India-US Relations: स्ट्रेटेजिक थिंकर डॉ. ब्रह्म चेलानी ने एक लेख में कहा है कि भारत के प्रति अब अमेरिका की नीति में चुपचाप बदलाव किया जा रहा है। वह पाकिस्तान को उपमहाद्वीप में भारत के क्षेत्रीय दबदबे को रोकने के लिए एक ‘काउंटरवेट’ के तौर पर फिर से खड़ा कर रहा है।

अमेरिका की भारत नीति नए सिरे से तैयार
- स्ट्रेटेजिक थिंकर डॉ. ब्रह्म चेलानी ने सोशल मीडिया एक्स पर ओपन मैगजीन पर लिखे एक लेख का लिंक शेयर करते हुए कहा है कि बड़ी रणनीतियां अक्सर खुलकर सामने आने से बहुत पहले, चुपचाप नीति में बदलाव के जरिए विकसित होती हैं। अमेरिका की भारत नीति के साथ भी अब यही हो रहा है। इसे चुपचाप लेकिन बुनियादी तौर पर नए सिरे से तैयार किया जा रहा है।
- इस बदलाव में दबाव वाली कूटनीति, पाकिस्तान की ओर अमेरिका का फिर से झुकाव और चीन के लिए ढांचागत तालमेल शामिल है। अमेरिकी रणनीति में भारत की भूमिका कम होती जा रही है।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान आया अहम मोड़
- डॉ. ब्रह्मचेलानी के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एक अहम मोड़ आया। सीमा पार आतंकवाद से लड़ रहे एक सहयोगी का साथ देने के बजाय ट्रंप ने डींग मारी कि उन्होंने भारत पर दबाव डालकर उसे तीन दिनों के भीतर अपनी जवाबी कार्रवाई रोकने पर मजबूर कर दिया।
- भारत अब एशिया-पैसिफिक की बड़ी रणनीति का मुख्य आधार नहीं रहा, बल्कि उपमहाद्वीप और हिंद महासागर तक सीमित एक खिलाड़ी बनकर रह गया है।
बड़ी रणनीतियां अक्सर खुलकर सामने आने से बहुत पहले चुपचाप नीति में बदलाव के जरिए विकसित होती हैं। अमेरिका की भारत नीति के साथ भी अब यही हो रहा है। इसे चुपचाप लेकिन बुनियादी तौर पर फिर से लिखा जा रहा है।
डॉ. ब्रह्मचेलानी, स्ट्रेटेजिक थिंकर
पाकिस्तान को जान-बूझकर भारत के खिलाफ खड़ा कर रहा अमेरिका
- डॉ. ब्रह्मचेलानी ने बताया कि शक्ति संतुलन की पुरानी रणनीति को फिर से अपनाया जा रहा है। IMF से बेलआउट के ज़रिए पाकिस्तान को आर्थिक मदद देकर और उसके F-16 बेड़े को आधुनिक बनाकर वॉशिंगटन जान-बूझकर पाकिस्तान को भारत के क्षेत्रीय दबदबे को रोकने के लिए एक ‘काउंटरवेट’ के तौर पर फिर से खड़ा कर रहा है।
- उन्होंने लिखा-‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने शीत युद्ध के दौर में पाकिस्तान की तरफ़ अमेरिका के झुकाव की वापसी की पुष्टि कर दी। यह झुकाव 1971 से चला आ रहा है, जब बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई के दौरान पाकिस्तानी सेना द्वारा किए गए नरसंहार में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन का प्रशासन भी शामिल था।
शक्ति संतुलन की पुरानी रणनीति को फिर से अपनाया जा रहा है। ऑपरेशन सिंदूर ने शीत युद्ध के दौर में पाकिस्तान की तरफ़ अमेरिका के झुकाव की वापसी की पुष्टि कर दी।
डॉ. ब्रह्मचेलानी, स्ट्रेटेजिक थिंकर
इंडो-पैसिफिक से इंडो हटाना भी बड़ा संकेत
स्ट्रेटेजिक थिंकर ने लिखा-अमेरिका की एशिया रणनीति में भारत के रणनीतिक महत्व में आई कमी का सबसे बड़ा संकेत वैचारिक है। पेंटागन द्वारा हाल ही में ‘इंडो-पैसिफिक’ शब्द से ‘इंडो’ उपसर्ग को हटाना, एक दशक से चले आ रहे मूल्यों पर आधारित गठबंधन बनाने के तरीके से हटकर, एक संकीर्ण और स्पष्ट रूप से लेन-देन (ट्रांजैक्शनल) पर केंद्रित ढांचे की ओर बदलाव को दर्शाता है।
रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने शांगरी-ला डायलॉग में कहा था वॉशिंगटन अब भारत को एक ऐसे मजबूत देश के तौर पर देखता है जो दक्षिण एशिया और हिंद महासागर में शक्ति का स्थानीय संतुलन बनाए रखने के लिए अपने हितों के अनुसार काम करता है।
डॉ. ब्रह्मचेलानी, स्ट्रेटेजिक थिंकर
दो दशकों तक अमेरिका ने भारत के साथ करीबी रिश्ते बनाए
डॉ. ब्रह्मचेलानी ने लिखा-दो दशकों से ज्यादा समय तक वॉशिंगटन ने उभरते हुए लोकतांत्रिक भारत को एक अच्छी चीज के तौर पर देखा, जो विस्तारवादी चीन के मुकाबले आर्थिक और सैन्य संतुलन बनाने वाला देश था। अमेरिका की अलग-अलग सरकारों ने भारत के साथ नजदीकी रिश्ते बनाए, जिससे यह रिश्ता वॉशिंगटन में दोनों पार्टियों (रिपब्लिकन और डेमोक्रेट) के बीच आम सहमति का एक दुर्लभ आधार बन गया।
