UNSC: भारत 8 बार रहा है सुरक्षा परिषद का अस्थाई सदस्य, पहली बार बड़ी चुनौती, मुस्लिम देश करेंगे खेल? – india tajikistan face off unsc non permanent seat election asia pacific group diplomatic battle oic


न्यूयॉर्क: भारत ने 2028-29 के कार्यकाल के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में अस्थायी सीट के लिए अपना अभियान औपचारिक रूप से शुरू कर दिया है। एशिया-पैसिफिक ग्रुप की एकमात्र उपलब्ध सीट के लिए भारत का ताजिकिस्तान के साथ सीधा मुकाबला शुरू हो गया है। जून 2027 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 82वें सत्र के दौरान होने वाला यह चुनाव 193 सदस्यों वाली महासभा में समर्थन जुटाने की नई दिल्ली की क्षमता की परीक्षा लेगा।

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में UNSC के लिए भारत की उम्मीदवारी का अभियान शुरू किया है। इस अभियान की थीम ‘शांति’ (SHANTI) थी जिसका अर्थ है नियमों, भरोसे और ईमानदारी के जरिए हर क्षेत्र में प्रगति सुनिश्चित करना। इसके जरिए भारत को शांति, जिम्मेदार वैश्विक शासन और ‘ग्लोबल साउथ’ यानि विकासशील देशों की मजबूत आवाज के तौर पर पेश किया गया।

UNSC की अस्थाई सीट का कितना महत्व है?

बहुत महत्व है। खासकर ऐसे वक्त में जब यूक्रेन में युद्ध खत्म नहीं हुआ है, मध्य पूर्व में भीषण युद्ध चल रहे हैं और दुनिया की बड़ी शक्तियों के बीच तनाव बरकरार है। दुनिया में अराजकता का माहौल है और एकध्रवीय दुनिया अब बहुध्रुवीय बनने के रास्ते पर है।

ऐसे माहौल में अस्थायी सीट का भी कूटनीतिक रूप से बहुत महत्व होता है। इससे सदस्य देशों को बातचीत की दिशा तय करने, प्रस्तावों पर वोट देने और प्रतिबंधों और आतंकवाद-रोधी मामलों से जुड़ी अहम समितियों की अध्यक्षता करने का मौका मिलता है।

भारत ने अपने अभियान को वैश्विक संस्थाओं में सुधार की अपनी पुरानी मांग से जोड़ा है। भारत का तर्क है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अब आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को नहीं दर्शाती है और वैश्विक स्तर पर फैसले लेने की प्रक्रिया में विकासशील देशों को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।

भारत अगर UNSC का अस्थाई सदस्य बनता है तो क्या होगा?

अगर भारत चुना जाता है तो उसने संकेत दिया है कि वह आतंकवाद से निपटने, शांति सेना में सुधार, नई टेक्नोलॉजी के जिम्मेदार इस्तेमाल, क्लाइमेट जस्टिस, समुद्री सुरक्षा और टिकाऊ विकास को प्राथमिकता देगा।
भारत संयुक्त राष्ट्र के साथ अपने लंबे जुड़ाव पर भी जोर दे रहा है। लगभग 3,00,000 भारतीय कर्मियों ने संयुक्त राष्ट्र के करीब 50 शांति मिशनों में काम किया है जिससे भारत इस संगठन में सबसे ज़्यादा सैनिक भेजने वाले देशों में से एक बन गया है।

शांति सेना के अलावा नई दिल्ली एशिया, अफ्रीका, यूरोप, लैटिन अमेरिका, खाड़ी और प्रशांत क्षेत्र में बुनियादी ढांचे का विकास, हेल्थकेयर, शिक्षा और क्षमता निर्माण से जुड़े प्रोजेक्ट्स के जरिए विकास साझेदारियों को भी दिखा रही है।

अगर भारत चुना जाता है तो 2028–29 का कार्यकाल सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य के तौर पर उसका नौवां कार्यकाल होगा। इससे पहले वह 1950–51, 1967–68, 1972–73, 1977–78, 1984–85, 1991–92, 2011–12 और 2021–22 में सदस्य रह चुका है।

ताजिकिस्तान से भारत को कितनी बड़ी चुनौती?

