सऊदी अरब ने मध्य पूर्व के हालातों को देखते हुए अपनी विदेश नीति में बड़ा बदलाव किया है। इससे मध्य पूर्व के समीकरण बदल गए हैं, जिनका असर साफ देखा जा रहा है। जो सऊदी अरब कभी ईरान पर हमले को तैयार था, आज वह उसी के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा है।

सऊदी अरब-ईरान की नजदीकियां बढ़ी
चंद दिनों पहले ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान अधिकतर खाड़ी देशों ने दूरी बनाकर रखी। लेकिन, सऊदी अरब ने खामेनेई के अंतिम संस्कार में भारी-भरकम प्रतिनिधिमंडल तेहरान भेजा। जब ईरान एक बार फिर खाड़ी देशों पर हमले कर रहा है, उस समय भी सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरघची नियमित रूप से एक-दूसरे से बातचीत कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि कहीं सऊदी अरब ने पाला तो नहीं बदल दिया।
कभी ईरान पर हमले को तैयार था सऊदी अरब
हालांकि, जब 28 फरवरी को इजरायल और अमेरिका ने ईरान के खिलाफ हमले शुरू किए, तब सऊदी अरब से ऐसी खबर आई, जो आज के हालात के ठीक उलट है। उस वक्त कई मीडिया रिपोर्टों में ऐसा दावा किया गया था कि सऊदी अरब भी ईरान के खिलाफ युद्ध में शामिल होने के लिए तैयार था। हालांकि, ऐसी रिपोर्ट को काफी हैरानी के साथ देखा गया, क्योंकि सिर्फ दो साल पहले ही सऊदी अरब और ईरान ने चीन की मध्यस्थता से शांति समझौता किया था, जिससे दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध बहाल हुए थे और कुछ उच्चस्तरीय दौरे भी देखने को मिले थे।
सऊदी अरब और ईरान दोस्त बने
सऊदी अरब लंबे समय से ईरान की सैन्य शक्ति को अपने खिलाफ देखता रहा है। उसे ईरान के परमाणु कार्यक्रमों से उतना ही भय है, जितना इजरायल को लगता है। सऊदी अरब भी ईरान के परमाणु हथियारों को अपने अस्तित्व के खतरे के रूप में देखता है, लेकिन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अल सऊद के नेतृत्व में रियाद की विदेश नीति में बड़ा परिवर्तन आया है। कल तक तो ईरान सऊदी अरब का सबसे बड़ा दुश्मन था, आज वह दोस्त बनकर बैठा है।
प्रोजेक्ट फ्रीडम में शामिल होने से इनकार
जब अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए प्रोजेक्ट फ्रीडम शुरू किया, तो सऊदी अरब ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया। सऊदी अरब के इनकार के कारण ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को प्रोजेक्ट फ्रीडम को शुरू करने से पहले ही बंद करना पड़ा। इसके बाद अमेरिका ने सऊदी अरब से बड़े पैमाने पर अपने रक्षा उपकरणों को हटाकर नाराजगी भी जताई, लेकिन रियाद के ऊपर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। सऊदी अरब खुद को एक ऐसे खाड़ी देश के रूप में प्रतिष्ठित करने की कोशिश कर रहा है, जिसके ईरान के साथ अच्छे संबंध हैं और वह इस युद्ध से पूरी तरह तटस्थ है।
