सवाल यह है कि यदि हिमालय के इस सबसे संवेदनशील क्षेत्र में भूकंप के कारण यह विशाल बांध टूटा तो भारत के असम और पूर्वोत्तर राज्यों में आने वाली जल-प्रलय का हश्र क्या होगा?
अरुणाचल प्रदेश से लगी भारत-चीन सीमा से महज 50 किलोमीटर की दूरी पर तिब्बत में दुनिया का सबसे बड़ा जलविद्युत प्रोजेक्ट मेदोग हाइड्रोपावर स्टेशन बन रहा है। यह परियोजना एक बड़े भूगर्भीय खतरे की जद में है। चीन के सरकारी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण से जुड़े वैज्ञानिकों ने भी इसको लेकर चिंता जताई है। चीनी वैज्ञानिकों के अध्ययन में खुलासा हुआ है कि यह विशालकाय बांध एक बेहद सक्रिय फॉल्ट लाइन यानी भूकंपीय दरार के ठीक ऊपर बनाया जा रहा है। इस खुलासे ने ब्रह्मपुत्र नदी पर बन रहे इस मेगा-प्रोजेक्ट की संरचनात्मक सुरक्षा को लेकर नए और गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, सेडिमेंट्री जियोलॉजी एंड टेथियन जियोलॉजी जर्नल में प्रकाशित एक चीनी शोध पत्र में शोधकर्ताओं ने यारलुंग त्सांगपो नदी पर स्थित मेदोग बांध स्थल के ठीक नीचे पैझेन फॉल्ट की पहचान की है। चेंगदू यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी और चीन भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के विशेषज्ञों द्वारा किए गए इस अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यह फॉल्ट लाइन इस महाबांध की मजबूती को गंभीर रूप से कमजोर कर सकती है। आपको बता दें कि तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी को त्सांगपो के नाम से जाना जाता है।
क्या है मेदोग बांध परियोजना?
तैयार हो जाने के बाद यह दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना होगी। इसकी क्षमता 60000 मेगावाट होगी। यह चीन के ही मौजूदा थ्री गॉर्ज बांध से करीब तीन गुना अधिक बिजली यानी कि सालाना 300 अरब किलोवाट पैदा करेगा। इस बांध को तैयार करने में एक ट्रिलियन युआन यानी कि लगभग 137 अरब डॉलर खर्च होंगे। चीन ने दिसंबर 2024 में इसे मंजूरी दी थी, जिसके बाद जुलाई 2025 में इसका निर्माण शुरू हुआ। साल 2033 तक इसे पूरी तरह चालू करने का लक्ष्य है।
तिब्बत के आंग्सी ग्लेशियर से निकलने वाली यारलुंग त्सांगपो नदी तिब्बत में 1,625 किमी बहने के बाद नामचा बरवा चोटी के पास ग्रेट बेंड बनाती हुई भारत के अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है। यहां इसे ब्रह्मपुत्र कहा जाता है। भारत में 918 किमी बहने के बाद यह बांग्लादेश में जमुना नदी के नाम से प्रवेश करती है और बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
क्यों बना हुआ है महाखतरा?
रिपोर्ट के मुताबिक, पैझेन फॉल्ट प्लीस्टोसिन युग करीब 26 लाख साल पहले शुरू हुए हिमयुग के काल से सक्रिय है और आज भी इसमें टेक्टोनिक हलचल के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है, “पैझेन फॉल्ट के कारण आसपास के बांधों, सड़कों, पुलों, सुरंगों और जलाशय क्षेत्र की संरचनात्मक स्थिरता पर गहरा असर पड़ेगा। भविष्य में इस फॉल्ट लाइन में होने वाली कोई भी हलचल इस पूरे प्रोजेक्ट की सुरक्षा को खतरे में डाल सकती है।”
रिसर्च के अनुसार, जिस पै विलेज इलाके में यह बांध बन रहा है, वह चीन के सबसे अधिक भूकंप संभावित क्षेत्रों में से एक है। साल 2017 में तिब्बत में आया 6.9 तीव्रता का भूकंप इसी फॉल्ट के उत्तरी छोर पर आया था जो इसके सक्रिय होने का पुख्ता प्रमाण है। बार-बार होने वाली हलचल ने नीचे की चट्टानों को खोखला और कमजोर कर दिया है, जिससे यह जमीन 60,000 मेगावाट के भारी-भरकम कंक्रीट के ढांचे और विशाल जलाशय का वजन संभालने में सक्षम नहीं रह गई है।
जलाशय से आ सकती है विनाशकारी तबाही
वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि जलाशय के आसपास के पहाड़ों की बनावट बेहद ढीली और कमजोर है। एक बार जब इस विशाल बांध में पानी भरा जाएगा तो पानी के लंबे रिसाव, भूकंप और फॉल्ट लाइन की हलचल के चलते इस पहाड़ी क्षेत्र में बेहद आसानी से बड़े भूस्खलन और पहाड़ों के ढहने की घटनाएं हो सकती हैं। इससे वहां काम करने वाले कर्मियों और बांध के बुनियादी ढांचे को सीधा खतरा पैदा हो जाएगा।
भारत और बांग्लादेश के लिए क्या हैं मायने?
यह परियोजना ऐसे समय में चर्चा में आई है जब भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौते को लेकर जारी तनाव के बीच बीजिंग और इस्लामाबाद अपनी हर मौसम की दोस्ती का प्रदर्शन कर रहे हैं। भारत और बांग्लादेश लगातार इस बांध के निचले इलाकों पर पड़ने वाले प्रभावों की निगरानी कर रहे हैं। हालांकि, जलविज्ञानी और विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र का पानी पूरी तरह रोकने की आशंका से कहीं ज्यादा बड़ा खतरा भूगर्भीय है।
आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के नदी और जल विशेषज्ञ निलंजन घोष के अनुसार, चीन चाहकर भी पानी का रुख नहीं मोड़ सकता क्योंकि ऐसा करने पर गाद जमा होने के कारण खुद चीन के ऊपरी इलाकों में विनाशकारी बाढ़ आ जाएगी। इसके अलावा ब्रह्मपुत्र के कुल पानी में तिब्बत का हिस्सा केवल 10 से 15 प्रतिशत ही है। भारत में प्रवेश करने के बाद मॉनसून और सहायक नदियां ही इसे विशाल बनाती हैं।
इस परियोजना को लेकर सबसे बड़ा और डरावना सवाल कूटनीतिक नहीं, बल्कि सुरक्षा का है। जब खुद चीन सरकार समर्थित वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि यह दुनिया का सबसे बड़ा बांध एक सक्रिय भूकंपीय दरार पर बन रहा है तो सवाल यह नहीं है कि क्या चीन पानी रोकेगा, बल्कि सवाल यह है कि यदि हिमालय के इस सबसे संवेदनशील क्षेत्र में भूकंप के कारण यह विशाल बांध टूटा तो भारत के असम और पूर्वोत्तर राज्यों में आने वाली जल-प्रलय का हश्र क्या होगा?