भारतीय सेना का ‘सुपर प्लान’: क्या है थिएटर कमांड, जो बदल देगा भारत के युद्ध लड़ने का तरीका?


डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय थल सेना, वायु सेना और नौसेना को एकजुट करके ‘थिएटर कमांड’ में बदलने का जो प्लान पिछले दो दशकों से सिर्फ फाइलों, कमेटियों और सेमिनारों तक सीमित था, वह अब हकीकत बनने जा रहा है।

मई के अंत में कमान संभालने वाले नए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल एनएस राजा सुब्रमणी इस ऐतिहासिक सैन्य सुधार के अंतिम खाके को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के सामने पेश करने वाले हैं। इतना ही नहीं माना जा रहा है कि जुलाई के अंत में ‘कारगिल विजय दिवस’ के बाद यह अहम प्रेजेंटेशन होगी।

अभी की व्यवस्था क्या है और नया बदलाव क्या है?

इस बात को ऐसे समझिए कि आज के समय में भारत की थल सेना, वायु सेना और नौसेना अलग-अलग काम करती हैं। इनके अपने ट्रेनिंग सेंटर हैं, प्लानिंग अलग होती है और युद्ध या संकट के समय ये आपस में केवल तालमेल बिठाती हैं, एक होकर काम नहीं करतीं।

अब समझिए थिएटर कमांड मॉडल में खास क्या?

अब इस नए प्लान के तहत पूरी सेना को भौगोलिक और जरूरत के हिसाब से एकीकृत कमांड में बांट दिया जाएगा। यानी, एक तय इलाके में थल सेना, वायु सेना और नौसेना के सैनिक और हथियार एक ही कमांडर के अधीन होंगे। वह अकेला अफसर तय करेगा कि तीनों ताकतों का इस्तेमाल कैसे करना है।

खबरें और भी

भारत में कितनी थिएटर कमांड बनेंगी?

बता दें कि शुरुआती ब्लूप्रिंट के मुताबिक, देश में मुख्य रूप से तीन थिएटर कमांड बनाई जा सकती हैं। उत्तरी कमांड, जिसका मुख्य फोकस चीन सीमा की सुरक्षा पर होगा। दूसरा पश्चिमी कमांड, जिसका जिम्मा पाकिस्तान सीमा को संभालना होगा और तीसरा मैरीटाइम कमांड यह कमांड भारत के समुद्री तटों और हिंद महासागर की सुरक्षा देखेगी।

सबसे अहम और खास बात यह है कि हर एक कमांड का नेतृत्व एक फोर-स्टार अधिकारी करेगा, जिसका ओहदा मौजूदा थल सेना, नौसेना या वायु सेना प्रमुखों के बराबर होगा।

इस बड़े सुधार की जरूरत क्यों पड़ी?

इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि आज के दौर का युद्ध सिर्फ जमीन या पानी पर नहीं लड़ा जाता, इसमें साइबर स्पेस और अंतरिक्ष भी शामिल हैं। ऐसे में अलग-अलग काम करने वाली सेनाएं तेजी से फैसला नहीं ले पातीं।

उदाहरण के तौर पर, पिछले साल पाकिस्तान के साथ हुए चार दिनों के तनाव के दौरान तीनों सेना प्रमुखों को आर्मी के वॉर रूम में एक अस्थायी सेटअप बनाकर तालमेल बिठाना पड़ा था। इस घटना ने साफ कर दिया कि भारत को एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जहां तीनों सेनाएं पहले से ही एक साथ काम कर रही हों।

पेच कहां फंसा हुआ है?

गौरतलब है कि आजादी के बाद से यह भारत का सबसे बड़ा सैन्य सुधार है, इसलिए इसे लागू करना आसान नहीं है। सबसे बड़ा विवाद फोर्स जनरेशन और फोर्स एप्लीकेशन को लेकर है।

इसका मतलब है कि सैनिकों को भर्ती करना, उन्हें ट्रेनिंग देना और हथियार खरीदना तो पुराने सेना प्रमुखों के हाथ में रहेगा, लेकिन युद्ध के समय उन सैनिकों को कैसे और कहां इस्तेमाल करना है, यह अधिकार नए थिएटर कमांडर के पास चला जाएगा। इस अधिकार क्षेत्र और बजट के बंटवारे को लेकर ही बातचीत अंतिम दौर में है।



Leave a Comment