नेहरू ने दिखाई होती हिम्मत, आज भारत का होता बलूचिस्तान, औकात में रहता पाक
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Balochistan Accession Proposal: इतिहास के बारे में एक बात बहुत प्रचलित है – आप इसे जितना कुरेदेंगे उतने ही रहस्य आपके सामने बेपर्दा होते जाएंगे. भारत-पाकिस्तान बंटवारे से पहले और उसके बाद कई ऐसी सियासी और मानवीय घटनाएं हुईं, जिनके बारे में लोगों को काफी कम जानकारी है. बलूचिस्तान को लेकर भी एक रहस्य इतिहास के सीने में दफन है.
बलूचितस्तान के सबसे बड़े रियासत कलात के मीर अहमद यार खान ने भारत में विलय का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उसे अस्वीकार कर दयिा था. (फोटो साभार: iocus.org)
Balochistan Accession Proposal: इतिहास के सीने में कई ऐसे राज दफन हैं, जिनके बारे में जानना बेहद जरूरी है. भारत को जब 15 अगस्त 1947 को आजादी मिली थी, तब सदियों से समृद्ध विरासत का गढ़ रहा यह देश लहूलुहान था. लखों-करोड़ों लोग विभाजन की पीड़ा को झेलने के लिए विवश थे. हजारों परिवारों की बनी-बनाई दुनिया उजड़ गई. भीषण दंगों की आग में न जाने कितने मासूम और निर्दोष लोग जलकर खाक हो गए. दूसरी तरफ, सियासतदान इस बात को लेकर फिक्रमंद थे कि उनके हिस्से में जमीन का कौन से टुकड़ा आ रहा है और कौन सा जा रहा है. बंटवारा भी विचित्र तरीके से किया गया था. पाकिस्तान के हिस्से में पूर्वी बंगाल का हिस्सा भी गया था, जो मेनलैंड यानी मुख्य भूमि से हजारों किलोमीटर दूर था. विभाजन और आजादी के कुछ ही महीनों बाद भारत सरकार के पास पाकिस्तान के हिस्से में गए बलूचिस्तान प्रांत की सबसे बड़ी रियासत कलात के शासक का एक खत पहुंचा, जिसमें भारत में मिलने की इच्छा जताई गई थी. विडंबना देखिए कि पंडित जवाहरलाल नेहरू की तत्कालीन सरकार द्वारा इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया गया. यदि नेहरू ने इस प्रोपोजल को स्वीकार कर लिया होता तो बलूचिस्तान के साथ ही रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ग्वादर पर भी भारत का अधिकार होता.
भारत के विभाजन के तुरंत बाद वर्ष 1948 में दक्षिण एशिया के राजनीतिक इतिहास का एक ऐसा अध्याय सामने आया, जिस पर आज भी बहस होती है. दावा किया जाता है कि बलूचिस्तान की सबसे बड़ी और प्रभावशाली रियासत कलात (Kalat) के शासक मीर अहमद यार खान ने भारत सरकार को गुप्त रूप से अपनी रियासत के भारत में विलय का प्रस्ताव भेजा था. हालांकि, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया. यदि यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता तो दक्षिण एशिया का भू-राजनीतिक नक्शा आज बिल्कुल अलग हो सकता था. विभाजन के समय कलात की स्थिति अन्य रियासतों से अलग मानी जाती थी. ब्रिटिश शासन के दौरान कलात का ब्रिटिश क्राउन के साथ ऑटोनोमस यानी स्वायत्त संबंध था. कलात के खान का तर्क था कि उनकी रियासत नेपाल और अफगानिस्तान की तरह एक संप्रभु इकाई है, न कि ब्रिटिश भारत की सामान्य रियासत. 11 अगस्त 1947 को हुए एक अलग समझौते में कलात की स्वतंत्र स्थिति को मान्यता मिलने का भी उल्लेख किया जाता है.
