China-Bangladesh Corridor: बांग्लादेशी एक्सपर्ट का खुलासा, चीनी प्रोजेक्ट में शामिल होने की तारिक रहमान क्यों नहीं दिखा रहे हिम्मत? – china myanmar bangladesh economic corridor nearly impossible tarique rahman fear us india


China proposed corridor Bangladesh: बांग्लादेश के पास विदेशी मुद्रा भंडार काफी कम है और विदेशी निवेश भी काफी कम है। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक विकास दर लगभग 3.9 प्रतिशत है। वहीं चीन पर ज्यादा निर्भरता के साथ कुछ जोखिम भी जुड़े हैं।

China-Myanmar-Bangladesh Economic Corridor
चीनी कॉरिडोर पर बांग्लादेशी एक्सपर्ट की चेतावनी
बीजिंग/ढाका: चीन ने बांग्लादेश को ‘चायना-बांग्लादेश-म्यांमार’ में शामिल होने का प्रस्ताव दिया है। तारिक रहमान ने जब पिछले महीने चीन का दौरा किया था तो दोनों देशों ने अपने डिप्लोमेटिक इतिहास में तीसरी बार ‘संयुक्त बयान’ जारी किए। चीन के मुख्य प्रस्तावों में से एक ‘चीन-म्यांमार-बांग्लादेश इकोनॉमिक कॉरिडोर’ (CMBC) था। इस योजना के तहत चीन के जमीन से घिरे युन्नान प्रांत के कुनमिंग से म्यांमार के मांडले होते हुए बांग्लादेश के चट्टोग्राम और मोंगला बंदरगाहों तक सड़क और रेल मार्ग बनाया जाने का प्रस्ताव रखा गया है।

चीन के लिए इससे हिंद महासागर तक पहुंचने का एक तेज रास्ता बनेगा और व्यस्त और असुरक्षित ‘मलक्का जलडमरूमध्य’ पर उसकी निर्भरता कम होगी। जबकि बांग्लादेश के लिए यह प्रोजेक्ट ज्यादा निवेश, ज्यादा नौकरियों और एशिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों में से एक पर मजबूत स्थिति का वादा करता है। लेकिन बांग्लादेश में बहस इस बात को लेकर चल रही है कि चीनी प्रोजेक्ट में शामिल होने से कहीं उसका भी हस्र श्रीलंगा और पाकिस्तान जैसा ना हो जाए।

चीन के प्रोजेक्ट को लेकर बांग्लादेश में हिचकिचाहट क्यों है?

बांग्लादेशी जियो पॉलिटिकल एक्सपर्ट मोहम्मद मजहर उद्दीन ने द डेली स्टार में लिखा है कि कॉरिडोर का यह आइडिया कोई नया नहीं है। 1999 में इसी रूट को बांग्लादेश-चीन-इंडिया-म्यांमार (BCIM) कॉरिडोर के नाम से जाना जाता था। भारत भी इसका हिस्सा था। लेकिन बाद में नई दिल्ली इससे अलग हो गई क्योंकि उसे चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ और भारत की सीमाओं के पास चीन के बढ़ते असर की चिंता थी।

इसके बाद BCIM में ‘I’ हटा दिया गया और इस रूट को भारत से गुजारने के बजाय उससे बचाकर ले जाने का नया प्रस्ताव रखा गया। इस कॉरिडोर में चीन की सबसे ज्यादा दिलचस्पी है। इस प्रोजेक्ट से उसका 1,700 किलोमीटर लंबा चीन-म्यांमार इकोनॉमिक कॉरिडोर और बढ़ जाएगा।

लेकिन बांग्लादेश के लिए स्थिति ज्यादा पेचीदा है। चीनी पैसा आकर्षक है क्योंकि यह आसानी से मिल जाता है। चीन पहले से ही बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है लेकिन व्यापारिक रिश्ते में बहुत असंतुलन है। बांग्लादेश चीन को जितने डॉलर का सामान बेचता है उसके मुकाबले वह चीन से लगभग चार डॉलर का सामान खरीदता है। पिछले बीस सालों में यह व्यापार घाटा लगभग 1,600 प्रतिशत बढ़ गया है।

