China proposed corridor Bangladesh: बांग्लादेश के पास विदेशी मुद्रा भंडार काफी कम है और विदेशी निवेश भी काफी कम है। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक विकास दर लगभग 3.9 प्रतिशत है। वहीं चीन पर ज्यादा निर्भरता के साथ कुछ जोखिम भी जुड़े हैं।

चीन के लिए इससे हिंद महासागर तक पहुंचने का एक तेज रास्ता बनेगा और व्यस्त और असुरक्षित ‘मलक्का जलडमरूमध्य’ पर उसकी निर्भरता कम होगी। जबकि बांग्लादेश के लिए यह प्रोजेक्ट ज्यादा निवेश, ज्यादा नौकरियों और एशिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों में से एक पर मजबूत स्थिति का वादा करता है। लेकिन बांग्लादेश में बहस इस बात को लेकर चल रही है कि चीनी प्रोजेक्ट में शामिल होने से कहीं उसका भी हस्र श्रीलंगा और पाकिस्तान जैसा ना हो जाए।
चीन के प्रोजेक्ट को लेकर बांग्लादेश में हिचकिचाहट क्यों है?
बांग्लादेशी जियो पॉलिटिकल एक्सपर्ट मोहम्मद मजहर उद्दीन ने द डेली स्टार में लिखा है कि कॉरिडोर का यह आइडिया कोई नया नहीं है। 1999 में इसी रूट को बांग्लादेश-चीन-इंडिया-म्यांमार (BCIM) कॉरिडोर के नाम से जाना जाता था। भारत भी इसका हिस्सा था। लेकिन बाद में नई दिल्ली इससे अलग हो गई क्योंकि उसे चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ और भारत की सीमाओं के पास चीन के बढ़ते असर की चिंता थी।
इसके बाद BCIM में ‘I’ हटा दिया गया और इस रूट को भारत से गुजारने के बजाय उससे बचाकर ले जाने का नया प्रस्ताव रखा गया। इस कॉरिडोर में चीन की सबसे ज्यादा दिलचस्पी है। इस प्रोजेक्ट से उसका 1,700 किलोमीटर लंबा चीन-म्यांमार इकोनॉमिक कॉरिडोर और बढ़ जाएगा।
लेकिन बांग्लादेश के लिए स्थिति ज्यादा पेचीदा है। चीनी पैसा आकर्षक है क्योंकि यह आसानी से मिल जाता है। चीन पहले से ही बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है लेकिन व्यापारिक रिश्ते में बहुत असंतुलन है। बांग्लादेश चीन को जितने डॉलर का सामान बेचता है उसके मुकाबले वह चीन से लगभग चार डॉलर का सामान खरीदता है। पिछले बीस सालों में यह व्यापार घाटा लगभग 1,600 प्रतिशत बढ़ गया है।
बांग्लादेश को सता रहा चीन के ‘कर्ज जाल’ में फंसने का डर
मोहम्मद मजहर उद्दीन ने लिखा कि बांग्लादेश के पास विदेशी मुद्रा भंडार काफी कम है और विदेशी निवेश भी काफी कम है। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक विकास दर लगभग 3.9 प्रतिशत है। वहीं चीन पर ज्यादा निर्भरता के साथ कुछ जोखिम भी जुड़े हैं। जब विदेश मंत्री खलीलुर रहमान से पूछा गया कि बीजिंग दौरे से कितनी आर्थिक मदद मिली है तो उन्होंने कड़े शब्दों में जवाब दिया कि बांग्लादेश वहां ‘भीख का कटोरा लेकर’ नहीं गया था। उन्होंने यह भी कहा कि ढाका अभी सिर्फ कॉरिडोर पर विचार कर रहा है और उसने अभी तक कोई फैसला नहीं लिया है और वह तभी आगे बढ़ेगा जब रखाइन में शांति होगी।
लेकिन दूसरा सवाल ये है कि आखिर बांग्लादेश कितना सामान बनाता है जिसे वो इस कॉरिडोर से बेचेगा? इस कॉरिडोर से वो किसे सामान बेचेगा? चीन भला बांग्लादेशी सामान क्यों खरीदेगा? इसीलिए सिर्फ भारत को ‘चिढ़ाने’ के चक्कर में तारिक रहमान कहीं बांग्लादेश के गले में पत्थर ने बांध दें!
बांग्लादेश पर भारत से संबंध खराब होने का डर
मोहम्मद मजहर उद्दीन के मुताबिक भारत ने आधिकारिक तौर पर कुछ खास नहीं कहा है लेकिन भारतीय मीडिया में इस प्रोजेक्ट को लेकर ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ के करीब चीन के पहुंचने का डर है। यह कॉरिडोर पूर्वोत्तर भारत के करीब है। दूसरी तरफ ढाका और नई दिल्ली के बीच संबंध भी तनावपूर्ण हैं। भारत के लिए, मोंगला, तीस्ता समझौता और CMBC कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं सामान्य व्यापारिक योजनाएँ नहीं लगतीं। इन्हें भारत में रणनीतिक रूप से घेरने की चीन की बढ़ती कोशिशों के संकेत के तौर पर देखा जाता है।
अमेरिका भी बांग्लादेश पर चुपचाप लेकिन असल दबाव बना रहा है। फरवरी 2026 में वाशिंगटन ने एक व्यापार समझौता किया जिससे बांग्लादेश का टैरिफ घटकर 19 प्रतिशत हो गया लेकिन इस समझौते में ऐसी शर्तें भी थीं जिनसे ढाका के लिए चीन और रूस जैसे देशों के बहुत करीब जाना मुश्किल हो गया। अमेरिका को नाराज करना बांग्लादेश के लिए आसान नहीं है। यह इसलिए मायने रखता है क्योंकि अमेरिका बांग्लादेश से बड़ी मात्रा में कपड़े खरीदता है और बांग्लादेश के साथ उसका व्यापार लगभग 12 अरब डॉलर का है। इससे वाशिंगटन को काफी प्रभाव मिलता है। CMBC कॉरिडोर की दिशा में बांग्लादेश का हर कदम अमेरिका की ओर से और ज्यादा दबाव का कारण बन सकता है।
भारत से मोल-भाव के लिए बांग्लादेश करेगा प्रोजेक्ट का इस्तेमाल
लिहाजा मोहम्मद मजहर उद्दीन का मानना है कि यह कॉरिडोर जल्द नहीं बनेगा। म्यांमार के हालात की वजह से असल सड़क और रेल लिंक का बनना कई सालों, शायद एक दशक या उससे ज्यादा समय तक लगभग नामुमकिन है। लेकिन इससे जुड़ी कूटनीति जारी रहेगी क्योंकि चीन और बांग्लादेश, दोनों को ही इन बातचीत से कुछ न कुछ फायदा होगा। चीन यह दिखा सकता है कि उसका असर बढ़ रहा है जबकि बांग्लादेश इस प्रोजेक्ट का इस्तेमाल भारत और अमेरिका के साथ अपनी मोल-भाव की स्थिति को मजबूत करने के लिए कर सकता है।
