Success Story: उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले की सरकारी शिक्षिका संगीता मौर्या की कहानी आज हजारों शिक्षकों और अभिभावकों के लिए प्रेरणा बन चुकी है। करीब 12 साल पहले जब उनकी पहली नियुक्ति एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में हुई, तो वहां का हाल देखकर उनकी आंखों में आंसू आ गए।
स्कूल की इमारत जर्जर थी, बेंच टूटी हुई थीं और 130 नामांकित छात्रों में से केवल 30 बच्चे ही स्कूल आते थे। उसी दिन संगीता ने तय कर लिया कि वह सिर्फ पढ़ाने नहीं, बल्कि इस स्कूल की तस्वीर बदलने आई हैं।
घर-घर जाकर बच्चों को स्कूल लाने का अभियान शुरू किया
संगीता मौर्या ने सबसे पहले बच्चों की कम उपस्थिति की वजह जानने की कोशिश की। स्कूल की छुट्टी के बाद वह रोज गांव के घर-घर जातीं और अभिभावकों से मिलकर शिक्षा का महत्व समझातीं। कई परिवार आर्थिक तंगी के कारण बच्चों से काम कराते थे। ऐसे परिवारों को समझाना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। धीरे-धीरे लोगों का भरोसा बढ़ा और माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल भेजने लगे।
एक महीने में बदल गई स्कूल की तस्वीर
लगातार प्रयासों का असर जल्द ही दिखने लगा। केवल एक महीने के भीतर स्कूल में आने वाले बच्चों की संख्या 30 से बढ़कर 100 से अधिक हो गई। यह बदलाव सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं था, बल्कि बच्चों में पढ़ाई के प्रति उत्साह भी बढ़ने लगा।
किताबों के साथ कहानियां और खेल भी बने पढ़ाई का हिस्सा
संगीता ने पढ़ाई को रोचक बनाने के लिए पारंपरिक तरीके से अलग सोच अपनाई। वह बच्चों को कहानियां सुनातीं, गीत गातीं, पहेलियां पूछतीं और खेल-खेल में पढ़ाई करातीं। कक्षा में बच्चों को शिक्षक, डॉक्टर और पुलिस अधिकारी जैसी भूमिकाएं निभाने का मौका भी दिया जाता था। इस तरीके से बच्चे बिना किसी दबाव के नई बातें सीखने लगे और स्कूल आने में उनकी रुचि बढ़ गई।
शिक्षक से बढ़कर बनीं बच्चों की मां और दोस्त
संगीता का मानना है कि ग्रामीण स्कूलों में शिक्षक केवल पढ़ाने का काम नहीं करता। कई बार उसे बच्चों का दोस्त, सलाहकार और मां जैसी भूमिका भी निभानी पड़ती है।
वह बच्चों के साथ जमीन पर बैठकर दोपहर का भोजन करती हैं ताकि बच्चों को अपनापन महसूस हो। स्कूल में मौसमी बीमारियों के लिए जरूरी दवाइयां भी रखती हैं। उनकी कोशिश रहती है कि किसी बच्चे को यह महसूस न हो कि वह अकेला है।
स्कूल के बाद भी खत्म नहीं होता काम
स्कूल की छुट्टी दोपहर में हो जाती है, लेकिन संगीता का काम शाम तक चलता है। वह अगले दिन की पढ़ाई की तैयारी करती हैं, जरूरी कागजी काम पूरा करती हैं और जिन बच्चों की उपस्थिति कम रहती है, उनके घर जाकर अभिभावकों से फिर बात करती हैं। उनके लिए पढ़ाना केवल सरकारी नौकरी नहीं, बल्कि समाज को बदलने का एक मिशन है।
परिवार और नौकरी दोनों को संभाला
संगीता मौर्या शादीशुदा हैं और एक बेटे की मां भी हैं। उन्होंने हमेशा अपने परिवार और शिक्षक की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाए रखा। उनका कहना है कि व्यक्तिगत चुनौतियों को उन्होंने कभी अपने छात्रों पर हावी नहीं होने दिया।
आज बच्चों की मुस्कान ही सबसे बड़ा पुरस्कार
संगीता मौर्या कहती हैं कि जब उन्होंने स्कूल में कदम रखा था, तब कक्षाएं लगभग खाली रहती थीं। आज उन्हीं कमरों में बच्चों की हंसी, सवाल और सीखने की उत्सुकता गूंजती है। जब कोई बच्चा उनसे कहता है कि वह भी बड़ा होकर शिक्षक बनना चाहता है, तो यही उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान और पुरस्कार होता है।