बेटी के खिलौने से आया आइडिया और बदल गया क्रिकेट, कितनी होती है स्‍टंप्‍स की लंबाई, बल्लेबाजों का कवच बन गई मॉडर्न तकनीक


नई दिल्ली. क्रिकेट के मैदान पर जब कोई गेंदबाज 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गेंद फेंकता है, तो हर किसी की नजरें सिर्फ दो चीजों पर टिकी होती हैं. बल्लेबाज का बल्ला और उसके पीछे खड़े तीन स्टंप्स पर. क्रिकेट के खेल में बैट और बॉल के बाद अगर कोई साजो-सामान सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक है, तो वह हैं स्टंप्स. यह सिर्फ तीन लकड़ियां नहीं हैं, बल्कि यह बल्लेबाज की किस्मत की लकीर हैं, जो यह तय करती हैं कि वह मैदान पर रहेगा या पवेलियन लौटेगा. आइए जानते हैं क्रिकेट के इस बेहद अहम हिस्से के नियम, इसके इतिहास और आधुनिक तकनीक ‘ज़िंग विकेट सिस्टम’ (Zing Wicket System) के आने से बदले क्रिकेट के रोमांच की पूरी कहानी.

आईसीसी ने LED स्टंप और बेल्स को कब दी थी मंजूरी.

क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल है, लेकिन इसके नियम बिल्कुल निश्चित और कड़े हैं. इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (ICC) और मेलबर्न क्रिकेट क्लब (MCC) के नियमों के अनुसार, स्टंप्स और बेल्स का आकार पूरी तरह तय होता है. इंटरनेशनल क्रिकेट में स्टंप्स की लंबाई 28 इंच (71.12 सेमी) होती है. तीनों स्टंप्स के बीच का कुल गैप 9 इंच होना चाहिए ताकि गेंद इनके बीच से आसानी से न निकल सके. प्लेइंग सरफेस (पिच) के ऊपर स्टंप्स पूरी तरह से बेलनाकार होने चाहिए. इनका व्यास किसी भी स्थिति में 1.38 इंच (3.50 सेमी) से कम और 1.5 इंच (3.81 सेमी) से अधिक नहीं हो सकता. स्टंप्स के ऊपर रखी जाने वाली बेल्स के लिए नियम है कि यह स्टंप्स के ऊपर 0.5 इंच (1.27 सेमी) से अधिक फैली नहीं होनी चाहिए और विकेटों से बाहर नहीं निकली होनी चाहिए.

आईसीसी ने LED स्टंप और बेल्स को कब दी थी मंजूरी.

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अगर मैदान पर बहुत तेज हवा चल रही हो और बेल्स बार-बार अपने आप गिर रही हों, तो अंपायर आपसी सहमति से बिना बेल्स के भी मैच कराने का फैसला ले सकते हैं. ऐसी स्थिति में दोनों छोरों से बेल्स हटा दी जाती हैं और हवा शांत होने पर उन्हें वापस लगा दिया जाता है.

जब ‘खिलौने’ ने बदल दिया क्रिकेट का इतिहास
परंपरागत तौर पर स्टंप्स और बेल्स लकड़ी (आमतौर पर विलो या ऐश ट्री) के बनाए जाते थे। लेकिन कई बार मैच के दौरान अंपायरों के सामने एक बड़ी उलझन खड़ी हो जाती थी क्या बेल्स सचमुच गेंद लगने से गिरी हैं या तेज हवा के झोंके से? क्लोज रन-आउट या स्टंपिंग के मामलों में यह तय करना मुश्किल होता था कि बेल्स स्टंप्स से ठीक किस माइक्रोसेकंड पर अलग हुईं. इस उलझन को सुलझाने के लिए खेल में आधुनिक तकनीक का समावेश हुआ, जिसे हम ‘ज़िंग विकेट सिस्टम’ (Zing Wicket System) कहते हैं.

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इस क्रांतिकारी तकनीक को ऑस्ट्रेलिया के एक पूर्व क्रिकेटर ब्रोंट एकरमैन (Bronte Eckermann) ने तैयार किया था।.दिलचस्प बात यह है कि उन्हें इसे बनाने की प्रेरणा अपनी बेटी के एक चमकने वाले खिलौने को देखकर मिली थी. उन्होंने सोचा कि क्यों न ऐसी ही तकनीक क्रिकेट विकेट्स में इस्तेमाल की जाए. आईसीसी (ICC) ने जुलाई 2013 में इंटरनेशनल मैचों में इन चमकदार एलईडी विकेटों के प्रयोग की आधिकारिक इजाजत दी थी. इन स्टंप्स और बेल्स के अंदर लो-वोल्टेज बैटरी और एक छोटा माइक्रोप्रोसेसर लगा होता है.

पलक झपकते ही रोशनी
जैसे ही गेंद विकेट पर लगती है और बेल्स का स्टंप्स से संपर्क टूटता है, ठीक उसी वक्त (एक सेकंड के हजारवें हिस्से में) विकेट और बेल्स लाल रंग की तेज रोशनी से जगममा उठते हैं. इससे टीवी अंपायर को फ्रेम-बाय-फ्रेम देखकर यह तय करने में आसानी होती है कि जब गिल्लियां चमकीं, तब बल्लेबाज क्रीज के अंदर था या बाहर. इस आधुनिक तकनीक ने जहां अंपायरों का काम आसान किया, वहीं खेल में एक नया विवाद भी खड़ा कर दिया. एलईडी लाइट्स, सेंसर और बैटरी फिट होने के कारण इन आधुनिक बेल्स का वजन पारंपरिक लकड़ी की बेल्स की तुलना में काफी बढ़ गया है. क्रिकेट के मैदान पर कई बार ऐसे अजीबोगरीब नजारे देखने को मिले हैं, जब तेज गेंदबाज की बॉल सीधे स्टंप्स पर जाकर लगती है, एलईडी लाइट भी चमकती है, लेकिन बेल्स भारी होने के कारण अपनी जगह से नीचे नहीं गिरतीं.

क्रिकेट का नियम
नियम के मुताबिक, बल्लेबाज को तब तक आउट नहीं माना जा सकता जब तक कि बेल्स पूरी तरह से स्टंप्स के खांचे (Grooves) से अलग होकर नीचे न गिर जाएं. इस तकनीकी खामी की वजह से कई बार गेंद स्टंप्स पर लगने के बावजूद बल्लेबाज आउट होने से बच गए.



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