बलूचिस्तान में हालिया महीनों में पाकिस्तान की सरकार और सेना के लिए मुश्किल लगातार बढ़ी है। ऐसे में अमरुल्लाह सालेह का इशारा बलूचिस्तान में किसी बड़ी हलचल का संकेत देता है।

अमरुल्लाह सालेह अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी से पहले सरकार का हिस्सा थे। तालिबान के सत्ता पर कब्जे के बाद उन्होंने काबुल छोड़ दिया था। उनको तालिबान का दुश्मन माना जाता है तो पाकिस्तानी सेना पर भी वह बेहद आक्रामक रहे हैं। उन्होंने बीते हफ्ते ही बलूचिस्तान में हुए हमले के बाद पाकिस्तानी सेना और काबुल पर सवाल किया था। इस महीने वह कई दफा बलूचिस्तान में हिंसा पर बात कर चुके हैं।
बलूचिस्तान को लेकर क्यों बढ़ी चर्चा
बलूचिस्तान के लोगों का पाकिस्तानी सरकार और सेना के खिलाफ संघर्ष कई दशक पुराना है लेकिन हालिया महीनों में यह काफी तेज हुआ है। बलूचिस्तान में एक तरफ हथियारबंद गुटों ने पाकिस्तान सेना को निशाना बनाया है तो वहीं स्थानीय संगठनों ने लगातार सड़कों पर उतरकर बड़ा आंदोलन किया है।
बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना ताकत के दम पर आंदोलन को दबाती रही है। हालिया दिनों में भी लगातार ऑपरेशन किए गए हैं। इसके बावजूद कई रिपोर्ट बताती हैं कि क्षेत्र के कई हिस्से पाकिस्तान के कंट्रोल से निकल चुके हैं और उनको स्थानीय गुट चला रहे हैं। सरकारी इमारतों तक पर विद्रोही गुटों ने कब्जे किए हैं।
फिर टूटेगा पाकिस्तान?
साल 1947 में भारत के बंटवारे के बाद अस्तित्व में आया पाकिस्तान एक बार टूट चुका है। साल 1971 में पूर्वी पाकिस्तान अलग देश (बांग्लादेश) बना गया था। हालिया महीनों में बलूचिस्तान में जिस तरह से विरोध तेज हुआ है, उसके बाद पाकिस्तान में यह चिंता है कि कहीं देश एक बार फिर तो नहीं टूट जाएगा।
पाकिस्तानी सेना, सरकार और वहां के एक्सपर्ट बलूचिस्तान की समस्या के लिए अक्सर भारत को निशाने पर लेते रहे हैं। भारत के अलावा अफगानिस्तान और इजरायल का रोल होने का दावा भी पाकिस्तानी एक्सपर्ट करते रहे हैं। बलूच लोगों का कहना है कि वह अपनी जमीन और संसाधनों को बचाने के लिए लड़ रहे हैं।