बांग्लादेश को सता रहा चीन के ‘कर्ज जाल’ में फंसने का डर

मोहम्मद मजहर उद्दीन ने लिखा कि बांग्लादेश के पास विदेशी मुद्रा भंडार काफी कम है और विदेशी निवेश भी काफी कम है। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक विकास दर लगभग 3.9 प्रतिशत है। वहीं चीन पर ज्यादा निर्भरता के साथ कुछ जोखिम भी जुड़े हैं। जब विदेश मंत्री खलीलुर रहमान से पूछा गया कि बीजिंग दौरे से कितनी आर्थिक मदद मिली है तो उन्होंने कड़े शब्दों में जवाब दिया कि बांग्लादेश वहां ‘भीख का कटोरा लेकर’ नहीं गया था। उन्होंने यह भी कहा कि ढाका अभी सिर्फ कॉरिडोर पर विचार कर रहा है और उसने अभी तक कोई फैसला नहीं लिया है और वह तभी आगे बढ़ेगा जब रखाइन में शांति होगी।
लेकिन दूसरा सवाल ये है कि आखिर बांग्लादेश कितना सामान बनाता है जिसे वो इस कॉरिडोर से बेचेगा? इस कॉरिडोर से वो किसे सामान बेचेगा? चीन भला बांग्लादेशी सामान क्यों खरीदेगा? इसीलिए सिर्फ भारत को ‘चिढ़ाने’ के चक्कर में तारिक रहमान कहीं बांग्लादेश के गले में पत्थर ने बांध दें!

बांग्लादेश पर भारत से संबंध खराब होने का डर

मोहम्मद मजहर उद्दीन के मुताबिक भारत ने आधिकारिक तौर पर कुछ खास नहीं कहा है लेकिन भारतीय मीडिया में इस प्रोजेक्ट को लेकर ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ के करीब चीन के पहुंचने का डर है। यह कॉरिडोर पूर्वोत्तर भारत के करीब है। दूसरी तरफ ढाका और नई दिल्ली के बीच संबंध भी तनावपूर्ण हैं। भारत के लिए, मोंगला, तीस्ता समझौता और CMBC कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं सामान्य व्यापारिक योजनाएँ नहीं लगतीं। इन्हें भारत में रणनीतिक रूप से घेरने की चीन की बढ़ती कोशिशों के संकेत के तौर पर देखा जाता है।
अमेरिका भी बांग्लादेश पर चुपचाप लेकिन असल दबाव बना रहा है। फरवरी 2026 में वाशिंगटन ने एक व्यापार समझौता किया जिससे बांग्लादेश का टैरिफ घटकर 19 प्रतिशत हो गया लेकिन इस समझौते में ऐसी शर्तें भी थीं जिनसे ढाका के लिए चीन और रूस जैसे देशों के बहुत करीब जाना मुश्किल हो गया। अमेरिका को नाराज करना बांग्लादेश के लिए आसान नहीं है। यह इसलिए मायने रखता है क्योंकि अमेरिका बांग्लादेश से बड़ी मात्रा में कपड़े खरीदता है और बांग्लादेश के साथ उसका व्यापार लगभग 12 अरब डॉलर का है। इससे वाशिंगटन को काफी प्रभाव मिलता है। CMBC कॉरिडोर की दिशा में बांग्लादेश का हर कदम अमेरिका की ओर से और ज्यादा दबाव का कारण बन सकता है।

भारत से मोल-भाव के लिए बांग्लादेश करेगा प्रोजेक्ट का इस्तेमाल

लिहाजा मोहम्मद मजहर उद्दीन का मानना है कि यह कॉरिडोर जल्द नहीं बनेगा। म्यांमार के हालात की वजह से असल सड़क और रेल लिंक का बनना कई सालों, शायद एक दशक या उससे ज्यादा समय तक लगभग नामुमकिन है। लेकिन इससे जुड़ी कूटनीति जारी रहेगी क्योंकि चीन और बांग्लादेश, दोनों को ही इन बातचीत से कुछ न कुछ फायदा होगा। चीन यह दिखा सकता है कि उसका असर बढ़ रहा है जबकि बांग्लादेश इस प्रोजेक्ट का इस्तेमाल भारत और अमेरिका के साथ अपनी मोल-भाव की स्थिति को मजबूत करने के लिए कर सकता है।

