…तो ट्रांसजेंडर्स को सरकारी नौकरी कैसे मिलेगी, SC का दिल्ली सरकार से सवाल; हलफनामा मांगा, Ncr Hindi News


सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दिल्ली सरकार से पूछा कि ट्रांसजेंडर लोग सरकारी नौकरी कैसे पा सकते हैं। भर्ती के विज्ञापनों में टीचिंग की वैकेंसी को अब भी सिर्फ पुरुष और महिला की कैटेगरी में ही बांटा जाता है। कोर्ट ने कहा कि ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को ऑनलाइन एप्लीकेशन पोर्टल पर रजिस्टर करने की सुविधा देने भर से ही असल समस्या का समाधान नहीं हो सकता। जस्टिस जेबी परदीवाला और के विनोद चंद्रन की बेंच ने दिल्ली सरकार को एक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। इसमें यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि जब वैकेंसी के नोटिफिकेशन ही लिंग-आधारित होते हैं तो ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों की नियुक्ति पर कैसे विचार किया जाएगा।

मामले की सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि हम पूरी कोशिश कर रहे हैं कि ट्रांसजेंडरों को हर संभव जगह पर सम्मान के साथ रोजगार मिले। हम इस बड़े मुद्दे पर बाद में विचार करेंगे। कोर्ट की ये टिप्पणियां एक ट्रांसजेंडर महिला जेन कौशिक की याचिका पर सुनवाई के दौरान की गईं। उन्होंने दिल्ली सरकार की नौकरियों में ट्रांसजेंडर लोगों के लिए अलग वैकेंसी और भर्ती की एक व्यापक नीति की मांग की थी।

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पोर्टल में थर्ड जेंडर का विकल्प किया गया है

दिल्ली सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ऑनलाइन एप्लीकेशन रजिस्ट्रेशन सिस्टम पोर्टल में बदलाव करके थर्ड जेंडर का विकल्प शामिल किया गया है। मेहता ने कहा कि शिकायत यह थी कि वहां सिर्फ ‘M’ (पुरुष) और ‘F’ (महिला) का विकल्प था। इसलिए वह पोर्टल पर लॉग इन करके आवेदन नहीं कर पा रही थीं। अब वह सुविधा दे दी गई है। ‘थर्ड जेंडर’ (तीसरे लिंग) का विकल्प भी दिया जा रहा है। उन्होंने पहले ही आवेदन कर दिया है। अब जब वैकेंसी निकलेगी तो उन पर विचार किया जाएगा। उनका मामला यह नहीं है कि वैकेंसी है और उन्हें अनुमति नहीं दी जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की आरक्षण की मांग को न्यायिक निर्देशों के जरिए पूरा नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह मामला विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। हालांकि, बेंच ने गौर किया कि यह मुद्दा सिर्फ ऑनलाइन पोर्टल तक ही सीमित नहीं था।

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वे भी इंसान हैं, सहानुभूति से देखें

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि भले ही पोर्टल में बदलाव किया गया था, लेकिन भर्ती के विज्ञापनों में अब भी खाली जगहों को PGT बायोलॉजी (महिला) या PGT केमिस्ट्री (पुरुष) के तौर पर ही बताया जा रहा था। इस वजह से ट्रांसजेंडर आवेदकों के लिए कोई कैटेगरी नहीं बची थी। बेंच ने कहा कि वे भी इंसान हैं। उन्हें थोड़ी सहानुभूति से देखें। साथ ही यह भी कहा कि असली मुश्किल नियुक्ति के समय आती है। कोर्ट ने दिल्ली सरकार से नए निर्देश लेने को कहा और टिप्पणी की कि अगर वह आवेदन करती भी है तो उसे किस कैटेगरी में माना जाएगा? वे कहेंगे कि आपने ऑनलाइन आवेदन तो किया है, लेकिन आप कैटेगरी की शर्तों को पूरा नहीं करतीं।

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ट्रांसजेंडरों के लिए अलग कैटेगरी होनी चाहिए

याचिकाकर्ता की चिंता पर गौर करते हुए कोर्ट ने कहा कि भले ही कौशिक को पोर्टल पर रजिस्टर करने की इजाजत मिल गई थी, फिर भी उन्हें भर्ती प्रक्रिया से बाहर किया जा सकता है क्योंकि विज्ञापनों में सिर्फ पुरुष और महिला उम्मीदवारों को ही मान्यता दी जाती है। आदेश में कहा गया कि मामले के आधार पर या तो पुरुष उम्मीदवार पर विचार किया जाता है या महिला उम्मीदवार पर। उनका कहना है कि भर्ती के विज्ञापन में ट्रांसजेंडर लोगों के लिए एक अलग कैटेगरी होनी चाहिए। कोर्ट ने इस मुद्दे पर हलफनामा दाखिल करने के लिए दिल्ली सरकार को समय दिया।

यह मामला अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट के एक अंतरिम आदेश से जुड़ा है। कोर्ट ने तब कौशिक को ट्रांसजेंडर कैटेगरी के तहत टीचिंग पोस्ट के लिए आवेदन करने की इजाजत दी थी। कौशिक की याचिका ‘ट्रांसजेंडर पर्सन्स (अधिकारों का संरक्षण) एक्ट, 2019’ को लागू करने से जुड़े बड़े मुद्दों को उठाती है। इसमें ट्रांसजेंडर लोगों के लिए अलग वैकेंसी की मांग के साथ-साथ भर्ती की एक खास पॉलिसी, उम्र और योग्यता के नियमों में छूट की भी मांग की गई है।

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यह मामला पहले दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा था, जिसने कौशिक को ट्रांसजेंडर उम्मीदवार के तौर पर आवेदन करने की इजाजत दे दी थी। कोर्ट ने यह भी कहा था कि आरक्षण और भर्ती नीति से जुड़े व्यापक सवाल पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। अक्टूबर 2025 में 2019 के कानून के लागू होने की अलग से समीक्षा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने खराब तरीके से लागू होने के कारण ट्रांसजेंडर लोगों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा को बेअसर बताया था। साथ ही कोर्ट ने रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा में समान अवसर सुनिश्चित करने के उपाय सुझाने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस आशा मेनन की अध्यक्षता में आठ सदस्यों वाली एक सलाहकार समिति का गठन किया था।



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