भारतीय प्रोफेशनल रेसलिंग और अब मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स (एमएमए) की दुनिया में अपनी अलग पहचान बना चुके संग्राम सिंह, पेरिस ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाले भारतीय पहलवान अमन सहरावत और भारतीय कुश्ती के अनुभवी कोच, पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी और ध्यानचंद पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार भी अमर उजाला संवाद के मंच पर पहुंचे। इन तीनों के साथ कुश्ती पर चर्चा हुई।
सवाल: अमन ने त्रासदी देखी, इसके बावजूद संघर्ष किया, विनोद जी ने वो समय देखा जब देश में कुश्ती में बदलाव आए, संग्राम जी तीन साल की उम्र में अर्थराइटिस से जूझ रहे थे, व्हीलचेयर पर थे, तो इन तीनों ने संघर्ष देखा है, मेरा सवाल इनके संघर्ष की दास्तां को लेकर है। मैं जानना चाहूंगा कि संघर्ष की दास्तां सुनाएं।
अमन: देखो जी गांव में हमने शुरू से रेसलिंग का कल्चर देखा है। काका को देखा है, हमने बचपन से अखाड़ा देखा। लेकिन हमें ओलंपिक का पता नहीं था, हमें बस इतना पता था कि अच्छा रेसलर बनेंगे। जब मैं 10 साल का था तो छत्रसाल स्टेडियम छोड़कर आए थे। तब सुशील कुमार थे वहां। तब हमने देखा कि हमारे सामने दो-दो बार के ओलंपिक मेडलिस्ट कैसे प्रैक्टिस कर रहे हैं। रवि भाई कैसे प्रैक्टिस कर रहे हैं। वहीं से हमें लगा कि हम भी देश के लिए मेडल जीतेंगे।
विनोद (पहलवान की सुविधाओं पर): देखिए पहले भारत में कोई सुविधा नहीं होता था। तब एक रेसलिंग मैट होता था पटियाला में। मैं 1981 की बात कर रहा हूं। अखाड़े होते थे और वहां करने के बाद जब हम बाहर जाते थे तो गद्दे होते थे तो बड़ी दिक्कत होती थी। कई टूर्नामेंट में गए तो पटियाला में एक मैट होता था। उस टाइम कोई सुविधा नहीं होती थी। ओलंपिक इसलिए जाते थे क्योंकि इस बात की खुशी होती थी कि हमें बस पार्टिसिपेट करना है। हम क्वालिफाई कर गए इस बात की खुशी होती थी। मेडल तो दिमाग में भी नहीं होती थी। मैं 1988 ओलंपिक की बात कर रहा हूं। आज एशियन गेम्स का जो कैंप चल रहा है, सारी सुविधाएं हैं। हम अब मेडल की सोच रहे हैं। हमारी छह वेट कैटेगरी होती है, उसमें हम छह के छह मेडल लेकर आएंगे, ये हमारी सोच है।
संग्राम: मैं हमेशा एक बात बोलता हूं कि जिंदगी वो नहीं होती जो हमें मिलती है, जिंदगी वो होती है जिसे हम बनाते हैं, मेहनत करके, कोशिश करके। जैसे कि बाकी दो कह रहे हैं कि कुश्ती बहुत मेहनत का काम है। बॉक्सिंग में आपके ग्लब्स हो गए, क्रिकेट में बैट हो गए, बैडमिंटन में रैकेट हो गया, जूडो में आपने कपड़ा पकड़ लिया। कुश्ती ऐसा खेल है जिसमें आप सामने वाली की बॉडी पकड़ेंगे, उसे कन्केट करेंगे। दांव लगाएंगे, तो सबसे मुश्किल स्पोर्ट्स है ये। तो जब हमने गांव में कुश्ती देखी, तो वहां पहलवानों को दूध मिल रहा था, घी मिल रहा था, पैसे मिल रहे थे, तो मैंने सोचा कि काश मैं भी पहलवान होता। एक सच्चाई यह थी कि क्रिकेट का बैट आता था 25-30 रुपये का, बैडमिंटन तो आज भी नहीं है। मैं एक बार लिएंडर पेस को बोल रहा था कि अगर हरियाणा में टेनिस पहुंच गया और ग्राउंड बन गए, तो साउथ वाले नहीं जीत पाएंगे। फिर तो हम नॉर्थ वाले ही जीतेंगे। हरियाणा में जो पहलवान होता था, उसके बारे में चौपाल में बात चलती थी। सब मुझे चिढ़ाते थे क्योंकि मुझे अर्थराइटिस था, तो मैं सोचता था कि थोड़ा तगड़ा बन गया, तो दूध मिलेगा, घी मिलेगा, आस पड़ोस में मेरी बात होगी। इस वजह से मैंने कुश्ती शुरू किया था।
सवाल: आप 57 किलो में खेलते थे, तो ओलंपिक के बाद से 61 किलो में क्यों खेलने लगे?
