भारत की एक नजर यूरोपीय यूनियन पर थी तो दूसरी रूस की ओर. क्योंकि सोमवार को यूरोपीय यूनियन के विदेश मंत्रियों की मीटिंग हो रही थी, जिसमें तय होना था कि रूस पर प्रतिबंध लगाया जाए या नहीं. हुआ वही, जिसका भारत को इंतजार था. यूरोपीय यूनियन के नेता प्रतिबंधों पर सहमति ही नहीं बना पाए. अगर यूरोपीय देश रूस पर प्रतिबंध लगा देते तो ऐसा माना जा रहा था कि रूस से भारत ट्रेड नहीं कर पाता.
ऐसा माना जा रहा था कि इन नए प्रतिबंधों में कुछ ऐसी कड़ी शर्तें शामिल हो सकती थीं, जिनके तहत यह नियम थोपा जा सकता था कि जो देश जैसे भारत रूस के साथ व्यापार करेंगे, वे यूरोपीय यूनियन के देशों के साथ व्यापार नहीं कर पाएंगे. भारत इस समय रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और अन्य उत्पाद खरीद रहा है. साथ ही, भारत यूरोपीय देशों को भी अपना बहुत सारा सामान निर्यात करता है. अगर ये प्रतिबंध लग जाते, तो भारत की कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक डील फंस सकती थीं.
दोनों हाथों में लड्डू
अब जब यूरोपीय संघ में इस डील पर सहमति नहीं बन पाई है और यह टल गई है, तो भारत के लिए रास्ते साफ हो गए हैं. भारत अब बिना किसी प्रतिबंध या दबाव के यूरोप को अपना सामान बेचना जारी रख सकता है और साथ ही रूस से भी अपना आर्थिक और तेल का कारोबार बिना किसी रुकावट के कर पाएगा.
यूरोपीय संघ में क्या हुआ और डील क्यों अटकी?
सोमवार को यूरोपीय यूनियन के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई, जिसका मुख्य उद्देश्य रूस पर नए और मजबूत प्रतिबंध लगाना था. इस 21वें पैकेज पर पहले चर्चा नहीं हो पाई थी क्योंकि हंगरी के पूर्व प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन ने अपने वीटो का इस्तेमाल कर इसे रोक रखा था, जिससे मंत्रियों को पता था कि यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाएगा. हालांकि, इस बार इन प्रस्तावों को मुख्य रूप से दक्षिणी यूरोपीय देशों की ओर से चुनौती दी गई, जिसके कारण इस पर अंतिम सहमति नहीं बन सकी.
इस पैकेज में क्या-क्या शामिल था?
तेल की कीमतों पर रोक: रूस को बढ़ते तेल के दामों का फायदा उठाने से रोकना.
रूसी सैनिकों पर बैन: रूसी सैनिकों की यूरोपीय संघ में एंट्री पर प्रतिबंध लगाना.
समुद्री जीवों पर प्रतिबंध: रूस से आने वाली मछलियों के व्यापार पर रोक.
ऑयल प्राइस कैप सबसे बड़ा मुद्दा
इस प्रतिबंध पैकेज का सबसे अहम हिस्सा रूस के कच्चे तेल पर प्राइस कैप को बनाए रखना था. वर्तमान में रूसी तेल के निर्यात पर 44.10 डॉलर प्रति बैरल की प्राइस कैप तय है. यह सीमा 15 जुलाई को समाप्त हो रही है. अगर अगले दो दिनों के भीतर यूरोपीय देश किसी समझौते पर नहीं पहुंचते हैं, तो यह प्राइस कैप खत्म हो जाएगा. इसका मतलब है कि रूस अपना तेल खुले बाजार की कीमतों पर बेच सकेगा.
हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के कारण वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें काफी बढ़ गई हैं. अगर प्राइस कैप हटता है, तो रूस इस उछाल का सीधा फायदा उठाएगा और उसके पास युद्ध के लिए नया रेवेन्यू आ जाएगा.
प्लान बी पर भी काम
यूरोपीय संघ की शीर्ष राजनयिक काजा कलास ने इस पर चिंता जताते हुए कहा, मैं आपको कोई गारंटी नहीं दे सकती कि 15 जुलाई के बाद ऑयल प्राइस कैप लागू रहेगा. उन्होंने कहा, मेरी इच्छा है कि यह पैकेज मजबूत हो, क्योंकि नागरिकों पर, खासकर यूक्रेन के सबसे अधिक आबादी वाले क्षेत्रों में लगातार हमले हो रहे हैं. काजा कलास ने कहा, अगर हमारे पास डील नहीं है, तो हम प्लान B पर काम करना शुरू करेंगे. लेकिन अभी, हम बुधवार के लिए प्लान A पर काम कर रहे हैं.