ज्ञानवापी, मथुरा और संभल, सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता की पहल हुई विफल, हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्षों की ‘ना’ – gyanvapi, mathura and sambhal litigants reject supreme court mediation continue through legal adjudication


Supreme Court Mediation: सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानवापी, मथुरा और संभल मामलों में सहमति आधारित समाधान तलाशने के उद्देश्य से पक्षकारों को मध्यस्थता प्रक्रिया में शामिल होने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन यह परवान नहीं चढ़ सका। हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने इस पहल को अस्वीकार कर दिया है। ऐसे में अब आगे क्या …

Gyanvapi, Mathura, Sambhal Cases to Continue
ज्ञानवापी, मथुरा और संभल, सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता की पहल हुई विफल
नई दिल्ली: देश में राम मंदिर का मुद्दा सुलझने के बाद, मंदिरों से जुड़े तीन और बड़े विवाद चर्चा में हैं। इनमें सबसे चर्चित मंदिर-मस्जिद विवाद वाराणसी का ज्ञानवापी, मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि शाही ईदगाह और संभल की शाही जामा मस्जिद का विवाद शामिल हैं। हांलांकि इनकी गंभीरता देखते हुए सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने इन मामलों में सहमति आधारित समाधान तलाशने के उद्देश्य से पक्षकारों को मध्यस्थता यानी Mediation प्रक्रिया में शामिल होने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन यह परवान नहीं चढ़ सका। हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने इस पहल को अस्वीकार करते हुए मंशा जाहिर की है कि वे विवाद का समाधान केवल न्यायिक प्रक्रिया और कानूनी फैसले के माध्यम से चाहते हैं। ऐसे में अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई और उसके निर्णय पर टिक गई हैं।

Navbharat Timesहनुमान जी का जन्म स्थान का क्या है विवाद, अदालत में होगा फैसला, सुप्रीम कोर्ट ने दे दी गाईडलाईन

सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता पहल क्यों हुई और पक्षकारों ने क्यों ठुकराया?

देश में चल रहे तीन अन्य प्रमुख विवाद जिनमें वाराणसी का ज्ञानवापी, मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि शाही ईदगाह और संभल की शाही जामा मस्जिद का विवाद शामिल हैं, लगता है सुप्रीम कोर्ट की प्राथमिकता सूची में हैं। इन विवादों को जल्द सुलझाने की उम्मीद के साथ सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने ‘समाधान समारोह 2026’ के तहत सहमति आधारित विवाद निपटारे की पहल की थी। लेकिन ज्ञानवापी, मथुरा और संभल मामलों के प्रमुख पक्षकारों ने इस विकल्प को स्वीकार नहीं किया। दोनों पक्षों का कहना है कि इन विवादों में महत्वपूर्ण कानूनी और संवैधानिक प्रश्न जुड़े हैं, जिनका समाधान केवल अदालत के फैसले से ही संभव है। आपको बता दूं कि मध्यस्थता पूरी तरह स्वैच्छिक प्रक्रिया होती है और किसी भी पक्ष पर इसे स्वीकार करने का दबाव नहीं डाला जा सकता।

Temple-Mosque Disputes-logo

तीनों मंदिर विवादों का कानूनी आधार और वर्तमान स्थिति

1. ज्ञानवापी मामले में हिंदू पक्ष का दावा है कि मस्जिद का निर्माण प्राचीन काशी विश्वनाथ मंदिर के अवशेषों पर हुआ था, जबकि मुस्लिम पक्ष इन दावों का विरोध करता है और Places of Worship Act, 1991 का हवाला

2. मथुरा विवाद में हिंदू पक्ष शाही ईदगाह परिसर को भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि का हिस्सा बताता है और 1968 के समझौते की वैधता पर प्रश्न उठाता है। दूसरी ओर, मस्जिद प्रबंधन इस समझौते और मौजूदा कानूनों के आधार पर अपना पक्ष रख रहा है

3. संभल में हिंदू पक्ष के अनुसार प्राचीन ‘हरिहर मंदिर’ (श्री हरि मंदिर) को तोड़कर संभल की ‘शाही जामा मस्जिद’ बनाई गई थी। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह मस्जिद मुगल शासक बाबर द्वारा 16वीं शताब्दी में एक प्राचीन ‘हरिहर मंदिर’ (श्री हरि मंदिर) को तोड़कर बनाई गई थी। वहीं, मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह मस्जिद हमेशा से इबादत की जगह रही है। संभल विवाद में याचिका के आधार पर अदालत द्वारा कराए गए सर्वे के बाद व्यापक तनाव और हिंसा हुई थी।

Navbharat Timesमंदिरों में VIP दर्शन खत्म होगा क्या, भगवान के सामने सब बराबर, हाईकोर्ट की टिप्पणी से छिड़ी नई बहस

मध्यस्थता से इनकार के बाद आगे की राह क्या

इन मामलों में चूंकि दोनों पक्षों ने मध्यस्थता से इनकार कर दिया है, इसलिए उम्मीद है कि अब सभी विवाद नियमित न्यायिक प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ेंगे। सुप्रीम कोर्ट संबंधित याचिकाओं, सर्वे रिपोर्ट, पूजा-अधिकार और कानून की व्याख्या से जुड़े मुद्दों पर सुनवाई जारी रखेगा। अदालत का अंतिम फैसला केवल इन तीन मामलों तक सीमित नहीं रहेगा, देश में चल रहे अनेकों धार्मिक स्थलों से जुड़े भविष्य के मुकदमों पर भी प्रभाव डाल सकता है। दरअसल, ये सभी मामले अत्यंत संवेदनशील हैं, इसलिए न्यायालय की प्रत्येक टिप्पणी और आदेश पर देशभर की नजर बनी हुई है।
Navbharat TimesBanke Bihari Temple Case: सुप्रीम कोर्ट में आज अहम सुनवाई, मंदिर प्रबंधन विवाद पर नजर

अब अदालती फैसला ही एकमात्र रास्ता

इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट की सराहना करनी पड़ेगी। दरअसल, शीर्ष अदालत ने साफ दिल से ज्ञानवापी, मथुरा और संभल विवादों में मध्यस्थता की पहल कर सहमति आधारित समाधान तलाशने की कोशिश की थी। लेकिन हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्षों द्वारा इसे अस्वीकार किए जाने के बाद अब अदालती फैसला ही एकमात्र रास्ता बचा है। तब तक के लिए दोनों पक्षों को इंतजार ही करना होगा। अंतिम निर्णय आने तक सभी पक्षों के दावे न्यायिक परीक्षण के अधीन रहेंगे।

मनीष राज

लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखनऔर पढ़ें