राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी अभ्यर्थी की योग्यता को भारतीय नौसेना द्वारा स्नातक के समकक्ष मान लेने मात्र से वह किसी अन्य विभाग की भर्ती प्रक्रिया में स्वत पात्र नहीं हो जाता।
यदि भर्ती विज्ञापन में किसी विशेष विषय, न्यूनतम अंकों और अन्य शैक्षणिक योग्यताओं का स्पष्ट उल्लेख है तो अभ्यर्थी को उन्हीं सभी शर्तों को पूरा करना होगा। अदालत ने इसी आधार पर उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम (यूएचबीवीएन) में अपर डिवीजन क्लर्क (यूडीसी) पद पर नियुक्ति की मांग करने वाले पूर्व नौसेना कर्मी जय करण की याचिका खारिज कर दी।
जस्टिस अमन चौधरी की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता ने दलील दी कि भारतीय नौसेना ने 31 जुलाई 2008 के पत्र के माध्यम से उसकी शैक्षणिक योग्यता को स्नातक के समकक्ष मान्यता प्रदान की थी। इसके अलावा 31 जुलाई 2015 को जारी नौसेना के एक विज्ञापन के अनुसार वह विभिन्न पदों पर आवेदन करने के लिए पात्र था।
इसलिए उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम द्वारा जारी भर्ती विज्ञापन के तहत यूडीसी पद के लिए भी उसे नियुक्त किया जाना चाहिए था। वहीं, निगम की ओर से अदालत को बताया गया कि भर्ती विज्ञापन में यूडीसी पद के लिए स्पष्ट रूप से कामर्स विषय में स्नातक की डिग्री, सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए कम से कम 60 प्रतिशत अंक, मैट्रिक स्तर तक हिंदी अथवा संस्कृत का ज्ञान तथा एनआईईएलआईटी (डोएक) या हारट्रान से कम से कम एक वर्ष का ओ लेवल अथवा उससे उच्च कंप्यूटर कोर्स अनिवार्य किया गया था।
हाई कोर्ट ने रिकार्ड का परीक्षण करने के बाद कहा कि याचिकाकर्ता भर्ती विज्ञापन में निर्धारित अनिवार्य पात्रता पूरी नहीं करता। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा, केवल स्नातक की डिग्री पर्याप्त नहीं थी, बल्कि वह कामर्स विषय में और 60 प्रतिशत अंकों के साथ होना भी आवश्यक था।
अदालत ने यह भी कहा कि विज्ञापन में निर्धारित अन्य दो अनिवार्य शर्तों का पालन भी याचिकाकर्ता नहीं कर सका।अदालत ने माना कि जब याचिकाकर्ता विज्ञापन में निर्धारित अनिवार्य शैक्षणिक योग्यताओं पर खरा ही नहीं उतरता था, तब उसे दिया गया सशर्त नियुक्ति प्रस्ताव वापस लेने में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं थी। इसी निष्कर्ष के साथ हाई कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया कि भर्ती प्रक्रिया में विज्ञापन की शर्तों से बाहर जाकर किसी अभ्यर्थी को राहत नहीं दी जा सकती।