नो-कॉस्ट EMI का सच: शॉपिंग करते वक्त इन छिपे हुए चार्जेस को नजरअंदाज न करें, वरना होगा नुकसान
फ्रीडम सेल (Freedom Sale) में आज खरीदारी करने वालों की भारी भीड़ है। लेकिन, अगर आप भी शॉपिंग कर रहे हैं, तो पेमेंट करते वक्त नो-कॉस्ट EMI (No-Cost EMI) के टोटल अमाउंट पर जरूर ध्यान दें, क्योंकि कई बार यह उम्मीद से ज्यादा दिख सकता है। दरअसल, इस अंतर की वजह वो छिपे हुए चार्ज और टैक्स होते हैं, जो ‘नो-कॉस्ट’ के मुख्य विज्ञापन में दिखाई नहीं देते। नियमों के मुताबिक, किसी भी ट्रांजैक्शन को EMI में बदलने से पहले ग्राहकों को सभी चार्ज साफ-साफ बताना जरूरी है। अगर आज यानी 8 अगस्त को आपको भी बिल में कोई गड़बड़ी दिखती है, तो तुरंत इसकी जांच करें।
इस कन्फ्यूजन की दो मुख्य वजहें हैं। पहली- कार्ड EMI के ब्याज (interest) वाले हिस्से पर लगने वाला GST। भले ही मर्चेंट आपको इंस्टेंट डिस्काउंट देकर ब्याज की रकम को बराबर (offset) कर दे, लेकिन उस ब्याज पर लगने वाला GST आपको ही देना होगा। दूसरी वजह- बैंक या कार्ड जारी करने वाली कंपनी की प्रोसेसिंग फीस, जिस पर शॉपिंग प्लेटफॉर्म का कोई कंट्रोल नहीं होता। इन दोनों चार्ज की वजह से चेकआउट के समय दिखने वाला ‘टोटल पेएबल’ (कुल देय राशि) आपके EMI शेड्यूल से अलग हो जाता है।

Flipkart EMI: नो-कॉस्ट का पूरा गणित और वेरिफिकेशन का आसान तरीका
पेमेंट पेज पर जाकर EMI ऑप्शंस खोलें और ‘नो-कॉस्ट EMI’ पर क्लिक करें। यहां चेक करें कि आपको मिलने वाला इंस्टेंट डिस्काउंट, आपके टेन्योर (अवधि) के बैंक ब्याज के बराबर है या नहीं। अब इस ब्याज पर 18% की दर से GST का हिसाब लगाएं और उसमें बैंक की प्रोसेसिंग फीस जोड़ें। अब कैलकुलेट करें: प्रोडक्ट की कीमत + GST + प्रोसेसिंग फीस। यह कुल रकम आपके ‘टोटल पेएबल’ से मैच होनी चाहिए। सुरक्षा के लिए हर स्टेप और स्टेटमेंट प्रिव्यू का स्क्रीनशॉट जरूर ले लें।
| कीमत | अवधि | बैंक ब्याज | मर्चेंट डिस्काउंट | ब्याज पर GST (18%) | प्रोसेसिंग फीस (+GST) | कुल देय राशि |
|---|---|---|---|---|---|---|
| ₹30,000 | 6 महीने | ₹2,250 | −₹2,250 | ₹405 | ₹353 | ₹30,758 |
ऊपर दिए गए उदाहरण में ₹30,000 के प्रोडक्ट पर 15% सालाना ब्याज दर के साथ 6 महीने की EMI का हिसाब लगाया गया है, जिसमें ₹299 बैंक प्रोसेसिंग फीस शामिल है। यहां मर्चेंट डिस्काउंट ने ब्याज की रकम को तो खत्म कर दिया, लेकिन ब्याज पर लगने वाला GST और प्रोसेसिंग फीस आपको ही चुकानी होगी। आपके कार्ड, EMI की अवधि और बैंक के नियमों के हिसाब से ये आंकड़े बदल सकते हैं, इसलिए बैंक के नियम और शर्तें (fine print) हमेशा ध्यान से पढ़ें।
नो-कॉस्ट EMI के छिपे पेंच: रिटर्न, लिमिट और प्री-क्लोजर चार्ज
अगर आप ऑर्डर रिटर्न या कैंसिल करते हैं, तो नो-कॉस्ट EMI का फायदा खत्म हो सकता है। ऐसे में बैंक आपको मिला इंस्टेंट डिस्काउंट वापस ले सकते हैं और फोरक्लोजर फीस (foreclosure fees) भी लगा सकते हैं। यह फीस आमतौर पर बची हुई मूल रकम (outstanding principal) का 3% तक होती है, जो कैंसिलेशन के 120 दिनों के भीतर चार्ज की जा सकती है। इसके अलावा, बैंक की लिमिट (caps) और कुछ खास कैटेगरी पर मिलने वाली छूट के नियम भी अलग होते हैं। शॉपिंग प्लेटफॉर्म और बैंक के ऑफर्स व चार्ज में अंतर हो सकता है, इसलिए दोनों के नियम-शर्तों को बारीकी से पढ़ें।
Flipkart EMI के हिडन चार्ज और शिकायत दर्ज करने का तरीका
अगर कोई गड़बड़ी दिखती है, तो सबसे पहले स्क्रीनशॉट के साथ फ्लिपकार्ट सपोर्ट पर टिकट रेज (शिकायत दर्ज) करें। इसके बाद, अपने बैंक या कार्ड जारीकर्ता के ग्रीवांस ऑफिसर (शिकायत अधिकारी) को ईमेल भेजकर चार्ज का लिखित ब्रेकअप मांगें। अगर 30 दिनों के भीतर समस्या का समाधान नहीं होता है, तो आप रिजर्व बैंक (RBI) के CMS पोर्टल पर क्रेडिट कार्ड कैटेगरी के तहत शिकायत दर्ज करा सकते हैं। RBI का नियम साफ कहता है- “ब्याज वाले EMI कन्वर्जन को जीरो-इंटरेस्ट या नो-कॉस्ट EMI के रूप में छिपाकर पेश नहीं किया जा सकता।” यह नियम पूरी तरह आपके पक्ष में है।