नई दिल्ली। साल 1969 में, अहमदाबाद के एक सरकारी दफ्तर में लैब टेक्नीशियन के तौर पर काम करने वाले एक आम आदमी ने काम के घंटों के बाद कुछ अलग करने का फैसला किया। उन्होंने अपने घर के पिछवाड़े में डिटर्जेंट पाउडर बनाना शुरू किया और साइकिल पर घर-घर जाकर उसे बेचना शुरू किया। यह कहानी है निरमा के फ़ाउंडर करसनभाई पटेल की, जिन्होंने अकेले ही हिंदुस्तान यूनिलीवर (HUL) जैसी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी के मजबूत दबदबे को हिलाकर रख दिया।
₹3 वाले पाउडर ने बड़ी कंपनियों को कैसे चुनौती दी?
उस समय, बाज़ार में ‘सर्फ़’ का दबदबा था, जिसकी कीमत ₹10 से ₹15 प्रति किलोग्राम के बीच थी। यह कीमत देश के मध्यम और कम आय वाले वर्गों के बजट से बाहर थी। केमिस्ट्री की जानकारी रखने वाले करसनभाई ने एक फ़ॉर्मूला तैयार किया और बाज़ार में सिर्फ़ ₹3 प्रति किलोग्राम की कीमत पर पीले रंग का डिटर्जेंट पाउडर लॉन्च किया।
उन्होंने अपनी बेटी निरुपमा के नाम पर इसका नाम ‘निरमा’ रखा। शुरुआती तीन सालों तक, वे खुद साइकिल पर घूम-घूमकर इसे बेचते थे और ग्राहकों के संतुष्ट न होने पर पैसे वापस करने की गारंटी भी देते थे।
निरमा को नंबर वन बना दिया?
1980 के दशक की शुरुआत में, जब ब्रांड को कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ा, तो करसनभाई ने एक बड़ा जोखिम उठाया। उन्होंने बाज़ार से निरमा का लगभग 90% स्टॉक वापस मंगा लिया। जब दुकानों में निरमा की कमी के कारण इसकी मांग बढ़ गई, तो उन्होंने एक यादगार टेलीविज़न विज्ञापन लॉन्च किया, “वॉशिंग पाउडर निरमा।”
सफेद फ्रॉक पहने गोल-गोल घूमती छोटी बच्ची और उस जिंगल ने ऐसा जादू किया कि जब यह प्रोडक्ट दोबारा बाज़ार में आया, तो इसकी बिक्री ‘सर्फ़’ से भी ज़्यादा हो गई। बाज़ार में इस नई चुनौती से घबराकर, HUL को जवाब में ‘व्हील’ डिटर्जेंट लॉन्च करना पड़ा।
आज निरमा का बिज़नेस साम्राज्य कितना बड़ा है?
डिटर्जेंट से शुरू हुआ यह सफ़र यहीं नहीं रुका। साबुन और नमक के अलावा, करसनभाई ने सीमेंट, फार्मास्यूटिकल्स और केमिकल्स जैसे भारी उद्योगों में भी अपना बिज़नेस बढ़ाया। 2016 में, उन्होंने लगभग 1.4 अरब डॉलर में लाफार्जहोल्सिम (LafargeHolcim) का सीमेंट बिज़नेस खरीदा। शिक्षा के क्षेत्र में, उन्होंने ‘निरमा यूनिवर्सिटी’ की स्थापना की।