भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन: कैसे चलेगी, क्यों है ख़ास और ग्रामीण भारत के लिए क्यों है बड़ी ख़बर?


देश की पहली पर्यावरण-अनुकूल ‘हाइड्रोजन ट्रेन’ हरियाणा के जींद-सोनीपत रूट पर दौड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है। रेलवे ने इस ऐतिहासिक तकनीक के शुरुआती ट्रायल और संचालन के लिए इस 89 किलोमीटर लंबे रूट को चुना है, जो रोज़ाना हज़ारों किसानों, दूध विक्रेताओं, मज़दूरों और नौकरीपेशा लोगों को आपस में जोड़ता है। यह ट्रेन पारंपरिक डीज़ल या बिजली के भारी-भरकम ग्रिड से नहीं, बल्कि पूरी तरह से ग्रीन हाइड्रोजन तकनीक से संचालित होगी। इस स्वदेशी ट्रेन की सबसे बड़ी ख़ासियत इसका पूरी तरह से प्रदूषण-मुक्त होना और बिना किसी शोर के पटरी पर सरकना है।

रेलवे के वरिष्ठ तकनीकी अधिकारियों से मिली जानकारी के मुताबिक़, इस ट्रेन में पारंपरिक डीज़ल इंजन को हटाकर उसकी जगह अत्याधुनिक ‘हाइड्रोजन फ़्यूल सेल’ (Fuel Cell) फिट किए गए हैं। यह फ़्यूल सेल तकनीक हवा से ऑक्सीजन और ट्रेन में लगे इनबिल्ट टैंक से हाइड्रोजन को लेकर एक ख़ास रासायनिक प्रक्रिया (Chemical Reaction) करती है, जिससे भारी मात्रा में बिजली पैदा होती है और इसी बिजली से ट्रेन की मोटर काम करती है। इस पूरी प्रक्रिया की सबसे ख़ूबसूरत बात यह है कि पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाने वाली कोई भी गैस, कार्बन या कालिख बाहर नहीं आती; ट्रेन के साइलेंसर से केवल साफ़ पानी की भाप (Water Vapour) और थोड़ी सी गर्मी बाहर निकलती है। इसके साथ ही, यह ट्रेन पूरी तरह वॉयसलेस होगी, जिससे पटरियों के आसपास रहने वाले ग्रामीणों और पशु-पक्षियों को तेज़ आवाज़ और कंपन से मुक्ति मिलेगी।

8 कोच में 1200 यात्रियों का सफ़र
शुरुआती चरण में रेलवे ने इसे एक प्रोटोटाइप मॉडल के तौर पर 8 कोच (डिब्बों) के रैक के साथ तैयार किया है, जो मूल रूप से एक पारंपरिक डेमू (DEMU) ट्रेन का ही बदला हुआ और आधुनिक रूप है। ग्रामीण और शहरी यात्रियों की सहूलियत को ध्यान में रखते हुए इस 8 कोच की ट्रेन के सिटिंग और स्टैंडिंग लेआउट को बेहद समझदारी से डिज़ाइन किया गया है, ताकि एक बार में लगभग 2600 यात्री आसानी से सफ़र कर सकें।

जींद से सोनीपत के बीच का यह रूट ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, जहाँ हर सुबह हज़ारों लोग अपने काम के सिलसिले में एक शहर से दूसरे शहर जाते हैं; ऐसे में इस ट्रेन का आना इस पूरे इलाक़े के लिए प्रदूषण-मुक्त यातायात का एक नया दौर शुरू करेगा।

हाइड्रोजन फॉर हेरिटेजमिशन और 2030 का बड़ा लक्ष्य
यह पूरा महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट भारतीय रेलवे के ‘हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज’ (Hydrogen for Heritage) मिशन का एक बेहद अहम हिस्सा है। रेलवे ने साल 2030 तक ख़ुद को पूरी तरह ‘नेट-ज़ीरो’ (Net-Zero) यानी शून्य कार्बन उत्सर्जक बनाने का एक बड़ा और आधिकारिक लक्ष्य रखा है। तकनीकी जानकारों का मानना है कि जींद-सोनीपत रूट पर इस ट्रेन का सफल संचालन भविष्य में देश के अन्य संवेदनशील और ऐतिहासिक हिस्सों, ख़ासकर कालका-शिला और दार्जिलिंग जैसी हेरिटेज पहाड़ी लाइनों पर भी ऐसी पर्यावरण-अनुकूल ट्रेनें चलाने का रास्ता पूरी तरह साफ़ कर देगा।

फ़िलहाल, रेलवे इस ट्रेन के सभी सुरक्षा मानकों, स्पीड ट्रायल्स और तकनीकी बारीकियों को अंतिम रूप दे रहा है, ताकि बहुत जल्द इसे आम जनता के नियमित और सुरक्षित सफ़र के लिए ट्रैक पर उतार दिया जाए।



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