केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया कि अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के आरक्षण पर क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू नहीं होता। सरकार ने एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने और सरकारी नौकरियों में अधिक समान वितरण के लिए नई आरक्षण नीति बनाने की मांग वाली जनहित याचिकाओं का विरोध किया है।
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने यह हलफनामा दाखिल किया है। इसमें कहा गया कि संविधान पीठ के अशोक कुमार ठाकुर बनाम भारत संघ फैसले में स्पष्ट किया गया था कि क्रीमी लेयर का सिद्धांत सिर्फ अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी)/सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) के संदर्भ में लागू है, न कि एससी और एसटी पर।
केंद्र ने कहा कि आय आधारित प्राथमिकता या आरक्षण नीति में किसी भी बदलाव से पहले व्यापक समीक्षा और सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों पर आधारित गहन अध्ययन आवश्यक है। साथ ही, अदालत कार्यपालिका को किसी विशेष तरीके से नीति बनाने का निर्देश नहीं दे सकती, क्योंकि यह न्यायिक क्षेत्राधिकार से बाहर का विषय है। सरकार ने रामाशंकर प्रजापति एवं अन्य तथा अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की जनहित याचिकाओं को कानूनन विचारणीय न बताते हुए खारिज करने की मांग की है।
हलफनामे में कहा गया है कि याचिकाओं में न तो संविधान की व्याख्या से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न उठाया गया है और न ही किसी मौलिक अधिकार के उल्लंघन का मामला बनता है। इसलिए ये याचिकाएं संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत स्वीकार्य नहीं हैं। हलफनामे में यह भी कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के तहत अधिसूचित एससी और एसटी की सूची में किसी भी जाति या जनजाति को शामिल करने या हटाने का अधिकार केवल संसद को है। राज्य सरकारें, अदालतें या अन्य प्राधिकरण इस सूची में बदलाव नहीं कर सकते।
सभी याचिकाओं को भ्रामक- केंद्र
केंद्र ने इन सभी याचिकाओं को भ्रामक बताया। सरकार के मुताबिक एससी, एसटी और एसईबीसी के कल्याण से जुड़ी अधिकांश योजनाओं में, सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण को छोड़कर, आय आधारित पात्रता (मीन्स टेस्ट) पहले से लागू है ताकि लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंच सके। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 11 अगस्त को रामाशंकर प्रजापति एवं अन्य की याचिका पर और इस वर्ष 12 जनवरी को अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर केंद्र व राज्यों को नोटिस जारी किया था। इन याचिकाओं में एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने और आरक्षित वर्गों के भीतर आय आधारित प्राथमिकता की व्यवस्था की मांग की गई है।
शिवसेना विवाद…पार्टी को एक आदमी का संगठन बना दिया: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोकतांत्रिक सिद्धांत सिर्फ संस्थाओं तक ही सीमित नहीं रहने चाहिए। राजनीतिक दलों को भी इनका पालन करना चाहिए। शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी शिवसेना के बदले हुए संविधान पर सवाल उठाते हुए की। अदालत ने कहा कि ऐसा लगता है कि पार्टी को असल में एक व्यक्ति का संगठन बना दिया गया है।
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की तीन सदस्यीय पीठ उद्धव ठाकरे गुट की उन याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई कर रही थी, जिनमें चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना माना गया है। सीजेआई ने कहा, जब हम लोकतांत्रिक सिद्धांतों और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने वाली संस्थाओं की बात करते हैं तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि क्या राजनीतिक दल को भी लोकतांत्रिक तरीके से काम करना चाहिए। जस्टिस बागची ने चुनाव आयोग के आदेश का जिक्र करते हुए कहा कि आयोग ने खुद डॉ. भीमराव आंबेडकर के संस्थागत ईमानदारी संबंधी विचारों का जिक्र किया है। दलबदल को सांविधानिक पाप बताया है। उन्होंने कहा कि आज दलबदल पाप की बजाय सम्मान का प्रतीक बन गया लगता है।