- ईरान-अमेरिका तनाव से क्षेत्रीय संघर्ष की संभावना पर दुनिया चिंतित।
- स्विट्जरलैंड, न्यूजीलैंड, भूटान जैसे देश तटस्थ रहने की संभावना रखते हैं।
- अमेरिका को नाटो, ईरान को रूस-चीन से समर्थन मिल सकता है।
- भारत रणनीतिक स्वायत्तता अपनाकर संतुलित संबंध बनाए रखेगा।
Iran US conflict: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने एक बार फिर से क्षेत्रीय संघर्ष की संभावना को लेकर दुनिया भर में चिंता को बढ़ा दिया है. ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर हालिया हमलों, होर्मुज में कमर्शियल जहाजों पर हमलों और युद्ध विराम की कोशिशों के नाकाम होने से यह डर बढ़ चुका है कि इस संकट में कई देश शामिल हो सकते हैं. ऐसे हालातों में कई लोग यह सोच रहे हैं कि अगर बड़े पैमाने पर वैश्विक संघर्ष छिड़ता है तो कौन से देश तटस्थ रहने की सबसे ज्यादा संभावना रखते हैं.
तटस्थ रहने की सबसे ज्यादा संभावना वाले देश
स्विट्जरलैंड को दुनिया का सबसे मशहूर तटस्थ देश माना जाता है. इसने काफी लंबे समय से सैन्य तटस्थता की नीति अपना रखी है. साथ ही यह नाटो का सदस्य नहीं है. ऐतिहासिक रूप से इस देश ने अंतरराष्ट्रीय सशस्त्र संघर्ष में भाग लेने से परहेज किया है और साथ ही अक्सर कूटनीतिक और शांति वार्ता के लिए एक मंच के तौर पर काम किया है.
इसी के साथ दक्षिण प्रशांत क्षेत्र का न्यूजीलैंड ज्यादातर बड़े संघर्ष वाले इलाकों से हजारों किलोमीटर दूर है. इसकी भौगोलिक दूरी, स्थिर राजनीतिक व्यवस्था और मजबूत कृषि क्षेत्र इसे उन देशों में शामिल करता है जिन्हें अक्सर वैश्विक सैन्य संघर्ष से काफी हद तक सुरक्षित माना जाता है.
इसी के साथ भूटान की विदेश नीति पारंपरिक रूप से शांतिपूर्ण विकास और सीमित अंतरराष्ट्रीय सैन्य भागीदारी पर जोर देती रही है. हिमालय में बसा यह देश आमतौर पर वैश्विक संघर्ष से काफी दूर रहता है.
इंडोनेशिया काफी लंबे समय से गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सिद्धांत पर आधारित एक आजाद और सक्रिय विदेश नीति का पालन करता रहा है. दक्षिण पूर्व एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने की वजह से यह आमतौर पर औपचारिक सैन्य गठबंधन से बचते हुए कूटनीतिक समाधान तलाशता है.
दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी किनारे पर बसा होने की वजह से चिली आज के कई भू राजनीतिक तनाव वाले इलाकों से काफी दूर है. इस देश की भौगोलिक स्थिति को ऐसे कारक के तौर पर देखा जाता है जो इसे किसी बड़े संघर्ष में सीधे शामिल होने के जोखिम से बचा सकता है.
प्रशांत क्षेत्र के दो छोटे द्विपीय देश फिजी और तुवालू का राजनीतिक महत्व काफी सीमित है. ये आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय मामलों के बजाय क्षेत्रीय सहयोग, जलवायु संबंधी मुद्दों और आर्थिक विकास पर ध्यान लगाते हैं.
इसी के साथ दक्षिण अफ्रीका ने पारंपरिक रूप से एक आजाद विदेश नीति अपनाई है और अक्सर बहुपक्षीय संस्थाओं के जरिए बातचीत की वकालत करता है.
यह भी पढ़ेंः राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत गाते वक्त शब्द गलत हुए तो कितनी मिलेगी सजा, क्या हैं नियम?
कौन से देश अमेरिका का समर्थन कर सकते हैं?
अगर तनाव और भी ज्यादा बढ़ता है तो ऐसा कहा जा रहा है कि अमेरिका को अपने पुराने सहयोगियों से समर्थन मिलेगा. इसमें यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस और जर्मनी जैसे नाटो सदस्य शामिल हो सकते हैं.
सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन समेत कई खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं. लेकिन इन देशों ने आमतौर पर क्षेत्रीय संघर्ष में सीधे तौर पर शामिल होने से बचने की कोशिश की है.
ईरान के करीबी माने जाने वाले देश
ईरान के कई क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ संबंध हैं. लेबनान में हिजबुल्लाह और यमन में हूथी जैसे समूह को ईरान के क्षेत्रीय हितों के साथ जुड़ा हुआ माना जाता है. वहीं रूस और चीन के तेहरान के साथ काफी मजबूत राजनयिक, आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं.
क्या होगा भारत का रुख?
भारत में पारंपरिक रूप से रणनीतिक स्वायत्तता की नीति अपनाई है. इसमें किसी एक गुट के साथ स्थायी रूप से जुड़ने के बजाय कई वैश्विक ताकतों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश की जाती है. अगर कोई बड़ा क्षेत्रीय संघर्ष भी होता है तो भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा की रक्षा, विदेश में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, व्यापारिक मार्ग को स्थिर रखने और राजनयिक बातचीत को बढ़ावा देने को प्राथमिकता देगा.
यह भी पढ़ेंः हमेशा सीधी लाइन में ही क्यों चलती हैं चींटियां, क्या है इसके पीछे की वजह?