकड़ों का सीधा असर आपके घर के बजट, लोन की ईएमआई (EMI), बैंक डिपॉजिट के फैसलों और शेयर बाजार के सेंटिमेंट पर पड़ेगा। इस डेटा में मुख्य रूप से फूड, फ्यूल, हाउसिंग और कोर बास्केट के आंकड़े शामिल होते हैं। इस बार पाठकों को खास तौर पर इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि खाने-पीने की चीजों की महंगाई और कोर महंगाई की स्थिरता के बीच क्या अंतर रहता है।
इन दोनों के बीच का अंतर समझना क्यों जरूरी है? दरअसल, खाने-पीने की चीजें फसल, लॉजिस्टिक्स और मौसम के हिसाब से तेजी से बदलती हैं। वहीं, कोर महंगाई में फूड और फ्यूल (ईंधन) को शामिल नहीं किया जाता, जिससे बाजार में मांग के असली दबाव का पता चलता है। अगर कोर महंगाई काबू में हो और सिर्फ खाने-पीने की चीजें महंगी हो रही हों, तो नीति निर्माताओं के लिए यह ज्यादा चिंता की बात नहीं होती। लेकिन अगर कोर महंगाई में मजबूती बनी रहती है, तो इसका मतलब है कि आपको लोन पर लंबे समय तक ज्यादा ब्याज देना पड़ सकता है।

जुलाई CPI: फूड बनाम कोर महंगाई के संकेत
महंगाई के आंकड़ों में अनाज, सब्जियों, दालों और दूध जैसी खाने-पीने की चीजों का बड़ा हिस्सा होता है। सब्जियों और दालों की कीमतों में उछाल का सबसे ज्यादा और सीधा असर कम आय वाले परिवारों पर पड़ता है। दूसरी तरफ, कोर महंगाई में हाउसिंग और सर्विसेज (जैसे किराया, पढ़ाई और इलाज का खर्च) का दबदबा रहता है। अगर सर्विसेज सेक्टर में महंगाई बनी रहती है, तो रिजर्व बैंक (RBI) की तरफ से ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों को झटका लग सकता है।
EMI और लोन बेंचमार्क: EBLR बनाम MCLR रीसेट का गणित
एक्सटर्नल बेंचमार्क लिंक्ड रेट (EBLR) से जुड़े लोन पर नीतिगत बदलावों का असर बहुत तेजी से होता है, अक्सर एक ही बिलिंग साइकिल के भीतर। वहीं, मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड्स बेस्ड लेंडिंग रेट (MCLR) वाले लोन की दरें उनकी रीसेट डेट पर ही बदलती हैं। कई लोन एग्रीमेंट हर छह या बारह महीने में रीसेट होते हैं, जिससे दरों में बदलाव का असर दिखने में समय लगता है। ऐसे में लोन लेने वालों को अपनी रीसेट विंडो पर नजर रखनी चाहिए, दूसरे बैंकों के रीफाइनेंस ऑफर्स की तुलना करनी चाहिए और सबसे महंगे लोन का पहले भुगतान (prepay) करने की कोशिश करनी चाहिए।
FD और स्मॉल सेविंग्स के संकेत; डेट फंड ड्यूरेशन के बेसिक नियम
बैंक अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) दरों को फंड की लागत, लिक्विडिटी (नकदी) और बाजार में जारी कॉम्पिटिशन के हिसाब से तय करते हैं। अगर महंगाई में लगातार गिरावट आती है, तो ब्याज दरों में बढ़ोतरी न होने पर भी आपको अपनी जमा राशि पर बेहतर वास्तविक रिटर्न (real returns) मिलता है। बचत करने वाले लोग बेहतर रिटर्न, फ्लेक्सिबिलिटी और जरूरत पड़ने पर पैसों की उपलब्धता के बीच तालमेल बिठाने के लिए अलग-अलग मैच्योरिटी वाली FD (लैडरिंग) चुन सकते हैं। वहीं, लंबी अवधि (longer duration) वाले डेट फंड्स को यील्ड गिरने पर फायदा होता है, लेकिन इनमें उतार-चढ़ाव भी ज्यादा होता है।
शाम 4 बजे के बाद मार्केट पर नजर: रुपया, बॉन्ड यील्ड, बैंकिंग और कंजम्पशन सेक्टर
शाम 4:00 बजे आंकड़े जारी होते ही सबसे पहले बॉन्ड यील्ड पर इसका असर दिखेगा। अगर महंगाई के आंकड़े उम्मीद से कम आते हैं, तो बॉन्ड यील्ड में गिरावट आ सकती है, जिससे बैंकों को फायदा होगा और कंजम्पशन (खपत) से जुड़े शेयरों को सपोर्ट मिलेगा। इसके विपरीत, अगर महंगाई उम्मीद से ज्यादा रही, तो बॉन्ड यील्ड बढ़ सकती है और ब्याज दरों के प्रति संवेदनशील (rate-sensitive) सेक्टरों पर दबाव बन सकता है। ऐसे में 10 साल के सरकारी बॉन्ड, रुपये की चाल और बड़े बैंकों के बयानों पर पैनी नजर रखें।