ताजिकिस्तान को 57 सदस्यीय इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) का ब्लॉक समर्थन प्राप्त माना जा रहा है। लेकिन अच्छी बात ये है कि ‘ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन’ ने सामूहिक रूप से ताजिकिस्तान का समर्थन नहीं किया है। जिसका मतलब है भारत इस्लामिक देशों के ब्लॉक में सेंधमारी कर सकता है।

जयशंकर यही करने की कोशिश भी कर रहे हैं। उन्होंने यूएनएससी की दावेदारी पेश करने से पहले बहरीन और कुवैत जैसे देशों का दौरा भी किया था।

क्या भारत OIC में सेंधमारी कर पाएगा?

इस्लामिक देशों का संगठन OIC कागजों पर एक गुट की तरह दिखता है लेकिन उसमें कई दरार हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN) के गुप्त मतदान में इसके सभी सदस्य देश एक जैसा वोट नहीं डालते। भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था, खाड़ी देशों के साथ गहरे रणनीतिक संबंध और ‘ग्लोबल साउथ’ यानि विकासशील देशों के नेता के रूप में छवि OIC के भीतर दरार पैदा करेगी। कई मुस्लिम देश ताजिकिस्तान के बजाय भारत के साथ जाना पसंद करेंगे।

भारत के साथ कौन-कौन से देश आ सकते हैं?

  • संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के साथ भारत के ऐतिहासिक रूप से सबसे मजबूत आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं। द्विपक्षीय व्यापार और निवेश के कारण ये देश भारत को प्राथमिकता दे सकते हैं।
  • इसके अलावा ओमान, कतर, बहरीन और कुवैत के साथ भारतीय विदेश मंत्रालय पहले ही कूटनीतिक संपर्क साध चुका है।
  • मिस्र के साथ भारत के काफी मजबूत संबंध रहे हैं इसलिए माना जा रहा है कि मिस्र भारत के पक्ष में वोट डाल सकता है।
  • इंडोनेशिया और बांग्लादेश भी एशिया-पैसिफिक क्षेत्र के ये दो सबसे बड़े मुस्लिम-बहुल देश हैं जो भारत के करीबी रणनीतिक और व्यापारिक साझेदार हैं। मोदी ने इसी महीने इंडोनेशिया का दौरा भी किया था।

भारत के साथ वैश्विक महाशक्तियां

अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन के साथ ज्यादातर यूरोपीय देश भारत के पक्ष में मतदान करने वाले हैं। इन देशों ने हमेशा से UNSC में भारत की स्थायी और अस्थायी उम्मीदवारी का खुला समर्थन किया है।
रूस के हालांकि ताजिकिस्तान से अच्छे हैं लेकिन भारत के साथ उसकी ‘विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी’ के कारण वह भारत के पक्ष में जा सकता है।

ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, फिजी और श्रीलंका जैसे देश पहले ही भारत की सदस्यता का समर्थन करने की घोषणा आधिकारिक तौर पर कर चुके हैं।

अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के छोटे देशों के साथ भारत ने ‘वैक्सीन कूटनीति’ और ‘डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर’ जैसे प्रोजेक्ट शुरू किए हैं। भारत इन देशों में कैम्पेन चलाकर इस क्षेत्र में बसे एक बड़े वोट बैंक को अपने पाले में कर सकता है।

ताजिकिस्तान के साथ कौन-कौन से देश आ सकते हैं?

ताजिकिस्तान एक छोटा और लैंडलॉक्ड यानि जमीन से घिरा देश है लेकिन इस रेस में उसका अपना एक मजबूत नेटवर्क है। पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे और अपनी भू-राजनीति के कारण किसी भी कीमत पर भारत को रोकने के लिए ताजिकिस्तान के पक्ष में पूरी ताकत से लॉबिंग करेगा।

वहीं तुर्की और अजरबैजान जैसे देश अक्सर OIC के मंचों पर पाकिस्तान के रुख का समर्थन करते हैं इसलिए इनके ताजिकिस्तान के साथ जाने की पूरी संभावना है।

उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और तुर्कमेनिस्तान जैसे मध्य एशियाई देश ताजिकिस्तान के पड़ोसी देश हैं। ये पड़ोसी देश क्षेत्रीय एकजुटता दिखाने के लिए ताजिकिस्तान का साथ दे सकते हैं।

चीन कर सकता है परदे के पीछे खेल

चूंकि चीन प्रत्यक्ष रूप से भारत की UNSC दावेदारी का विरोध करता रहा है इसलिए वह अफ्रीका और एशिया के उन गरीब देशों पर ताजिकिस्तान को वोट देने का दबाव बना सकता है जो चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के भारी कर्ज तले दबे हैं। चीन अगर ऐसा करने की कोशिश करता है तो भारत को अपना काउंटर प्लान तैयार रखना होगा।

