China Military Satellites: तकनीक के मामले में भारत चीन से पीछे नहीं है लेकिन संख्या के मामले में भारत चीन के सामने कहीं नहीं ठहरता है। चीन के 300 के मुकाबले भारत के पास सिर्फ 15 सैटेलाइट्स हैं और जाहिर तौर पर वो चीन की तरह हर एक मिनट की जानकारी नहीं जुटा सकते हैं।
हाइलाइट्स
- चीन ने इंटेलिजेंस, सर्विलांस और टोही क्षमता के लिए 300 सैटेलाइट बनाए
- भारत के पास सिर्फ 15 सैटेलाइट इस क्षमता के लिए हैं जो काफी कम है
- चीनी सैटेलाइट्स खराब से खराब मौसम में भी जुटा सकते सटीक जानकारी

चीन ने ISR सिस्टम को अपनी कमजोंरियों को दूर करने के लिए बनाया था। 1996 के ताइवान संकट ने बीजिंग को यह एहसास दिलाया कि रणनीतिक तौर पर ‘अंधा’ होना अस्तित्व के लिए खतरा है। अगर दुश्मन के प्लेटफॉर्म का पता ही न चले तो कितनी भी ज्यादा गोला बारूद क्यों ना हो वो बेकार है। उसके बाद तीन दशकों के निवेश से चीन ने एक ऐसा ISR सिस्टम बनाया है जो तेजी, बड़े पैमाने और दबदबे के लिए जाना जाता है।
चीन ने 300 सैटेलाइट्स से कैसे बनाया ‘चक्रव्यूह’
- ISR का बुनियादी आधार अंतरिक्ष है। चीन 300 से ज्यादा मिलिट्री सैटेलाइट और युद्ध के समय जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल होने वाले 100 से ज्यादा दोहरे इस्तेमाल वाले सैटेलाइट का इस्तेमाल करता है।
- 0.5 मीटर रिजॉल्यूशन वाला ‘याओगन’ कॉन्स्टेलेशन सैटेलाइट टारगेटिंग के लिए मुख्य आधार का काम करता है।
- 0.1 मीटर रिज़ॉल्यूशन वाली ‘गाओफेन’ सीरीज के सैटेलाइट गाड़ियों और विमानों के प्रकार और रडार की दिशा में अंतर कर सकती है। SAR (सिंथेटिक अपर्चर रडार) से लैस सैटेलाइट खराब मौसम में भी कवरेज बनाए रखते हैं।
चीन सैटेलाइट इंटेलिजेंस, सर्विलांस और टोही काम कैसे करते हैं?
लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह (रिटायर्ड) ने डेक्कन हेराल्ड में लिखा है कि इस स्पेस लेयर में डेटा का इंटीग्रेशन (फ़्यूज़न) क्षमता को कई गुना बढ़ा देता है। याओगन-आधारित ELINT ट्रिपलेट्स रडार सिग्नल का पता लगाकर 100 मीटर की सटीकता के साथ उनकी स्थिति का पता लगाते हैं जबकि जिलिन-1 (Jilin-1) सैटेलाइट चलते हुए काफिलों को ट्रैक करते हैं।
बेइदोऊ (Beidou) की 10-सेंटीमीटर की सटीकता और जियो-स्टेशनरी तियानलियन (Tianlian) रिले सैटेलाइट देरी (लेटेंसी) को कम करते हैं। इसके अलावा एक अरब से ज्यादा मोबाइल यूजर्स बेइदोऊ को एक मजबूत ISR एसेट बनाते हैं। हर चीनी फोन एक संभावित सेंसर का काम करता है।
भारत में सबकुछ कैसे देख रहा है चीन?
अंतरिक्ष से कैसे करता है निगरानी- चीन के पास 300 से ज्यादा मिलिट्री सैटेलाइट्स हैं। ये सैटेलाइट्स इतनी ताकतवर हैं कि खराब मौसम या बादलों के बीच भी भारत की गाड़ियों, फाइटर जेट्स और यहां तक कि रडार की लोकेशन को बिल्कुल सटीक यानि सेंटीमीटर की सटीकता के साथ पकड़ लेती हैं।
हवा में ड्रोन से सर्विलांस- चीन के ड्रोन जैसे WZ-7 18 किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़कर लगातार जासूसी करते हैं। उसके KJ-500 AWACS विमान भारत के अंदर 500 किलोमीटर दूर तक उड़ते विमानों को देख सकते हैं। Y-9 SIGINT विमान 400 किलोमीटर दूर से भारत के इलेक्ट्रॉनिक ऑर्डर ऑफ बैटल का नक्शा बना सकते हैं। समुद्री इलाके में जिबूती में मौजूद PLA के विमान (KQ-200 और Y-9Qs) ISR के दायरे को हिंद महासागर तक बढ़ाते हैं।
जमीन और समंदर- चीन ने भारत की सीमा (LAC) के पास रडार की एक दीवार खड़ी कर दी है। उसके रडार भारत में मिसाइल और सैटेलाइट की मूवमेंट को 5,000 किलोमीटर दूर से ट्रैक कर सकते हैं। समंदर के नीचे उसने साउंड सेंसर (हाइड्रोफोन्स) लगाए हैं जो भारतीय जहाजों की आवाज सुनते हैं।
चीन ने बनाया किल चेन- इन सब सेंसरों का डेटा एक जगह जमा होता है। चीन की सेना को LAC पर होने वाले किसी भी बदलाव का पता कुछ ही मिनटों में चल जाता है और वे तुरंत हमला कर सकते हैं।
चीन को काउंटर करने की भारत की क्षमता क्या है?
लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह ने लिखा है कि तकनीक के मामले में भारत चीन से पीछे नहीं है लेकिन संख्या के मामले में भारत चीन के सामने कहीं नहीं ठहरता है। चीन के 300 के मुकाबले भारत के पास सिर्फ 15 सैटेलाइट्स हैं और जाहिर तौर पर वो चीन की तरह हर एक मिनट की जानकारी नहीं जुटा सकते हैं।
चीन के मुकाबले भारत की अंतरिक्ष में कमजोर क्षमता
CARTOSAT-3 की 0.25 मीटर वाली तस्वीरें गाड़ियों और विमानों की पहचान कर सकती हैं। RISAT हर मौसम में कवरेज देते हैं। EMISAT रडार की लोकेशन का पता लगा सकता है लेकिन चीनी ELINT ट्रिपलेट्स की तरह ट्रायंगुलेशन नहीं कर सकता। NavIC 5-मीटर की एक्यूरेसी देता है जो बेइदोऊ से कम सटीक है।
हवा में भारत के पास कोई HALE ड्रोन नहीं है (MQ-9B को अभी शामिल किया जाना बाकी है)। इसका MALE बेड़ा हेरॉन, सर्चर और रुस्तम ड्रोन चीन के 40 घंटे के स्टैंडर्ड के मुकाबले 24 घंटे के मिशन पर उड़ता है। भारत के AWACS अच्छा काम करते हैं लेकिन 24×7 कवरेज के लिए इनकी संख्या बहुत कम है। P-8I पोसीडॉन नौसेना को एक खास बढ़त देता है लेकिन कोई खास SIGINT एयरक्राफ्ट नहीं है।
जमीन और समंदर में भी भारत पीछे कैसे- जमीन पर स्थिति बहुत अलग है। भारत के पास ‘ओवर-द-होराइजन’ रडार नहीं हैं जिससे तिब्बत के अंदर हो रही हवाई गतिविधियों का पता नहीं चल पाता। AN/TPQ-37 और स्वाति रडार की संख्या पूरी सीमा को कवर करने के लिए बहुत कम है। बिना इंसानी मदद वाले जमीनी सेंसर का अभी भी टेस्ट और तैनाती की जा रही है। एयरोस्टैट्स को अभी तैनात किया जाना बाकी है और समुद्र की सतह पर कोई सेंसर नेटवर्क नहीं है। SIGINT यूनिट्स तो हैं लेकिन वे आपस में जुड़ी या नेटवर्क से जुड़ी नहीं हैं।
ISR लड़ाई में चीन को कैसे काउंटर कर सकता है भारत?
स्मार्ट तरीके से निगरानी- भारत को पूरी सीमा पर नजर रखने की जरूरत नहीं है। हमें सिर्फ उन चुनिंदा ‘डार्क स्पॉट्स’ यानि संवेदनशील इलाकों पर चौबीसों घंटे नजर रखनी चाहिए जहां से चीन हमला कर सकता है। अगर हमें 4K क्वालिटी की निगरानी नहीं मिल रही तो 1080p (कामचलाऊ लेकिन सटीक) निगरानी भी काफी है।
डेटा का इंटीग्रेशन जरूरी- ISR के लिए सिर्फ प्लेटफॉर्म की संख्या नहीं बल्कि जबरदस्त इंटीग्रेशन की जरूरत है। किसी एक सर्विस या एजेंसी तक सीमित रहना अचानक हमले का कारण बन सकता है। ‘थिएटर-आधारित सिस्टम’ ऑपरेशनल अंधेपन को ठीक कर सकता है लेकिन रणनीतिक अंधेपन को दूर करने के लिए एक नेशनल ISR फ्यूजन सेंटर की जरूरत है। इसके लिए AI-आधारित फ्यूजन और ऑटोमेटेड सेंसर के इस्तेमाल में निवेश की जरूरत है।
सेंसर की संख्या बढ़ाने की जरूरत- लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह ने सलाह दी है कि निजी सेक्टर की कंपनियों को शामिल कर भारत को अपनी सेंसर क्षमता तेजी से बढ़ाने की जरूरत है। स्पेस एक्स की तरह बनने का सपना देखने के बजाए भारत को उन बाधाओं को हटाने की कोशिश करना चाहिए जो निजी सेक्टर को स्पेस में उड़ान भरने दे। भारत को कई रूकावटों को दूर करना होगा जैसे लॉन्च-स्लॉट मिलना, IN-SPACe के नियम और कैपिटल जो दोहरे इस्तेमाल (डुअल-यूज़) वाले स्पेस स्टार्टअप्स की राह में बाधा बन रही हैं। सरकारी एकाधिकार को खत्म करके प्राइवेट कंपनियों के लिए जगह बनानी होगी।
अंत में भारत को अपनी ISR क्षमता को मजबूत बनाने के लिए अलग तरह की (असिमेट्रिक) रणनीतियां अपनानी होंगी। चीन के सेंसर नेटवर्क का मुकाबला करने के लिए उसे स्पूफिंग टेक्नोलॉजी विकसित करनी होगी। उसे अपनी ISR क्षमता को पूरी तरह से आत्मनिर्भर मानने के बजाय ‘फ्रेंडली-आई’ यानि दोस्त देशों के साथ सहयोग को तेजी से बढ़ाना होगा। भारत को मुश्किल हालात में भी अपने प्लेटफॉर्म को सुरक्षित रखने की योजना बनानी होगी। सबसे बढ़कर जमीन पर अपनी कमियों की भरपाई के लिए उसे समुद्र में अपनी ISR ताकतों जैसे P-8I फ्लीट और IMAC का इस्तेमाल करना चाहिए।
