Lottery Lessons: पी.पी. राघवन केरल के रहने वाले हैं। वह 60 साल से ज्यादा समय से लॉटरी खेल रहे हैं। इन लॉटरी पर उन्होंने करीब 2 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। यह और बात है कि आज तक उनका जैकपॉट नहीं खुला। जैकपॉक खुलने की उम्मीद में उनकी पत्नी के जेवर तक बिक गए।

1 नवंबर, 1967 को शुरू हुई केरल लॉटरी का मकसद बेरोजगारी को दूर करना और जनता पर बोझ डाले बिना सरकार के लिए रेवेन्यू जुटाना था। पहले टिकट पर 50,000 रुपये का इनाम था। पहला ड्रॉ 26 जनवरी, 1968 को हुआ था।
1967 में खरीदा था अपना पहला लॉटरी टिकट
मनोरमा न्यूज के अनुसार, राघवन का लॉटरी से नाता केरल की अपनी स्कीम शुरू होने से पहले ही जुड़ गया था। 1967 में उन्होंने अपना पहला टिकट खरीदा, जो भूटान लॉटरी का टिकट था। इसके कुछ ही समय बाद उन्होंने एक रुपये में केरल का पहला लॉटरी टिकट खरीदा। किस्मत आजमाने की कोशिश जल्द ही जिंदगी भर की आदत बन गई। राघवन इस उम्मीद में टिकट खरीदते रहे कि कभी न कभी किस्मत उन पर मेहरबान होगी। उन्होंने जो आखिरी टिकट खरीदा, वह हाल ही में जारी हुआ विशु बंपर लॉटरी टिकट था।
ज्यादातर लॉटरी के शौकीनों के उलट जो ड्रॉ के बाद टिकट फेंक देते हैं, राघवन ने खरीदे गए हर टिकट को संभाल कर रखा। दशकों में यह कलेक्शन किस्मत के साथ उनके सफर का एक पर्सनल आर्काइव बन गया। जब उन्होंने टिकटों पर खर्च की गई रकम का हिसाब लगाया तो यह आंकड़ा लगभग 2 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। खुद राघवन के शब्दों में वे करोड़ों रुपये गंवाने वाले सबसे बदकिस्मत आदमी हैं।
जैकपॉट हमेशा रहा दूर
किस्मत कभी-कभी उन पर मेहरबान हुई। लेकिन, बहुत कम। राघवन ने कई बार छोटे-मोटे इनाम जीते। इसमें भूटान लॉटरी में 4,000 रुपये का तीन अंकों वाला इनाम भी शामिल था। हालांकि, जिंदगी बदलने वाला जैकपॉट हमेशा उनसे दूर ही रहा।
उनकी खेती से होने वाली कमाई का एक हिस्सा टिकट खरीदने में खर्च होता था। राघवन अपनी ढाई एकड़ जमीन पर धान, नारियल और केले की खेती करते थे। पशुपालन में भी सक्रिय रूप से शामिल थे। कभी-कभी वे टिकट खरीदने के लिए पय्यानूर और कान्हांगद जाते थे। कुछ दिनों में 1,000 रुपये से 3,000 रुपये तक खर्च कर देते थे।
पत्नी के गहने तक बेचे
एक समय वह उस इलाके में लॉटरी एजेंटों के सबसे वफादार ग्राहकों में से एक थे। लेकिन, किस्मत आजमाने की उनकी इस आदत की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी। जब कर्ज बढ़ गया तो उन्हें अपनी जमीन और यहां तक कि अपनी पत्नी के गहने भी बेचने पड़े।
आज, राघवन और उनकी पत्नी के. शांता 25 सेंट के प्लॉट पर बने एक छोटे से घर में रहते हैं। उम्र बढ़ने के साथ आई दिक्कतों की वजह से उनका आना-जाना कम हो गया है। आजकल वह शायद ही कभी घर से बाहर निकलते हैं। उनकी लॉटरी खेलने की आदत भी बदल गई है। अब वह सिर्फ बंपर टिकट खरीदते हैं। फिर भी जिस उम्मीद ने राघवन को छह दशकों तक आगे बढ़ने की हिम्मत दी, वह पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
राघवन मुस्कुराते हुए कहते हैं, ‘मुझे हमेशा यकीन था कि किस्मत की देवी एक दिन मुझ पर मेहरबान होंगी। लेकिन, ऐसा कभी नहीं हुआ। आज मैं सबसे बदनसीब इंसान हूं जिसने करोड़ों रुपये गंवा दिए हैं।’
