विधि संवाददाता, पटना। पटना हाईकोर्ट ने फैसले से स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक पदों पर नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के अनुरूप पारदर्शी एवं प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया से ही की जा सकती है।
यदि किसी व्यक्ति की नियुक्ति बिना विधिसम्मत चयन प्रक्रिया के दैनिक वेतनभोगी अथवा संविदा आधार पर हुई है, तो केवल लंबे समय तक कार्य करने के आधार पर उसे नियमित नियुक्ति का अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता। न्यायाधीश कुमार मनीष की एकलपीठ ने वैशाली निवासी आनंद कुमार सिन्हा की याचिका खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी।
याचिकाकर्ता ने वर्ष 1995 से विभिन्न सरकारी कार्यालयों में दैनिक वेतनभोगी के रूप में कार्य करने का दावा करते हुए चतुर्थवर्गीय पद पर नियमितीकरण तथा वर्ष 2016 की नियुक्ति प्रक्रिया में कथित त्रुटियों को दूर करने की मांग की थी।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि विज्ञापन संख्या 01/2016 के तहत प्रकाशित रिक्तियां जिला चयन समिति द्वारा 9 मई 2018 की बैठक में निरस्त कर दी गई थीं। ऐसे में उस विज्ञापन को चुनौती देने वाली याचिका स्वतः निष्प्रभावी हो चुकी है।
अदालत ने कहा कि सरकारी सेवाओं में नियुक्ति के लिए खुला विज्ञापन, सभी पात्र अभ्यर्थियों को समान अवसर तथा निष्पक्ष चयन प्रक्रिया अनिवार्य है। किसी भी प्रकार की बैकडोर नियुक्ति या नियमों के विपरीत की गई नियुक्ति को बाद में नियमितीकरण के माध्यम से वैध नहीं बनाया जा सकता।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि उनकी प्रारंभिक नियुक्ति किसी विधिसम्मत एवं समान अवसर वाली चयन प्रक्रिया के तहत हुई थी। इसलिए नियमितीकरण का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता और याचिका को खारिज कर दिया गया।