भारत को अब भी अमेरिका से उम्मीद
- डॉ. ब्रह्मचेलानी के अनुसार, इस सदी में अलग-अलग सरकारों के दौरान नई दिल्ली ने वॉशिंगटन के साथ रणनीतिक साझेदारी में भारी निवेश किया है। भारत को उम्मीद है कि करीबी रिश्तों से उसकी आर्थिक और रणनीतिक तरक्की में मदद मिलेगी और इससे भारत के पड़ोस से जुड़ी चिंताओं के प्रति अमेरिका का रवैया और ज्यादा संवेदनशील होगा।
- भारत आज भी इस रिश्ते को अपने लंबे समय के हितों के लिए बहुत अहम मानता है। अमेरिका के साथ उसके कई अहम भू-राजनीतिक हित जुड़े हैं। जैसे आतंकवाद से निपटना, चीन के बढ़ते प्रभाव को संभालना और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना। यह क्षेत्र पहले से ही दुनिया की जीडीपी का लगभग आधा हिस्सा (परचेजिंग-पावर के हिसाब से) और एक-तिहाई से ज़्यादा हिस्सा (नॉमिनल हिसाब से) पैदा करता है।
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत के प्रति उल्टा नजरिया
- ब्रह्मचेलानी कहते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान भारत-अमेरिका संबंध अपने चरम पर थे। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनके अच्छे तालमेल ने बड़ी भूमिका निभाई। फरवरी 2020 में ट्रंप ने मोदी से मुलाकात की थी और एक ऐसी रैली को संबोधित किया था जो किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा की गई अब तक की सबसे बड़ी रैली थी।
- उम्मीद थी कि जनवरी 2025 में व्हाइट हाउस में ट्रंप की वापसी से उस विरासत को और आगे बढ़ाया जाएगा। लेकिन इसके उलट, संबंध तेजी से बिगड़े हैं, जैसा कि भारत के प्रति सहानुभूति रखने वाले जानकार भी मानते हैं।
- अमेरिकी कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘मई 2025 से राष्ट्रपति ट्रंप ने ऐसे कदम उठाए हैं जिनसे जानकारों के मुताबिक यह साझेदारी खतरे में पड़ गई है।’ हैरानी की बात यह है कि यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है जब ट्रंप का चीन के प्रति रुख नरम हुआ है और वे पाकिस्तान को अपना रहे हैं, जो उनके पहले कार्यकाल के रुख से बिल्कुल उलट है।
टैरिफ और यूक्रेन युद्ध में भारत की तटस्थता ने बदला रुख
- डॉ. ब्रह्मचेलानी ने लिखा-इस बारे में बहुत कुछ कहा गया है कि कैसे ट्रंप के सार्वजनिक अपमान और टैरिफ को हथियार बनाने की नीति ने भारत के साथ रिश्तों में तनाव पैदा किया। लेकिन व्हाइट हाउस में उनकी वापसी से पहले ही ये रिश्ते दबाव में थे।
- वहीं, यूक्रेन संघर्ष में भारत की तटस्थता उन विवादों की शुरुआत भर थी, जिन्होंने दोनों देशों के आपसी रिश्तों में खटास पैदा कर दी। भले ही अमेरिका ने भारत को बड़े पैमाने पर हथियार बेचे। फिर भी यह साफ हो गया था कि वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच कभी मजबूत रही रणनीतिक साझेदारी कमजोर पड़ रही थी।
- भारत के प्रति इस ठंडे और लेन-देन वाले नजरिए की पुष्टि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति से भी होती है। 2017 की पिछली रणनीति के विपरीत इसमें भारत या क्वाड (Quad) का बमुश्किल ही कोई ज़िक्र है और नई दिल्ली के साथ संबंधों को केवल ‘व्यापारिक संबंध सुधारने’ के संकीर्ण दायरे में देखा गया है।
क्रिस्टोफर लैंडो की वो बात याद कीजिए
- डॉ. ब्रह्मचेलानी ने लिखा-इस बदलाव को सबसे बेहतर तरीके से मार्च में नई दिल्ली में अमेरिकी डिप्टी सेक्रेटरी ऑफ स्टेट क्रिस्टोफर लैंडौ की उस साफ-साफ कही गई बात से समझा जा सकता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि वॉशिंगटन चीन वाली गलती नहीं दोहराएगा और भारत को आर्थिक रूप से स्वतंत्र रूप से विकसित होकर अमेरिका से आगे नहीं निकलने देगा।
- सबसे कड़वी सच्चाई यह है कि अमेरिकी रणनीति में भारत का दर्जा ‘इंडो-पैसिफिक व्यवस्था’ के ‘मुख्य आधार’ (linchpin) से घटकर दक्षिण एशिया और हिंद महासागर तक सीमित ‘स्थानीय भूमिका निभाने वाले देश’ (localised actor) का हो गया है।