भारत का रवैया और पाकिस्तान का दबाव
हालांकि, पाकिस्तान ने जल्द ही कलात पर अपने साथ विलय का दबाव बनाना शुरू कर दिया. अपनी स्वायत्तता बनाए रखने के उद्देश्य से मीर अहमद यार खान ने नई दिल्ली से संपर्क साधने का प्रयास किया. बताया जाता है कि उन्होंने गुप्त दूतों के माध्यम से भारत को कलात के भारत में विलय का प्रस्ताव भेजा. उस समय भारत सरकार ने इस प्रस्ताव के रणनीतिक और सैन्य पहलुओं का आकलन किया. विशेषज्ञों के अनुसार, नेहरू सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती भौगोलिक दूरी थी. कलात की भारत से कोई जमीनी सीमा यानी लैंड बॉर्डर नहीं जुड़ती थी. दोनों के बीच पाकिस्तान का विशाल भूभाग था. ऐसे में किसी भी संकट की स्थिति में वहां प्रशासन चलाना, सेना भेजना और रसद पहुंचाना लगभग असंभव माना गया.
बलूचिस्तान प्रांत में श्री हिंगलाज माता मंदिर दुनियाभर के लाखों-करोड़ों हिन्दुओं के आस्था का केंद्र है. (फोटो: Reuters)
नेहरू का डर
दूसरा बड़ा कारण उस समय भारत की सैन्य और प्रशासनिक स्थिति थी. मार्च 1948 तक भारत जम्मू-कश्मीर को लेकर पाकिस्तान के साथ पहले युद्ध में उलझा हुआ था. दूसरी ओर हैदराबाद और जूनागढ़ जैसी रियासतों के एकीकरण की चुनौती भी सामने थी. ऐसे में हजारों किलोमीटर दूर स्थित एक अलग क्षेत्र की सुरक्षा और प्रशासन की जिम्मेदारी उठाना नवस्वतंत्र भारत के लिए अत्यंत कठिन माना गया. बताया जाता है कि नेहरू को यह आशंका भी थी कि यदि भारत कलात को स्वीकार करता है तो पाकिस्तान इसे अपने खिलाफ आक्रामक कदम मानेगा. इससे दोनों देशों के बीच लंबे समय तक कई मोर्चों पर संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती थी. साथ ही उस दौर में भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पश्चिमी देशों के सहयोग की भी आवश्यकता थी और नई सरकार किसी बड़े भू-राजनीतिक टकराव से बचना चाहती थी.
वीपी मेनन का बयान और पाकिस्तान का एक्शन
27 मार्च 1948 को तत्कालीन राज्य मंत्रालय के सचिव वीपी. मेनन ने एक प्रेस वार्ता के दौरान यह जानकारी सार्वजनिक कर दी कि कलात के खान ने भारत से विलय का अनुरोध किया था, लेकिन भारत ने भौगोलिक कारणों से इसे स्वीकार नहीं किया. यह जानकारी बाद में ऑल इंडिया रेडियो से भी प्रसारित हुई. दावों के अनुसार, इस खुलासे के बाद पाकिस्तान ने तेजी से कार्रवाई की. 28 मार्च 1948 को पाकिस्तानी सेना कलात की ओर बढ़ी और सैन्य दबाव के बीच कलात के खान को पाकिस्तान के साथ विलय संबंधी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने पड़े. इसके बाद कलात पाकिस्तान का हिस्सा बन गया.
ग्वादर तक पहुंच
एक पक्ष का यह भी मानना है कि यदि भारत उस समय यह प्रस्ताव स्वीकार कर लेता तो उसे अरब सागर तक एक महत्वपूर्ण सामरिक पहुंच और मध्य एशिया के निकट रणनीतिक स्थिति मिल सकती थी. बता दें आज का ग्वादर पोर्ट तब बलूचिस्तान के कलात के अधीन ही थ. आज यही ग्वादर चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) के केंद्र में है. वहीं, दूसरे पक्ष का तर्क है कि तत्कालीन परिस्थितियों में भारत के पास न तो सैन्य क्षमता थी और न ही भौगोलिक आधार, जिससे इतने दूर स्थित क्षेत्र की प्रभावी सुरक्षा और प्रशासन सुनिश्चित किया जा सके. इसी कारण नेहरू का निर्णय उस समय की व्यावहारिक परिस्थितियों के अनुरूप माना जाता है.
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बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से प्रारंभिक के साथ उच्च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…और पढ़ें