Foreign Direct Investment: नौकर‍ियों के ल‍िए सरकार का बड़ा मूव, भागती हुए आएंगी व‍िदेशी कंपन‍ियां


विदेशी कंपनी भारत में 15,000 करोड़ लगाने का प्लान लेकर आती है तो अब उसकी फाइल को हर बार दिल्ली के बड़े दरवाजे तक दौड़ लगाने की जरूरत न पड़े, सरकार ऐसा सिस्टम बनाने पर विचार कर रही है. फिलहाल 5,000 करोड़ से ज्यादा के विदेशी निवेश वाले प्रस्तावों को CCEA यानी कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स के पास जाना पड़ता है. अब इस लिमिट को बढ़ाकर 15,000 करोड़ करने की तैयारी है. सरकार का मकसद साफ है क‍ि विदेशी पैसा भारत आए, कंपनियां प्लांट लगाएं, कारोबार बढ़े और उसके साथ नौकरियों के मौके भी बनें.

अभी भारत में अगर किसी विदेशी कंपनी के FDI प्रस्ताव में 5,000 करोड़ से ज्यादा का विदेशी इक्विटी निवेश शामिल है, तो मामला CCEA के पास विचार के लिए जाता है. CCEA यानी कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं और इसमें गृह मंत्री, वित्त मंत्री समेत सरकार के बड़े मंत्री शामिल होते हैं. वहीं ₹5,000 करोड़ से नीचे के प्रस्तावों पर संबंधित मंत्रालय या विभाग फैसला ले सकता है. सरकार अब इस सीमा को ₹5,000 करोड़ से बढ़ाकर ₹15,000 करोड़ करने पर विचार कर रही है. यानी अगर यह प्रस्ताव मंजूर हो जाता है तो बड़ी रकम वाले कई FDI प्रस्तावों को CCEA के स्तर तक ले जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी और संबंधित मंत्रालय ही उन पर फैसला कर सकेंगे.

₹15,000 करोड़ की लिमिट क्यों बढ़ाना चाहती है सरकार?

सरकार का तर्क है कि 2015 में जब ₹5,000 करोड़ की सीमा तय की गई थी, तब से अर्थव्यवस्था का आकार काफी बढ़ चुका है. निवेश का पैमाना भी पहले के मुकाबले बहुत बड़ा हो गया है. महंगाई, बदलती आर्थिक परिस्थितियां और भारत में बड़े विदेशी निवेश को आकर्षित करने की कोशिशों को देखते हुए सरकार को लगता है कि पुरानी लिमिट को अब अपडेट करने का समय आ गया है. अधिकारियों की एक समिति यानी Committee of Secretaries की बैठक में भी CCEA की FDI अप्रूवल सीमा बढ़ाने का सुझाव दिया गया था. हालांकि अभी प्रस्ताव चर्चा के स्तर पर है. मतलब यह खबर “सरकार ने फैसला कर दिया” वाली नहीं है, बल्कि सरकार इस बदलाव पर विचार कर रही है.

इससे विदेशी कंपनियों को क्या फायदा होगा?

मान लीजिए कोई विदेशी कंपनी भारत में ₹10,000 करोड़ का निवेश करके नया मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाना चाहती है. मौजूदा व्यवस्था में ₹5,000 करोड़ की सीमा पार होने के कारण उसका प्रस्ताव CCEA के पास जाता है. अगर नई सीमा ₹15,000 करोड़ हो गई तो ऐसा प्रस्ताव संबंधित लाइन मिनिस्ट्री के स्तर पर ही तय नियमों के मुताबिक निपटाया जा सकेगा. इससे मंजूरी की प्रक्रिया आसान और संभावित रूप से तेज हो सकती है. सरकार का पूरा खेल यही है क‍ि विदेशी कंपनियों के लिए भारत में पैसा लगाना कम पेचीदा बनाया जाए. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ₹15,000 करोड़ तक का हर निवेश बिना जांच के अपने आप मंजूर हो जाएगा. FDI नीति, सेक्टर के नियम और दूसरे नियामकीय प्रावधान लागू रहेंगे.

