Donald Trump की रणनीति से क्यों डरा Share Market? पढ़िए Sharad Kohli का Analysis
Donald Trump की Policies एक बार फिर Global Markets में हलचल मचा रही हैं। एक तरफ अमेरिका-ईरान तनाव लगातार बढ़ रहा है, दूसरी तरफ अमेरिका ने भारत समेत कई देशों पर नए टैरिफ लगाने की घोषणा की है। इसी बीच कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गई हैं, जिससे दुनियाभर के शेयर बाजारों पर दबाव बढ़ गया है।

ऐसे माहौल में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ट्रंप की रणनीति क्या है और इसका भारत की अर्थव्यवस्था, शेयर बाजार और आम लोगों पर कितना असर पड़ सकता है?
Donald Trump की रणनीति सिर्फ टैरिफ तक सीमित नहीं
बाजार विशेषज्ञ शरद कोहली का मानना है कि ट्रंप की रणनीति केवल व्यापारिक नहीं बल्कि पूरी तरह भू-राजनीतिक (Geopolitical) है।
उनके मुताबिक ट्रंप एक साथ कई मोर्चों पर दबाव बना रहे हैं। ईरान के खिलाफ सैन्य रुख, नए टैरिफ और वैश्विक व्यापार नियमों में बदलाव इसी रणनीति का हिस्सा हैं। शरद कोहली ने इसे एक शब्द में “Destruction” यानी विरोधी पक्ष की आर्थिक और रणनीतिक क्षमता को कमजोर करने की कोशिश बताया।
अमेरिका ने भारत सहित कई देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लागू करने का फैसला किया है। भारत पर पहले से लागू 10% बेस MFN (Most Favoured Nation) टैरिफ के अलावा अब अमेरिका ने Forced Labour और कथित अनुचित व्यापारिक प्रथाओं का हवाला देते हुए अतिरिक्त 10% शुल्क लगाने की बात कही है। इसका मतलब है कि भारतीय उत्पादों पर कुल प्रभावी शुल्क लगभग 20% तक पहुंच सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यही वजह है कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील फिलहाल फिर से अधर में लटक सकती है।
Trade Deal पर क्यों बढ़ी अनिश्चितता?
भारत पहले भी Forced Labour के आधार पर लगाए जाने वाले टैरिफ का विरोध कर चुका है।
भारत का कहना है कि किसी एक देश को इस आधार पर निशाना बनाना उचित नहीं है। ऐसे में यदि अमेरिका इस फैसले पर कायम रहता है तो दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को अंतिम रूप मिलने में और देरी हो सकती है।
अमेरिका-ईरान तनाव का सबसे बड़ा असर कच्चे तेल पर दिखाई दे रहा है। Brent Crude $100 प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया है। इसके पीछे सिर्फ होर्मुज जलडमरूमध्य नहीं बल्कि लाल सागर (Red Sea) में बढ़ते हमलों और तेल सप्लाई को लेकर बढ़ती अनिश्चितता भी बड़ी वजह मानी जा रही है, अगर सप्लाई और बाधित होती है तो तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं।
भारत पर क्यों भारी पड़ सकता है महंगा तेल?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 88% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में तेल महंगा होने से:
- आयात बिल बढ़ेगा।
- चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है।
- महंगाई पर दबाव बढ़ेगा।
- कंपनियों की लागत बढ़ेगी।
- आर्थिक विकास की रफ्तार प्रभावित हो सकती है।
इसी कारण विदेशी निवेशक (FII) अक्सर ऊंचे क्रूड ऑयल के दौर में भारतीय बाजार से दूरी बनाते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक जब तक कच्चा तेल 70-75 डॉलर के आसपास था तब विदेशी निवेशकों की खरीदारी देखने को मिल रही थी। लेकिन जैसे-जैसे तेल 100 डॉलर के करीब पहुंचा, बाजार में जोखिम बढ़ गया। FII का मानना है कि महंगा तेल भारत की अर्थव्यवस्था के लिए नकारात्मक है क्योंकि इससे महंगाई, व्यापार घाटा और कॉरपोरेट की लागत तीनों बढ़ते हैं।
