ट्रकों के पीछे क्यों लिखा होता है Horn-OK-Please? सिर्फ भारत में है ये ट्रेंड, जंग से है इसका कनेक्शन


भारत के नेशनल हाईवेज पर सफर करते समय रंग-बिरंगे ट्रकों के पीछे एक लाइन हर किसी का ध्यान खींचती है- ‘Horn OK Please’. चमकीले रंगों में रंगे, फिल्मी सितारों की तस्वीरों से सजे इन भारी-भरकम ट्रकों के पीछे लिखा ये जुमला भारतीय सड़कों की सबसे बड़ी पहचान बन चुका है. विदेशों में जहां बेवजह हॉर्न बजाने को बेहद बदतमीजी या गुस्से का इजहार माना जाता है, वहीं हमारे देश में ट्रक वाले खुद बड़ी विनम्रता से लिखकर चलते हैं कि ‘भाई, ओवरटेक करने से पहले प्लीज हॉर्न बजाओ’. क्या आपने कभी सोचा है कि सिर्फ भारत में ही दिखने वाले इस अनोखे ट्रेंड की शुरुआत कैसे हुई?

भारतीय ट्रकों पर क्यों लिखा होता है Horn Ok Please

भारतीय ट्रकों के पीछे क्यों लिखा होता है Horn OK Please?

दरअसल, ये सिर्फ कोई अचानक से किसी के दिमाग में आया स्लोगन या ट्रक आर्ट नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प इतिहास छिपा है जिसका सीधा कनेक्शन दूसरे विश्व युद्ध से है. आज धूल से भरे हाईवेज पर 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ते इन ट्रकों के पीछे लिखा ये स्लोगन हमें इतिहास की एक ऐसी कहानी की याद दिलाता है, जिसने भारतीय रोड कल्चर को हमेशा के लिए बदल दिया.

वर्ल्ड वॉर-2 का वो कनेक्शन

इसे लेकर कोई पुख्ता दस्तावेज तो नहीं हैं लेकिन कुछ थ्योरीज मौजूद हैं. इनमें जो सबसे ज्यादा भरोसे लायक लगती है वो थ्योरी सीधे दूसरे विश्व युद्ध के दौर से जुड़ती है. उस युद्ध के जमाने में पूरी दुनिया में तेल की भयंकर किल्लत हो गई थी, जिसकी वजह से ट्रकों को चलाने के लिए डीजल की जगह केरोसिन, यानी मिट्टी का तेल का इस्तेमाल किया जाने लगा था.

केरोसिन बेहद ज्वलनशील ईंधन होता है, जिसमें जरा सा एक्सीडेंट होने पर भी ट्रक के परखच्चे उड़ सकते थे और वो आग के गोले में बदल सकते थे. इसी भयंकर खतरे को देखते हुए सेना ने इन ट्रकों के पीछे एक सख्त चेतावनी लिखवा दी थी- Horn Please. On Kerosene. इसके पीछे का आइडिया बेहद सीधा था कि अगर आप केरोसिन से चल रहे किसी ट्रक के पीछे गाड़ी चला रहे हैं तो उसे ओवरटेक करने से पहले हॉर्न जरूर बजाएं ताकि ड्राइवर को पता रहे कि आप वहां हैं और वह अचानक चौंक न जाए. वक्त के साथ यही ‘On Kerosene’ छोटा होते-होते सिर्फ ‘OK’ में बदल गया और पूरा जुमला ‘Horn OK Please’ बन गया.

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साबुन वाली वो ‘शातिर’ थ्योरी

इस आइकॉनिक स्लोगन के पीछे सिर्फ जंग का ही इतिहास नहीं है, बल्कि भारत के सबसे बड़े बिजनेस घरानों में से एक ‘टाटा’ का एक बेहद दिलचस्प विज्ञापन और बिजनेस माइंडसेट भी जुड़ा हुआ है. ये थ्योरी टाटा ऑयल मिल्स के एक डिटर्जेंट ब्रांड से संबंधित है, जिसका नाम था ‘OK’. टाटा के इस ‘OK’ वाशिंग बार का लोगो कमल का फूल हुआ करता था.

अपने इस नए ब्रांड को प्रमोट करने के लिए कंपनी ने एक मजेदार रास्ता चुना; उन्होंने उन ट्रकों पर इस साबुन का विज्ञापन पेंट करना शुरू कर दिया, जिन पर पहले से ही बाईं और दाईं तरफ ‘Horn Please’ लिखा होता था.

टाटा ने इस ‘OK’ शब्द और कमल के फूल के सिंबल को ट्रक के बिल्कुल बीच में पेंट कर दिया. इसके बाद ट्रक के पीछे का पूरा फॉर्मेट कुछ ऐसा दिखने लगा— बाईं तरफ ‘Horn’, बीच में ‘OK’, और दाईं तरफ ‘Please’. ट्रक ड्राइवरों को ये लुक और स्टाइल इतना पसंद आया कि साबुन तो बाजार से चला गया, लेकिन ये लाइन हमेशा के लिए अमर हो गई.

सिर्फ चेतावनी नहीं, ड्राइवरों का हमसफर है ये स्लोगन

चाहे इसकी शुरुआत विश्व युद्ध की मजबूरी से हुई हो या साबुन वाले विज्ञापन से, आज ‘Horn OK Please’ भारतीय रोड कल्चर का एक हिस्सा बन चुका है. भारत में ट्रक चलाने वाले ड्राइवर अपने घरों से दूर, हफ्तों तक सड़कों पर जिंदगी बिताते हैं. ऐसे में वे अपने इन ट्रकों को सिर्फ एक गाड़ी नहीं समझते, बल्कि उन्हें अपने हमसफर की तरह मानते हैं.

वो अपने इन ट्रकों के नाम रखते हैं, उन्हें सजाते हैं और इस पुरानी लाइन को अपनी गाड़ियों पर जिंदा रखते हैं. आज ये ट्रकों के पीछे लिखा हुआ स्लोगन कोई मजाक या रैंडम शब्द नहीं है, बल्कि यह चलती-फिरती सड़कों पर इतिहास का एक टुकड़ा है, जिसे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखकर हमारे देश के ट्रक ड्राइवर आज भी शान से सफर कर रहे हैं. इसलिए अगली बार जब आप हाईवे पर किसी ट्रक के पीछे इस स्लोगन को देखें, तो बेझिझक हॉर्न बजाइए, क्योंकि ये पूरी तरह से ‘ओके’ है.



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