अभिजात शेखर आजाद

लेखक के बारे मेंअभिजात शेखर आजादअभिजात शेखर आजाद नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में इंटरनेशनल अफेयर्स, डिफेंस जर्नलिस्ट हैं। उनके पास अलग अलग न्यूज चैनलों और डिजिटल पत्रकारिता में करीब 17 सालों का अनुभव है। वे अंतरराष्ट्रीय राजनीति (International Politics), वैश्विक कूटनीति (Global Diplomacy) और रक्षा रणनीति (Defense Strategy) के विशेषज्ञ माने जाते हैं। उन्होंने इन वर्षों में 3 अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध, इजरायल-हमास युद्ध, मिडिल ईस्ट, अफगानिस्तान युद्ध, ISIS के खिलाफ संघर्ष, भारत पाकिस्तान संघर्ष जैसे अहम अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं को कवर किया है।

अभिजात शेखर आजाद वैश्विक राजनीति का विश्लेषण करते हैं और भारत पर उसका क्या असर होगा, इसका एनालिसिस करते हुए विश्लेषणात्मक स्टोरी लिखते हैं। इसके अलावा इंटरनेशनल डिफेंस सेक्टर पर उनकी खास नजर होती है। हथियारों की खरीद बिक्री, अंतर्राष्ट्रीय हथियार व्यापार पर वो करीबी नजर रखते हैं। रक्षा जगत में अंदरूनी पहुंच होने की वजह से डिफेंस मामलों पर उनकी सटीक खबरों का काफी प्रभाव है।

विशेषज्ञता- इंटरनेशनल डिप्लोमेसी के साथ साथ डिफेंस सेक्टर की खबरों के विश्लेषण में अच्छी पकड़। भारतीय वायुसेना और नौसेना और डिफेंस इंटेलिजेंस में पैठ। जियो-पॉलिटिक्स को लेकर अभिजात शेखर आजाद के अनुमान अकसर सही साबित होते हैं। उनकी विशेषज्ञता केवल समाचार रिपोर्टिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि वे जटिल अंतरराष्ट्रीय संबंधों को भारतीय दर्शकों के लिए सरल और प्रभावी ढंग से समझाने के लिए जाने जाते हैं। राफेल डील से लेकर अत्याधुनिक मिसाइल टेक्नोलॉजी और वैश्विक शक्ति संतुलन पर सैकड़ों विश्लेषणात्मक लेख।

पत्रकारिता अनुभव: अभिजात शेखर आजाद के पत्रकारिता में करीब 17 सालों का अनुभव है। उन्होंने 2009 से पत्रकारिता में अपना कैरियर शुरू किया था और उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग में अच्छी पकड़ बनाई। उन्होंने समाचार प्लस और ज़ी मीडिया जैसे संस्थानों में काम किया। उन्होंने पश्चिम बंगाल विश्वविद्यालय से अंग्रेजी पत्रकारिता में स्नातक किया है।

पुरस्कार: अभिजात को ज़ी मीडिया में बेहतरीन लेखन के लिए ‘बेस्ट राइटर’ अवार्ड मिल चुका है। इसके अलावा उन्हें दो बार ENBA अवार्ड भी मिला है।

अभिजात के खास इंटरव्यू:
अभिजात शेखर आजाद का ‘बॉर्डर-डिफेंस’ नाम से साप्ताहिक वीडियो इंटरव्यू आता है, जिसमें वो सैन्य अधिकारियों और डिप्लोमेट्स से बात करते हैं। उन्होंने कई बड़े चेहरे जैसे DRDO के वैज्ञानिक और ब्रह्मोस मिसाइल बनाने वाले वैज्ञानिक अतुल दिनकर राणे, डीआरडीओ वैज्ञानिक हरि बाबू चौरसिया, भारतीय सेना के पूर्व आर्मी चीफ वेद मलिक, लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन, लेफ्टिनेंट जनरल संजय वर्मा, एयर मार्शल रवि कपूर, एयर फोर्स अधिकारी विजयेन्द्र के ठाकुर, फाइटर पायलट आरके नारंग, डिप्लोमेट एसडी मुनि, डिप्लोमेट सी उदय भाष्कर, डिप्लोमेट अनिल त्रिगुणायत, डिप्लोमेस रोबिंदर सचदेव, नौसेना कैप्टन श्याम कुमार समेत कई एयरफोर्स और नौसेना अधिकारियों का इंटरव्यू ले चुके हैं।… और पढ़ें