India monsoon rain evaporates: देश में मानसूनी बारिश में 18 फीसदी की कमी आई है। ऐसे में एक स्टडी ने मौसम वैज्ञानिकों की टेंशन और बढ़ा दी है। दरअसल, IITM पुणे के शोधकर्ताओं का कहना है कि जून से सितंबर के दौरान बारिश का 25 फीसदी हिस्सा भाप बनकर उड़ जाता है।

भारत में पहली बार ऐसा हुआ प्रयोग
- भारत में पहली बार किसी प्रयोग के जरिए इस हिस्से को मापा गया है। एक बयान में कहा गया है कि इससे वैज्ञानिकों को मौसम और जलवायु मॉडल को बेहतर बनाने और मानसून को और अच्छी तरह समझने में मदद मिलेगी।
- IIITM पुणे के शोधकर्ताओं ने हिसाब लगाया है कि औसतन बारिश के पानी का लगभग 25 फीसदी हिस्सा भाप बनकर उड़ जाता है। जून से सितंबर तक के मानसून के चार महीनों में इसकी असल मात्रा हर दिन अलग-अलग होती है और 4 फीसदी से 61 फीसदी के बीच रहती है।
- यह स्टडी ‘एटमॉस्फेरिक केमिस्ट्री एंड फिजिक्स’ नाम के पीयर-रिव्यूड जर्नल में पब्लिश हुई थी। पुणे का यह नतीजा पूरे भारत में इस प्रक्रिया को मैप करने की एक बड़ी कोशिश का पहला कदम है।
कैसे उड़ जाता है बारिश का पानी
- वाष्पीकरण दर का मापन मात्र एक सैद्धांतिक अभ्यास नहीं है। जब बारिश की बूंद नीचे आते समय वाष्पीकृत होती है, तो वह आसपास की हवा से ऊष्मा सोखती हैं, जिससे बादल के नीचे की परत ठंडी हो जाती है। इसके बाद नीचे की ओर ठंडी हवा का प्रवाह होता है और सतह पर ठंडी हवा के क्षेत्र बन जाते हैं।
- यह उस संवहन को ही बदल देता है जो अगली बारिश को जन्म देता है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसे जलवायु और मानसून मॉडल लंबे समय से समझने में संघर्ष कर रहे हैं। इसमें गलती होने से वर्षा का पूर्वानुमान और उससे जुड़ी वायुमंडलीय शीतलन और तूफान उत्पन्न करने की क्षमता गलत हो जाती है।
दुनियाभर के अनुमानों पर आधारित है यह आकलन
- बारिश के पानी का लगभग एक-चौथाई हिस्सा हवा में ही भाप बनकर उड़ जाता है। यह दुनिया भर में किए गए अनुमानों के निचले स्तर पर है। सैटेलाइट डेटा के आधार पर मापा गया तो पता चला कि उष्णकटिबंधीय इलाकों में वाष्पीकरण (evaporation) लगभग 20% होता है। वाष्पीकरण हल्की बारिश की छोटी बूंदों को खत्म कर देता है, जबकि तेज़ बारिश की बड़ी बूंदों पर इसका बहुत कम असर पड़ता है।
- 2019 के मॉनसून के दौरान, टीम ने पुणे में जमीन की सतह पर बारिश का पानी और हवा में मौजूद भाप (वाष्प) इकट्ठा की। लेज़र स्पेक्ट्रोमीटर पर उनके आइसोटोप अनुपात को मापा और नतीजों को ‘बिलो क्लाउड इंटरेक्शन मॉडल’ (बादल के नीचे होने वाली प्रतिक्रियाओं का मॉडल) में डाला। यह मॉडल बादल के निचले हिस्से से ज़मीन तक गिरती एक बूंद के सफर को ट्रैक करता है।
मानसून फिर कमजोर पड़ा, 18 फीसदी कम बारिश
- देश में अच्छी बारिश के एक हफ्ते बाद ही मानसून फिर से कमजोर पड़ गया है। इस बारिश ने जून के आखिर में 40 फीसदी रही बारिश की कमी को 9 जुलाई तक घटाकर 14 फीसदी कर दिया था। अभी चल रहे सूखे दौर की वजह से रविवार को देश भर में बारिश की कुल कमी बढ़कर 18 फीसदी हो गई है। यह अगले हफ़्ते और बढ़ सकती है।
- IMD ने रविवार को अनुमान लगाया कि अगले छह-सात दिनों में उत्तर-पश्चिम और पश्चिम-मध्य भारत के मैदानी इलाकों और दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में ‘बारिश की गतिविधियां कम’ रहेंगी।
- सूखे का यह दौर पिछले हफ्ते बुआई में हुई बढ़त को कम कर सकता है। सभी मुख्य फसलों की बुआई का रकबा अभी भी पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में कम है। इसका मुख्य कारण यह है कि मानसून के मुख्य क्षेत्रों में अभी भी बारिश की भारी कमी बनी हुई है। ये वे इलाके हैं, जहां सीमित सिंचाई सुविधाओं के कारण बुआई के लिए खेती मुख्य रूप से मौसमी बारिश पर निर्भर करती है।