अमेरिका में भी बढ़ रहा दबाव
तेल महंगा होने के साथ अमेरिका में भी कई आर्थिक संकेत चिंता बढ़ा रहे हैं।
- डॉलर इंडेक्स 101 के ऊपर पहुंच गया।
- अमेरिकी बॉन्ड यील्ड 4.7% के करीब पहुंच गई।
- पेट्रोल की कीमतों में तेजी आई।
- महंगाई फिर बढ़ने लगी है।
इसके अलावा अमेरिकी संसद ने युद्ध खर्च के लिए 73 अरब डॉलर की अतिरिक्त फंडिंग को भी मंजूरी दी है, जिससे संकेत मिलता है कि संघर्ष लंबा खिंच सकता है।
शरद कोहली का मानना है कि अमेरिकी शेयर बाजारों में यदि गिरावट आती भी है तो वह ज्यादा लंबे समय तक नहीं टिक सकती। उनका कहना है कि वॉल स्ट्रीट में मजबूत संस्थागत समर्थन होने के कारण अमेरिकी बाजार अपेक्षाकृत जल्दी रिकवरी कर सकते हैं। हालांकि एशियाई बाजारों पर दबाव बना रह सकता है क्योंकि जापान, दक्षिण कोरिया और भारत जैसे देश ऊर्जा आयात पर काफी निर्भर हैं।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व की आगामी बैठक भी बाजार के लिए बेहद अहम मानी जा रही है।
हालांकि फिलहाल ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना कम मानी जा रही है, लेकिन यदि तेल लगातार महंगा रहता है और महंगाई बढ़ती है तो आने वाले महीनों में फेड का रुख सख्त हो सकता है।
तेल और बॉन्ड यील्ड बढ़ने से सोने पर दबाव देखने को मिला है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी अवधि के निवेशकों के लिए यह गिरावट अवसर बन सकती है। उनके अनुसार अगले कुछ दिनों में फेड की बैठक और कमोडिटी बाजार की एक्सपायरी के कारण सोना और चांदी दोनों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
मौजूदा परिस्थितियों में विशेषज्ञ लंबी अवधि के निवेशकों को घबराने की बजाय अवसर तलाशने की सलाह दे रहे हैं।
जिन सेक्टरों पर नजर रखी जा सकती है:
- डिफेंस
- FMCG
- ग्रीन एनर्जी
- रिन्यूएबल एनर्जी
- इलेक्ट्रिक व्हीकल्स से जुड़े कारोबार
विशेषज्ञों के मुताबिक कुछ सेक्टर फिलहाल ज्यादा जोखिम में दिखाई दे रहे हैं।
इनमें शामिल हैं-
- ऑयल मार्केटिंग कंपनियां
- एविएशन
- पेट्रोकेमिकल्स
- ऊर्जा आयात पर निर्भर कंपनियां
- अत्यधिक अस्थिर आईटी शेयर
पहली तिमाही के नतीजे अब तक मिले-जुले रहे हैं। हालांकि कई कंपनियों ने अनुमान से बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन महंगे कच्चे तेल का असर दूसरी तिमाही में ज्यादा स्पष्ट दिखाई दे सकता है। फर्टिलाइजर, केमिकल, पेंट्स और ऊर्जा आधारित उद्योगों की लागत बढ़ने का खतरा बना हुआ है।
दुनिया इस समय सिर्फ एक युद्ध नहीं बल्कि कई आर्थिक और भू-राजनीतिक मोर्चों पर बढ़ती अनिश्चितता का सामना कर रही है। अमेरिका-ईरान तनाव, भारत पर नए अमेरिकी टैरिफ, 100 डॉलर के पार पहुंचता कच्चा तेल और वैश्विक बाजारों में बढ़ती अस्थिरता निवेशकों की चिंता बढ़ा रहे हैं।
विशेषज्ञों की सलाह है कि अल्पकाल में बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है, लेकिन लंबी अवधि के निवेशकों के लिए अच्छी कंपनियों में चरणबद्ध निवेश का अवसर भी इसी तरह के दौर में बनता है। साथ ही, ऊर्जा आयात पर निर्भर सेक्टरों से सतर्क रहने और मजबूत फंडामेंटल वाले क्षेत्रों पर ध्यान देने की जरूरत है।