अमन: हमारा कॉम्पिटीशन दो तीन महीने पहले से आते रहते हैं, तो हम डिसाइड करते रहते हैं कि कौन किस वेट कैटेगरी में खेलेगा। किस वेट कैटेगरी में कितने कॉम्पिटीशन होंगे। जैसा कि एशियन चैंपियनशिप में मैं 61 किलो में खेला था, तो तब अगर 57 में खेलता तो वेट लॉस में कमजोरी ज्यादा आती। मेन कॉम्पिटीशन में 57 किलो में ही खेलते हैं।
सवाल: एशियाई खेलों में पिछली बार कांस्य पदक जीता था, इस बार क्या लक्ष्य साधा है?
अमन: पिछली बार मेरा ब्रॉन्ज मेडल आया था, लेकिन खुशी नहीं हो रही थी। मेरे अंदर था कि गोल्ड चला गया। तो अबकी बार गोल्ड की तैयारी चल रही है।
सवाल: 100 ग्राम वजन की वजह से हम पदक से चूक गए थे? इस पर आप क्या कहेंगे?
विनोद: पेरिस ओलंपिक में बढ़े हुए वजन की जिम्मेदार विनेश फोगाट खुद हैं। उन्होंने सबसे बड़ी गलती यहां ही की थी। भारत में वो दो कैटेगरी में लड़ीं। उनकी गलती से ऐसा हुआ। ये बहुत बड़ी गलती है, इतने बड़े प्लेटफॉर्म पर वेट नहीं ला रहे। आप यहां से ही क्यों इस वेट पर गए थे?
सवाल: आप उस मौके पर होते, भारतीय टीम के कोच हो तो क्या करते?
विनोद: मैं तो चाहता हूं कि उस पर इस गलती के लिए चार साल का प्रतिबंध लगना चाहिए। ये छोटी गलती नहीं, बहुत बड़ी गलती है। और ये जो गुमराह किया गया कि वेट नहीं आया, आप लोगों को नहीं पता 100 ग्राम नहीं था वेट। 100 ग्राम तो आदमी बाल भी काट लेता।
सवाल: वेट मैनेज पर अमन आपका क्या कहना है?
अमन: सबसे पहले पहलवान की खुद जिम्मेदारी होती है, वेट को एडजस्ट करने की। वजन घटाते वक्त अगर कोई और दिक्कत हो गई शरीर में तो वो ज्यादा दिक्कत है। हम पहले से ही सेट करके चलते हैं कि इस दिन टूर्नामेंट है तो हमें ऐसा दिखाना है, इतना वेट एडजस्ट करना है, बनाकर चलना है। क्योंकि अब अगले दिन भी वेट दिखाना पड़ता है। पहले तो बस पहले दिन वेट दिखा दो तो सबकुछ फाइनल हो जाता था। अब फाइनल और मेडल बाउट अगले दिन होती है। तो हम सेट करके चलते हैं कि अगले दिन भी हमें वजन दिखाना है।
सवाल: संग्राम भी कभी तैयारियां किया करते थे। फ्री स्टाइल पहलवानी से आप ग्रीको रोमन में कैसे पहुंच गए?
संग्राम: कोई चीज सही नहीं है, कोई चीज गलत नहीं है। जो अपने वश में नहीं है, वही चीज सही है, बाकी सब गलत है। यानी जन्म प्रेम मृत्यू। यही चीजें सही हैं, बाकी कुछ सही नहीं है। हम सब मिट्टी के अखाड़े शुरू करते हैं। मिट्टी कुश्ती रेसलर के लिए सबसे बेस्ट कुश्ती है। मर्लिन मुनरो कितनी खूबसूरत है, पर मेरी मां से खूबसूरत नहीं हो सकती। मिट्टी से शुरू करते हैं और फिर जब आगे आते हैं तो आपको कई चीजें पता नहीं होतीं। मैं तो आज भी मानता हूं कि मेरे अंदर कोई टैलेंट है ही नहीं। हार्ड वर्क करता हूं। पहले प्रोफेशनल रेसलिंग डब्ल्यूडब्ल्यूई होता था। उस वक्त ऐसा नहीं था कि कोई दूसरी लीग हो रही है या चैंपियनशिप हो रही है। हर उम्र का शौक है जुदा जुदा। मुझे दो तीन साल पहले तक एमएमए का पता नहीं था। फिर पता चला तो लगा कि मुंह टूट जाएगा, इस सोच के साथ एमएमए में आए।
सवाल: सब कहते हैं कि प्रोफेशनल फाइट्स तो नूरा कुश्ती होती है। इसमें कितनी सच्चाई है? आप खुद प्रोफेशनल फाइट्स भी लड़े हो और अब एमएमए कर रहे हो, वो भी पाकिस्तान के साथ दो-दो हाथ करोगे मलयेशिया में।
