होर्मुज में एक बार फिर से जो हालात पैदा हुए हैं, उसके पीछे की कहानी लंबी हो चुकी है। वहां जो कुछ हो रहा है, वह भारत के नियंत्रण में नहीं है। ऐसे में भारत के लिए क्या रास्ता हो सकता है, पूर्व विदेश सचिव ने बताया।

पश्चिम एशिया में हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि भारत ने शिपिंग कंपनियों से दो टूक कह दिया है कि अगले आदेश तक होर्मुज से गुजरने के दौरान अपने जहाजों पर भारतीय नाविकों को तैनात न करें। भारत ने तीन जहाजों पर हुए हमले में दो भारतीय नाविकों के मारे जाने के बाद यह सख्त कदम उठाया है। इससे पहले विदेश मंत्रालय ईरानी राजनयिक को तलब करके भारतीय नागरिकों की मौत को लेकर अपनी नाराजगी जता चुका है। लेकिन, कंवल सिब्बल ने कहा है कि जिस तरह के हालात हैं, उसमें इतने भर से काम नहीं चलेगा।
‘अमेरिकी नीति को लेकर सचेत रहना होगा’
कंवल सिब्बल ने एक्स पोस्ट के माध्यम से कहा है कि ‘अमेरिका के साथ भारत की साझेदारी कई अहम हितों को पूरा करती हैं, लेकिन ये घटनाएं बताती हैं कि अमेरिका का रणनीतिक कदम हमेशा भारत की स्थिरता और सुरक्षित ऊर्जा आपूर्ति के हिसाब से ही होगा, यह जरूरी नहीं।’
‘सिर्फ कूटनीतिक विरोध से काम नहीं चलेगा’
उनके मुताबिक, ‘भारत की जो कमजोरियां हैं, उनकी वास्तविकता को ध्यान में रखना ही होगा, जैसे कि ऊर्जा मार्गों में जो अहम चेकप्वाइंट्स हैं, वह हमारे कंट्रोल में नहीं है और बाहरी ताकतों की वजह से प्रभावित हो सकते हैं।’
घटना के बाद कूटनीतिक विरोध जताने से ज्यादा इस तरह की कमजोरियों को कम करने की जरूरत है।
कंवल सिब्बल, पूर्व विदेश सचिव
‘अमेरिकी नीति का खामियाजा भुगतना पड़ता है’
- कंवल सिब्बल ने बताया है कि ईरान में जो कुछ हो रहा है, वह अचानक नहीं हुआ है।
- उनके अनुसार यह उसके खिलाफ लंबी अमेरिकी नीति का नतीजा है।
- उनके अनुसार अमेरिका-ईरान के संबंधों के बीच में भारत के लिए करने को ज्यादा कुछ नहीं है।
- लेकिन, इनकी वजह से भारतीय नागरिकों की सुरक्षा खतरे में पड़ती है, जहाजों के इंश्योरेंस का प्रीमियम बढ़ता है और सबसे बड़ी बात की होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर तेल की सप्लाई ठंडे बस्ते में पड़ जाती है।
पश्चिम एशिया में अमेरिका ने बनाया अस्थिरता का पैटर्न
- जेएनयू चांसलर कंवल सिब्बल के अनुसार पश्चिम एशिया में अमेरिकी नीति की वजह से भारत को पहली बार भुगतना नहीं पड़ रहा है।
- अमेरिका का इस क्षेत्र में इस तरह का एक पैटर्न लगातार बना हुआ है।
- इसमें फैसले सीधे वॉशिंगटन में लिए जाते हैं और उसका खामियाजा भारत को भुगतना पड़ता है।
- ऐसे में भारत को होर्मुज जलडमरूमध्य से अलग हटकर कुछ ज्यादा ही गंभीरता से सोचना होगा।
