TCS Nida Khan Case: सनातन हिन्दू धर्म को बुरा बताया, पर भगवान कृष्ण के नाम पर मिली राहत,जानें और क्या कहा अदालत ने – tcs nida khan case pregnant accused gets bail after court invokes lord krishna analogy


नई दिल्ली: महाराष्ट्र के नासिक में टाटा ग्रुप के TCS कंपनी में सनातन हिंदू धर्म के बारे आपत्तिजनक बातें करने, दफ्तर में लड़कियों को इस्लाम में धर्म परिवर्तन और यौन उत्पीड़न का मामला फिर से सुर्खियों में है। इस मामले में आरोपी निदा खान को जमानत मिलने के बाद लोगों का चौंकना स्वाभाविक है, क्यूंकि कानूनी प्रावधानों के तहत प्रशासन ने उस पर काफी कड़ी कानूनी धाराएं लगायीं थीं।

लेकिन इस मामले में एक बड़ी विडंबना वाली बात हुई है। हिंदू धर्म के बारे आपत्तिजनक बातें करने, दफ्तर में लड़कियों को इस्लाम में धर्म परिवर्तन और यौन उत्पीड़न करने की आरोपी, निदा खान जो पांच महीने की गर्भवती भी है, उसे जमानत मिली, तो सनातन हिंदू धर्म के भगवान कृष्ण के संदर्भ से। मामले की सुनवाई कर रहे अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के. जी. जोशी ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी पांच महीने की गर्भवती है और किसी भी बच्चे को भगवान श्रीकृष्ण की तरह जेल में जन्म लेने की सामाजिक पीड़ा का सामना नहीं करना चाहिए।

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कौन है निदा खान, निदा खान केस क्या है

निदा खान, जिसके नाम से ही लोग ‘नासिक टीसीएस धर्मांतरण और उत्पीड़न’ मामले को निदा खान केस के नाम से भी जानते हैं, नासिक में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज TCS काम करती थी। आरोप हैं कि वह बीपीओ यूनिट में काम करने वाली महिला कर्मचारियों के यौन उत्पीड़न, ब्लैकमेलिंग और जबरन धर्म परिवर्तन कराने की मास्टर माइंड रही है। उस पर यह भी आरोप है कि उसने कंपनी में अन्य सह-आरोपियों द्वारा किए जा रहे महिला उत्पीड़न को बढ़ावा दिया और सनातन हिंदू धर्म की बुराई कर सहकर्मियों को इस्लाम अपनाने के लिए ब्रेनवॉश किया।
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निदा खान 5 महीने की गर्भवती है , लगाई थी जमानत याचिका

नासिक रोड स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने 6 जुलाई को निदा खान की जमानत याचिका स्वीकार की। अदालत ने कहा कि आरोपी पांच महीने की गर्भवती है और गर्भस्थ शिशु के हितों को भी ध्यान में रखना न्यायिक दायित्व है। न्यायालय ने यह भी माना कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है और पुलिस चार्जशीट दाखिल कर चुकी है। ऐसे में आरोपी की आगे की हिरासत जांच के लिए आवश्यक नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत देना आरोपों से बरी करना नहीं है।

जिस प्रकार भगवान कृष्ण का जन्म कारागार में हुआ था, वैसी परिस्थिति किसी नवजात को नहीं झेलनी चाहिए। न्यायाधीश ने इसे सामाजिक कलंक और मानसिक पीड़ा से जोड़ते हुए कहा कि गर्भस्थ शिशु के समग्र हितों को देखते हुए न्यायिक विवेक का प्रयोग किया जाना उचित होगा।

निदा खान की जमानत पर अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के. जी. जोशी की टिप्पणी

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भगवान कृष्ण का उदाहरण क्यों आया?

जमानत आदेश की सबसे चर्चित टिप्पणी भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से जुड़ी रही। अदालत ने कहा कि जिस प्रकार भगवान कृष्ण का जन्म कारागार में हुआ था, वैसी परिस्थिति किसी नवजात को नहीं झेलनी चाहिए। न्यायाधीश ने इसे सामाजिक कलंक और मानसिक पीड़ा से जोड़ते हुए कहा कि गर्भस्थ शिशु के समग्र हितों को देखते हुए न्यायिक विवेक का प्रयोग किया जाना उचित होगा। अदालत की यह टिप्पणी कानूनी आदेश का हिस्सा बनी। एक तरह से अदालत के इस फैसले के बाद से इसके बाद से ही इस पर सार्वजनिक और राजनीतिक बहसों का सिलसिला शुरू हो गया है।

आगे क्या होगी कानूनी प्रक्रिया?

इस बात से सबको इत्तिफाक रखना चाहिए कि ‘नासिक टीसीएस धर्मांतरण और उत्पीड़न’ केस की मुख्य आरोपी निदा खान को भगवान कृष्ण के नाम पर जमानत मिली है, जो कि उसके लिए और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए काफी राहत की बात है। लेकिन जमानत मिलने के बावजूद उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा जारी रहेगा। अदालत में आरोप तय होने, गवाहों के बयान और साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही दोषसिद्धि या बरी होने का निर्णय होगा। इस मामले की जांच विशेष जांच दल कर रहा है और विभिन्न एफआईआर की जांच भी जारी है। यदि जमानत की शर्तों का उल्लंघन होता है तो अभियोजन पक्ष जमानत निरस्त करने की मांग कर सकता है।

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भारतीय न्याय व्यवस्था का मानवीय पहलू

बहरहाल, ‘नासिक टीसीएस धर्मांतरण और उत्पीड़न’की मुख्य आरोपी निदा खान को मिली जमानत ने एक बार फिर यह साफ किया है कि भारतीय न्याय व्यवस्था में जमानत का निर्णय आरोपों की गंभीरता के साथ-साथ मानवीय परिस्थितियों, जांच की स्थिति और संवैधानिक अधिकारों को ध्यान में रखकर लिया जाता है। अदालत ने गर्भावस्था और अजन्मे बच्चे के हित को प्रमुख आधार माना, जबकि यह भी दर्ज किया कि मामले में आरोपों की न्यायिक जांच अभी बाकी है।

मनीष राज

लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखनऔर पढ़ें



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