असली फायदा नौकरियों में

बड़ी विदेशी कंपनी जब भारत में हजारों करोड़ रुपये लगाती है तो सिर्फ एक ऑफिस नहीं खोलती. फैक्ट्री बनती है, मशीनें आती हैं, सप्लायर जुड़ते हैं, ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स का काम बढ़ता है और आसपास कई तरह के छोटे-बड़े कारोबार खड़े होते हैं. यानी एक बड़ा निवेश सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार पैदा कर सकता है. अगर अप्रूवल की प्रक्रिया आसान होती है तो कंपनियां अपने प्रोजेक्ट को जल्दी आगे बढ़ा सकती हैं. हालांकि कितनी नौकरियां बनेंगी, यह कंपनी, सेक्टर और निवेश के आकार पर निर्भर करेगा. इसलिए ₹15,000 करोड़ की लिमिट बढ़ने का मतलब सीधे 15,000 करोड़ की नौकरियां नहीं, बल्कि निवेश आने का रास्ता आसान होना है.

भारत को China+1 का फायदा उठाने में मदद?

दुनिया की कंपनियां चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए दूसरे देशों में उत्पादन का विकल्प तलाश रही हैं. इसे ही आमतौर पर China+1 रणनीति कहा जाता है. भारत लंबे समय से इस मौके को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहा है. अगर बड़े विदेशी निवेश प्रस्तावों की मंजूरी प्रक्रिया आसान होती है तो भारत उन कंपनियों के लिए और आकर्षक बन सकता है जो यहां फैक्ट्री, सप्लाई चेन या दूसरे कारोबार स्थापित करना चाहती हैं. खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स, मैन्युफैक्चरिंग, ऑटोमोबाइल, सेमीकंडक्टर, ग्रीन एनर्जी और दूसरे बड़े निवेश वाले क्षेत्रों में इसका फायदा मिल सकता है. हालांकि निवेशक सिर्फ अप्रूवल देखकर नहीं आता. जमीन, बिजली, लॉजिस्टिक्स, टैक्स, स्किल्ड वर्कफोर्स और बाजार जैसे कई दूसरे फैक्टर भी फैसला तय करते हैं.

सरकार सिर्फ FDI की लिमिट नहीं बदल रही

मामला सिर्फ ₹5,000 करोड़ से ₹15,000 करोड़ की लिमिट बढ़ाने तक सीमित नहीं है. सरकार FDI के एक और नियम को आसान बनाने पर भी विचार कर रही है. यह downstream investment यानी अप्रत्यक्ष विदेशी निवेश से जुड़ा है. प्रस्ताव के मुताबिक अगर किसी भारतीय कंपनी में ऊपर की घरेलू कंपनी को पहले ही विदेशी निवेश के लिए सरकारी मंजूरी मिल चुकी है, तो उसके जरिए होने वाले कुछ indirect foreign investment के लिए दोबारा मंजूरी की जरूरत खत्म की जा सकती है. फिलहाल सरकारी मंजूरी की जरूरत दो मामलों में होती है. सरकारी अप्रूवल वाले सेक्टरों में downstream investment और भारत के साथ जमीन सीमा साझा करने वाले देशों से जुड़े निवेश में. सरकार इसे आसान बनाकर विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ाना चाहती है.

भारत में अब तक कितना विदेशी पैसा आया?

सरकार पिछले कुछ साल से लगातार विदेशी निवेश को आकर्षित करने की कोशिश कर रही है. PTI के मुताबिक अप्रैल 2000 से मार्च 2026 के बीच भारत में कुल FDI निवेश 1.16 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा हो चुका है. भारत में निवेश करने वाले बड़े देशों में मॉरीशस, सिंगापुर, अमेरिका, नीदरलैंड, जापान, ब्रिटेन और यूएई शामिल हैं. अब सरकार का नया फोकस यह है कि निवेश की रकम के साथ-साथ उसकी रफ्तार भी बढ़े. अगर CCEA की सीमा ₹5,000 करोड़ से बढ़ाकर ₹15,000 करोड़ करने का प्रस्ताव मंजूर होता है, तो बड़े निवेश प्रस्तावों के लिए एक अतिरिक्त मंजूरी स्तर कम हो सकता है. सरकार को उम्मीद है कि इससे Ease of Doing Business बेहतर होगा, विदेशी कंपनियां ज्यादा तेजी से निवेश के फैसले ले सकेंगी और नए प्रोजेक्ट के साथ रोजगार के मौके भी बढ़ सकते हैं. फिलहाल यह प्रस्ताव चर्चा के स्तर पर है, इसलिए अंतिम असर सरकार के फैसले के बाद ही साफ होगा.



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