अभिजात शेखर आजाद

लेखक के बारे मेंअभिजात शेखर आजादअभिजात शेखर आजाद नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में इंटरनेशनल अफेयर्स, डिफेंस जर्नलिस्ट हैं। उनके पास अलग अलग न्यूज चैनलों और डिजिटल पत्रकारिता में करीब 17 सालों का अनुभव है। वे अंतरराष्ट्रीय राजनीति (International Politics), वैश्विक कूटनीति (Global Diplomacy) और रक्षा रणनीति (Defense Strategy) के विशेषज्ञ माने जाते हैं। उन्होंने इन वर्षों में 3 अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध, इजरायल-हमास युद्ध, मिडिल ईस्ट, अफगानिस्तान युद्ध, ISIS के खिलाफ संघर्ष, भारत पाकिस्तान संघर्ष जैसे अहम अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं को कवर किया है।

अभिजात शेखर आजाद वैश्विक राजनीति का विश्लेषण करते हैं और भारत पर उसका क्या असर होगा, इसका एनालिसिस करते हुए विश्लेषणात्मक स्टोरी लिखते हैं। इसके अलावा इंटरनेशनल डिफेंस सेक्टर पर उनकी खास नजर होती है। हथियारों की खरीद बिक्री, अंतर्राष्ट्रीय हथियार व्यापार पर वो करीबी नजर रखते हैं। रक्षा जगत में अंदरूनी पहुंच होने की वजह से डिफेंस मामलों पर उनकी सटीक खबरों का काफी प्रभाव है।

विशेषज्ञता- इंटरनेशनल डिप्लोमेसी के साथ साथ डिफेंस सेक्टर की खबरों के विश्लेषण में अच्छी पकड़। भारतीय वायुसेना और नौसेना और डिफेंस इंटेलिजेंस में पैठ। जियो-पॉलिटिक्स को लेकर अभिजात शेखर आजाद के अनुमान अकसर सही साबित होते हैं। उनकी विशेषज्ञता केवल समाचार रिपोर्टिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि वे जटिल अंतरराष्ट्रीय संबंधों को भारतीय दर्शकों के लिए सरल और प्रभावी ढंग से समझाने के लिए जाने जाते हैं। राफेल डील से लेकर अत्याधुनिक मिसाइल टेक्नोलॉजी और वैश्विक शक्ति संतुलन पर सैकड़ों विश्लेषणात्मक लेख।

पत्रकारिता अनुभव: अभिजात शेखर आजाद के पत्रकारिता में करीब 17 सालों का अनुभव है। उन्होंने 2009 से पत्रकारिता में अपना कैरियर शुरू किया था और उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग में अच्छी पकड़ बनाई। उन्होंने समाचार प्लस और ज़ी मीडिया जैसे संस्थानों में काम किया। उन्होंने पश्चिम बंगाल विश्वविद्यालय से अंग्रेजी पत्रकारिता में स्नातक किया है।

पुरस्कार: अभिजात को ज़ी मीडिया में बेहतरीन लेखन के लिए ‘बेस्ट राइटर’ अवार्ड मिल चुका है। इसके अलावा उन्हें दो बार ENBA अवार्ड भी मिला है।

अभिजात के खास इंटरव्यू:
अभिजात शेखर आजाद का ‘बॉर्डर-डिफेंस’ नाम से साप्ताहिक वीडियो इंटरव्यू आता है, जिसमें वो सैन्य अधिकारियों और डिप्लोमेट्स से बात करते हैं। उन्होंने कई बड़े चेहरे जैसे DRDO के वैज्ञानिक और ब्रह्मोस मिसाइल बनाने वाले वैज्ञानिक अतुल दिनकर राणे, डीआरडीओ वैज्ञानिक हरि बाबू चौरसिया, भारतीय सेना के पूर्व आर्मी चीफ वेद मलिक, लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन, लेफ्टिनेंट जनरल संजय वर्मा, एयर मार्शल रवि कपूर, एयर फोर्स अधिकारी विजयेन्द्र के ठाकुर, फाइटर पायलट आरके नारंग, डिप्लोमेट एसडी मुनि, डिप्लोमेट सी उदय भाष्कर, डिप्लोमेट अनिल त्रिगुणायत, डिप्लोमेस रोबिंदर सचदेव, नौसेना कैप्टन श्याम कुमार समेत कई एयरफोर्स और नौसेना अधिकारियों का इंटरव्यू ले चुके हैं।और पढ़ें



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