बलूच राष्ट्रवादियों द्वारा दिए जाने वाले ऐतिहासिक दावों के अनुसार, 11 अगस्त 1947 को ब्रिटिश सरकार, पाकिस्तानी नेतृत्व और कलात के खान के बीच एक समझौता हुआ था।
balochistan independence: पाकिस्तान का दक्षिण-पश्चिमी प्रांत बलूचिस्तान एक बार फिर अलगाववादी गुट और वहां की सेना आमने-सामने आ चुके हैं। हाल ही में हुए सिलसिलेवार हमलों के बाद पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने पूरे प्रांत में बड़े पैमाने पर एक ऑपरेशन चलाया है। इस बीच सोशल मीडिया पर ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ के नाम से वायरल एक बयान ने हलचल मचा दी है। अलगाववादी गुटों द्वारा एक समानांतर सरकार बनाने, अपने झंडे और सरकार की संरचना को अपनाने का दावा किया गया है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।
इन ताजा घटनाक्रमों ने बलूचिस्तान के उस राजनीतिक इतिहास और दशकों पुराने विवाद को फिर से जिंदा कर दिया है, जो 1948 में कलात की रियासत के पाकिस्तान में विलय से जुड़ा है।
विभाजन से पहले का बलूचिस्तान
1947 में भारत के विभाजन से पहले बलूचिस्तान की राजनीतिक संरचना काफी जटिल थी। ब्रिटिश बलूचिस्तान सीधे तौर पर ब्रिटिश हुकूमत के नियंत्रण में था। बलूचिस्तान स्टेट्स यूनियन में कई स्वतंत्र रियासतें शामिल थीं, जिनमें सबसे प्रमुख और शक्तिशाली रियासत कलात थी, जिसके शासक खान मीर अहमद यार खान थे। अंग्रेजों के भारत छोड़ने के फैसले के बाद अन्य रियासतों की तरह कलात के पास भी भारत या पाकिस्तान में शामिल होने या फिर एक अलग व्यवस्था तलाशने का विकल्प था।
जब कलात ने खुद को घोषित किया आजाद देश
बलूच राष्ट्रवादियों द्वारा दिए जाने वाले ऐतिहासिक दावों के अनुसार, 11 अगस्त 1947 को ब्रिटिश सरकार, पाकिस्तानी नेतृत्व और कलात के खान के बीच एक समझौता हुआ था। इसमें कलात के स्पेशल स्टेटस को मान्यता दी गई थी। ब्रिटिश शासन की समाप्ति के ठीक अगले दिन यानी 15 अगस्त 1947 को कलात ने खुद को एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र घोषित कर दिया। खान मीर अहमद यार खान ने एक लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करते हुए बलूचिस्तान की अपनी संसद बनाई, जिसमें दो सदन शामिल थे। दार-उल-अमरा को हाउस ऑफ लॉर्ड्स और दार-उल-अवाम को हाउस ऑफ कॉमन्स की तरह जाना जाता था।
पाकिस्तान में विलय की कानूनी बहस
पाकिस्तान के गठन के बाद इस्लामाबाद और कलात के बीच भविष्य को लेकर बातचीत शुरू हुई। बलूच राष्ट्रवादियों का दावा है कि कलात की संसद ने पाकिस्तान में विलय के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से खारिज कर दिया था और तर्क दिया था कि इस क्षेत्र की अपनी एक अलग ऐतिहासिक, भाषाई और सांस्कृतिक पहचान है।
इसके विपरीत पाकिस्तान सरकार का हमेशा से यह रुख रहा है कि कलात एक रियासत थी और उसके शासक के पास विलय का अंतिम निर्णय लेने का कानूनी अधिकार था। पाकिस्तान के अनुसार, यह विलय पूरी तरह से वैध और आपसी समझौते के तहत हुआ था।
भारत का हिस्सा बन सकता था बलूचिस्तान
1948 की शुरुआत में जब पाकिस्तान की ओर से दबाव और सैन्य कार्रवाई का खतरा बढ़ने लगा तो कलात के खान ने मदद के लिए भारत का रुख किया। उन्होंने नई दिल्ली में अपने गुप्त दूत भेजे और भारत के साथ विलय या कम से कम एक औपचारिक रक्षा गठबंधन करने की इच्छा जताई। हालांकि, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इतिहासकारों के अनुसार, नेहरू के इस फैसले के पीछे तीन बड़े भू-राजनीतिक कारण थे।
भारत और कलात के बीच कोई सीधी जमीनी सीमा नहीं थी। विभाजन के तुरंत बाद भारत खुद कई आंतरिक समस्याओं और संसाधनों की कमी से जूझ रहा था। नेहरू उस समय पाकिस्तान के साथ एक और नया मोर्चा खोलकर क्षेत्रीय शांति को खतरे में नहीं डालना चाहते थे।
कैसे हुआ बलूचिस्तान का पाकिस्तान में विलय?
मार्च 1948 में पाकिस्तान ने एक कूटनीतिक चाल चलते हुए कलात की पड़ोसी रियासतों मकरान, लास बेला और खैरान के साथ अलग से विलय के समझौतों पर हस्ताक्षर कर लिए। बलूच राष्ट्रवादियों का आरोप है कि इस कदम से कलात भौगोलिक रूप से पूरी तरह कट गया और उसकी अरब सागर तक पहुंच खत्म हो गई, जिससे वह बेहद कमजोर हो गया।
इसके तुरंत बाद पाकिस्तानी सेना कलात के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में दाखिल हो गई। अंततः 27 मार्च 1948 को भारी दबाव के बीच खान मीर अहमद यार खान ने विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए। पाकिस्तान इसे एक वैध विलय मानता है, जबकि बलूच अलगाववादी आंदोलन इसे आज भी जबरन कब्जा करार देते हैं।
1948 में पहला विद्रोह
विलय के तुरंत बाद कलात के खान के छोटे भाई प्रिंस अब्दुल करीम ने पाकिस्तान के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का बिगुल फूंक दिया, जिसे पहला बलूच आतंकवाद कहा जाता है। बलूचिस्तान क्षेत्रफल के लिहाज से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है। यह प्राकृतिक गैस भंडारों और तांबे के साथ-साथ सोने के विशाल खनिजों से समृद्ध है। बलूच कार्यकर्ताओं का आरोप है कि पाकिस्तान उनके संसाधनों का दोहन करता है, लेकिन बदले में उन्हें न तो आर्थिक विकास मिलता है और न ही उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व।