संग्राम: हम दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी हैं। सबके अपने विचार अलग-अलग हैं। आप खुद बताओ राजनीति क्या है? आजकल का जमाना इतना एडवांस है, सोशल मीडिया है। बाकी ढेर सारी चीजें जो हम सोच रहे हैं, कर रहे हैं, वो बहुत डिफिकल्ट है। मेरा मानना है कि अब मैं किसी हार जीत के लिए नहीं खेलता। मेरी सोच ये है कि जो काम मैं 40 के दशक में कर रहा हूं, वो अब बच्चे 20 या 30 की उम्र में कर सकते हैं। अगर कोई भी एक बच्चा इससे प्रेरणा लेता है तो मेरी जीत तो वही है। अब जो उम्र है मेरी, उसमें न कुछ करने की जरूरत है न खेलने की जरूरत है। मैं एक बात हमेशा बोलता हूं कि मकान और इंसान टूटकर नया बनता है। जब मैं अपनी बात करूं तो ठोकर खाकर ही ठाकुर बना हूं। हम उम्र से नहीं बल्कि नुकसान से परिपक्व होते हैं। तो कोई भी कुछ मुझे कहता है तो मैं मुस्कुरा देता हूं। मेरे लिए एक चीज सर्वोपरि रहती है कि मेरा देश महान तो मेरा क्या योगदान। मैं अपने देश के लिए क्या कर सकता हूं, वो चीज में व्यक्तिगत तौर पर कर सकता हूं। जैसे जो भी बुरी चीजें हैं, मैं उसको प्रमोट नहीं करता। मैं ये भी नहीं कह सकता कि अगर इसको कोई फिल्म वाला या फिर क्रिकेट वाला प्रमोट कर रहा है तो वो सही है या गलत, कोई सही गलत नहीं है, क्योंकि हम किसी को जज नहीं कर सकते। तो मैं अपने हिसाब से बोलता हूं और सोचता हूं। आप कहीं भी चले जाओ, भारत से बेहतर कोई देश नहीं है। बशर्ते थोड़ा करप्शन कम हो जाए, क्योंकि हर शाख पर उल्लू बैठा हुआ है। अगर करप्शन कम हो गया तो पता नहीं कहां से कहां पहुंच जाएंगे। जब पाकिस्तान के खिलाफ मैच खेल रहा होता हूं न तो रात को नींद नहीं आती है। जो प्रेशर को बखूबी हैंडल कर लेता है वो विनर हो जाता है। मेरी लाइफ का जो रिजैक्शन है, वही मोटिवेशन है। हमेशा याद रखना कि हमें कोई तब तक नहीं हरा सकता, जब तक हम खुद से न सोच लें। किसी की औकात नहीं है कि हमें हरा दे।
भारतीय कुश्ती का जाना-पहचाना नाम हैं विनोद कुमार
अमर उजाला समूह की ओर से आयोजित किए जा रहे ‘संवाद उत्तर प्रदेश 2026’ कार्यक्रम में खेल जगत की कई दिग्गज हस्तियां शामिल हो रही हैं। विनोद कुमार भारतीय कुश्ती जगत का एक बड़ा और सम्मानित नाम हैं। उन्होंने न सिर्फ एक खिलाड़ी के रूप में देश का नाम रोशन किया, बल्कि कोच के तौर पर भी भारतीय पहलवानों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर सफलता दिलाने में अहम भूमिका निभाई। वह भारतीय पुरुष फ्रीस्टाइल कुश्ती टीम के मुख्य कोच रह चुके हैं।
संग्राम और अमन का करियर
संग्राम सिंह ने 1999 में दिल्ली पुलिस के साथ एक खिलाड़ी के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। वर्ष 2005 में ऑल इंडिया पुलिस गेम्स में दिल्ली पुलिस का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने कांस्य पदक जीता। इसके बाद उन्होंने प्रोफेशनल रेसलिंग की दुनिया में तेजी से अपनी पहचान बनाई। वहीं, अमन ने 2012 ओलंपिक में सुशील कुमार का प्रदर्शन देखकर पहलवान बनने का सपना देखा। 2021 में उन्होंने पहली बार राष्ट्रीय चैंपियनशिप का खिताब जीता। अमन सहरावत पेरिस ओलंपिक 2024 के लिए क्वालिफाई करने वाले भारत के इकलौते पुरुष पहलवान थे। ओलंपिक में उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए कई मजबूत प्रतिद्वंद्वियों को हराया। हालांकि सेमीफाइनल में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन कांस्य पदक मुकाबले में अमेरिका के डेरियन क्रूज को 13-5 से हराकर उन्होंने इतिहास रच दिया।