India Australia Uranium Deal: ऑस्‍ट्रेल‍िया ने कभी भारत को बोल द‍िया था ‘ना’, आज करनी पड़ी डील, 15 साल में क्‍या बदला?


होमताजा खबरनॉलेज

ऑस्‍ट्रेल‍िया ने कभी भारत को बोल द‍िया था ‘ना’, आज करनी पड़ी डील, क्‍या बदला?

Last Updated:

भारत की बढ़ती ताकत का एक और नमूना देख‍िए. एक वक्‍त था, जब ऑस्‍ट्रेल‍िया कहता था क‍ि हम भारत पर भरोसा नहीं कर सकते. हम उसे यूरेन‍ियम नहीं दे सकते. लेकिन अब 15 साल बाद उसी ऑस्‍ट्रेल‍िया को लगता है क‍ि भारत हमारे ल‍िए जरूरी है.

ऑस्‍ट्रेल‍िया ने कभी भारत को बोल द‍िया था 'ना', आज करनी पड़ी डील, क्‍या बदला?Zoom

बात ज्यादा पुरानी नहीं है, सिर्फ 2010 के आस-पास की है. तब ऑस्ट्रेलिया भारत को यूरेनियम बेचने के नाम पर सीधे मुंह बात तक नहीं करता था. उसका सीधा सा जवाब होता था- ‘नो मतलब नो!’ कहता था कि भारत ने परमाणु अप्रसार संधि यानी NPT पर साइन नहीं किए हैं. उस समय वहां की सत्ताधारी लेबर पार्टी कहती थी क‍ि जो देश NPT पर साइन नहीं करेगा, हम उसे एक ग्राम यूरेनियम भी नहीं देंगे. ऑस्ट्रेलिया को डर था कि कहीं यूरेनियम का इस्तेमाल हथियार बनाने में न हो जाए. लेकिन वक्‍त बदला. आज वही ऑस्‍ट्रेल‍िया खुशी-खुशी भारत के साथ यूरेनियम डील कर चुका है. तो इन 15 सालों में ऐसा क्या हो गया कि जो ऑस्ट्रेलिया कभी आंखें दिखाता था, उसे अपना फैसला पलटना पड़ा?

सबसे बड़ा बदलाव भारत की साख में आया. 2008 में ही भारत को न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप यानी NSG से एक खास छूट मिल गई थी. पूरी दुनिया ने मान लिया था कि भले ही भारत ने NPT पर साइन नहीं किए हैं, लेकिन भारत एक बहुत जिम्मेदार देश है. उसने कभी भी अपनी परमाणु तकनीक का गलत इस्तेमाल या किसी और को ट्रांसफर नहीं किया. भारत का यह बेदाग रिकॉर्ड देखकर ऑस्ट्रेलिया का रवैया भी नरम पड़ने लगा.

खुद ऑस्ट्रेलिया ने बदल डाले अपने नियम

जब भारत का दुनिया में डंका बजने लगा, तो ऑस्ट्रेलिया को समझ आ गया कि वह अकेले अपनी पुरानी जिद पर अड़ा नहीं रह सकता. 2011 में वहां की लेबर पार्टी ने अपने ही पुराने नियम को कूड़ेदान में डाल दिया. उन्होंने बकायदा वोटिंग करके तय किया कि भाई, भारत को यूरेनियम बेचने पर लगा बैन अब हटाना पड़ेगा. यह एक बहुत बड़ा यू-टर्न था.

2014 की ऐतिहासिक डील और पक्की गारंटी

इसके बाद 2014 में वो ऐतिहासिक दिन आया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के तत्कालीन पीएम टोनी एबॉट ने ‘असैन्य परमाणु समझौते’ पर दस्तखत किए. भारत ने ऑस्ट्रेलिया को पक्की गारंटी दी कि आप जो यूरेनियम देंगे, उससे हम सिर्फ बिजली बनाएंगे, बम नहीं. यह सारा काम इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी यानी IAEA की कड़ी निगरानी में होगा. बस, ऑस्ट्रेलिया की सारी टेंशन यहीं खत्म हो गई.

असली गेम चेंजर ड्रैगन का डर

अब बात करते हैं जिओ-पॉलिटिक्स की. इसमें चीन का बहुत बड़ा हाथ रहा. जैसे-जैसे इंडो पैस‍िफ‍िक रीजन में चीन अपनी गुंडागर्दी और दादागिरी दिखाने लगा, ऑस्ट्रेलिया घबरा गया. चीन से उसके व्यापारिक और कूटनीतिक रिश्ते बिगड़ने लगे. तब ऑस्ट्रेलिया को समझ आया कि इस इलाके में चीन को अगर कोई टक्कर दे सकता है, तो वो सिर्फ और सिर्फ भारत है. भारत जैसा बड़ा, लोकतांत्रिक और ताकतवर दोस्त अब ऑस्ट्रेलिया की जरूरत बन चुका था.

चढ़ती इकोनॉमी से कौन दूरी बनाएगा

अब बात इकोनॉमी की. भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बन रहा था. हमें अपने नए पावर प्लांट्स के लिए यूरेनियम चाहिए था और ऑस्ट्रेलिया के पास दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम भंडार है. ऑस्ट्रेलिया के खदान मालिकों को एक परमानेंट और भरोसेमंद ग्राहक चाहिए था. तो बस, दोनों के फायदे आपस में मैच कर गए. यानी 15 साल पहले जो ऑस्ट्रेलिया परमाणु नियमों के नाम पर भारत को ज्ञान देता था, उसे समझ आ गया कि न्यू इंडिया एक जिम्मेदार महाशक्ति है. अब ऑस्ट्रेलिया को हमारी उतनी ही जरूरत है, जितनी हमें उनकी.

About the Author

authorimg

ज्ञानेंद्र म‍िश्रDeputy News Editor

Gyanendra Kumar Mishra is a senior journalist with nearly 20 years of experience in the media industry. He is currently associated with News18 Hindi (hindi.new…और पढ़ें





Leave a Comment