इश्तियाक अहमद ने फ्राइडे टाइम्स में यमन में हुए हमलों से ईरान युद्ध में बदलाव, खासतौर से पाकिस्तान के जंग में उतरने की स्थिति पर बात की है। उनका कहना है कि यमन के घटनाक्रम को अलग-थलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। यमन के हूतियों को ईरान अपने आखिरी दांव की तरह देख रहा है लेकिन यह पाकिस्तान की युद्ध में एंट्री की वजह भी बन सकता है।
ईरान पर बढ़ता दबाव
ईरान की सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। होर्मुज से लेकर लेबनान तक वह मुश्किल में है। कई मोर्चों पर बढ़ते दबाव के बीच तेहरान का हूतियों को आगे करने का फैसला दिखाता है कि उसके रणनीतिक विकल्प कम हो रहे हैं। हिजबुल्लाह कमजोर हो गया है। इराक और सीरिया में भी ईरान अपनी रणनीतिक बढ़त खो रहा है।
हूती तेहरान के एकमात्र ऐसे प्रॉक्सी हैं, जो सऊदी को धमका सकते हैं। वे लाल सागर में शिपिंग में रुकावट डाल सकते हैं। ईरान का मकसद सऊदी हवाई अड्डों पर मिसाइल हमलों से कहीं आगे है। वह सऊदी अरब को क्षेत्रीय युद्ध में खींचना चाहता है। इस व्यापक टकराव से कई मोर्चों पर सैन्य और कूटनीतिक ध्यान बंटने से तेहरान पर दबाव कम होगा।
सऊदी अरब की मुश्किल
सऊदी अरब के पास ईरान के जाल में फंसने का कोई खास कारण नहीं है। जब से संघर्ष शुरू हुआ है, रियाद ने लगातार रणनीतिक संयम बरता है और ईरान के खिलाफ व्यापक सैन्य अभियान का काम मुख्य रूप से अमेरिका पर छोड़ दिया है। सऊदी की तत्काल रणनीतिक चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य के बजाय बाब अल-मंदेब में है।
बाब अल-मंदेब में हूतियों की रुकावट से लाल सागर में शिपिंग को खतरा होगा और यानबू से तेल निर्यात प्रभावित होगा। इससे सऊदी अरब के वैश्विक लॉजिस्टिक्स हब बनने के सपने को नुकसान पहुंचेगा। इसलिए रियाद के पास ईरान के साथ सीधे टकराव के बजाय हूती खतरे को खत्म करने पर ध्यान केंद्रित करने का कारण दिखता है।
पाकिस्तान की कूटनीति
पाकिस्तान की कूटनीति अलग तरह की रही है। उसके सऊदी अरब, कतर, चीन और ईरान के साथ अच्छे कामकाजी संबंध हैं। दूसरी ओर सऊदी-पाकिस्तान रणनीतिक आपसी रक्षा समझौते के तहत इस्लामाबाद को ईरान और उसके क्षेत्रीय प्रॉक्सी से खतरों के खिलाफ रियाद की रक्षा में मदद करना और खाड़ी के उभरते सुरक्षा ढांचे को मजबूत करना है।
पाकिस्तान का सऊदी अरब से नाटो स्टाइल का रक्षा समझौता है। हालांकि जब तक रियाद अपनी सैन्य कार्रवाई को यमन के अंदर हूथी खतरे को खत्म करने तक सीमित रखता है, तब तक पाकिस्तान का योगदान खुफिया जानकारी साझा करने, सैन्य तालमेल, प्रशिक्षण, हवाई सुरक्षा और रक्षात्मक तैयारियों पर ही केंद्रित रहने की संभावना है।
पाकिस्तान लड़ाई में कूदेगा?
सऊदी के बुनियादी ढांचे या रणनीतिक समुद्री रास्तों, खासतौर से बाब अल-मंदेब और लाल सागर में हमले सऊदी की सुरक्षा जरूरतों को पूरी तरह से बदल देंगे। ऐसी स्थितियों में पाकिस्तान रक्षा समझौते के तहत हवाई, नौसैनिक और अन्य सैन्य क्षमताएं प्रदान कर सकता है।
पाकिस्तान की प्राथमिकता सऊदी अरब की हमलों से रक्षा करना, लाल सागर के समुद्री मार्गों की सुरक्षा बहाल करना और हूती खतरे को खत्म करना रहेगी, ना कि ईरान के खिलाफ मोर्चा खोलना। ऐसे में फिलहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि यमन में घटनाक्रम क्या मोड लेता है।
