मालवीय नगर अग्निकांड की आग भले कुछ घंटों बाद बुझ गई हो लेकिन उसका दर्द बुधवार को एम्स ट्रॉमा सेंटर के गलियारों में देर रात तक परिजनों और वहां मौजूद हर शख्स को महसूस होता रहा। सुबह से ही ट्रॉमा सेंटर के बाहर भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी। कोई बेटे को ढूंढ़ रहा था, तो कोई पति की खबर पाने को बेचैन था। किसी को पिता की जानकारी नहीं मिल रही थी। एक युवक बार-बार अपने भाई की तस्वीर दिखाकर पूछ रहा था भैया मिले क्या?
अस्पताल के भीतर-बाहर मोबाइल पर अपनों की तस्वीरें लिए ऐसे दर्जनों लोग मौजूद थे। जैसे ही कोई एंबुलेंस अस्पताल पहुंचती, बाहर खड़े परिजनों की धड़कनें तेज हो जातीं। लोग एंबुलेंस के पीछे दौड़ पड़ते। घायलों का चेहरा देखने की कोशिश होती। एक महिला रोते हुए बार-बार कह रही थी, बस एक बार दिखा दो कि वह ठीक है।
एक बुजुर्ग हाथ जोड़कर बेटे की सलामती की दुआ मांगते नजर आए। रात भर ट्रॉमा सेंटर के हर कोने में बेचैनी पसरी रही। जब भी दरवाजा खुलता, कई निगाहें एक साथ उठ जातीं, इस आस में कि शायद इस बार कोई अच्छी खबर मिल जाए। हालांकि लापरवाही की लपटों ने कई परिवारों की उम्मीदों को राख कर दिया था।
भगवान… आखिर ऐसा क्यों किया
एम्स में 13 घायलों को लाया गया था। इनमें से तीन को डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। यह खबर मिलते ही कुछ परिवारों की दुनिया ही जैसे थम गई। अस्पताल के एक कोने से उठती चीख-पुकार ने माहौल को और गमगीन बना दिया। कई परिजन बेसुध होकर जमीन पर बैठ गए और आसमान की आर हाथ उठाकर उलाहना दिया…भगवान आखिर ऐसा क्यों किया…।
बुरी सूचना के बाद पसर जाता सन्नाटा
अस्पताल के गलियारों में जब भी किसी का मोबाइल बजता लोग उम्मीद भरी नजरों से उसकी ओर देखते। कोई अच्छी खबर से राहत की सांस लेता तो कहीं अनहोनी से सन्नाटा पसर जाता। आग ने सिर्फ इमारतों व सामान को ही नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि कई परिवारों के जीवन में दर्द का अंतहीन अध्याय जोड़ दिया है।