भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में UNSC के लिए भारत की उम्मीदवारी का अभियान शुरू किया है। इस अभियान की थीम ‘शांति’ (SHANTI) थी जिसका अर्थ है नियमों, भरोसे और ईमानदारी के जरिए हर क्षेत्र में प्रगति सुनिश्चित करना। इसके जरिए भारत को शांति, जिम्मेदार वैश्विक शासन और ‘ग्लोबल साउथ’ यानि विकासशील देशों की मजबूत आवाज के तौर पर पेश किया गया।
UNSC की अस्थाई सीट का कितना महत्व है?
बहुत महत्व है। खासकर ऐसे वक्त में जब यूक्रेन में युद्ध खत्म नहीं हुआ है, मध्य पूर्व में भीषण युद्ध चल रहे हैं और दुनिया की बड़ी शक्तियों के बीच तनाव बरकरार है। दुनिया में अराजकता का माहौल है और एकध्रवीय दुनिया अब बहुध्रुवीय बनने के रास्ते पर है।
ऐसे माहौल में अस्थायी सीट का भी कूटनीतिक रूप से बहुत महत्व होता है। इससे सदस्य देशों को बातचीत की दिशा तय करने, प्रस्तावों पर वोट देने और प्रतिबंधों और आतंकवाद-रोधी मामलों से जुड़ी अहम समितियों की अध्यक्षता करने का मौका मिलता है।
भारत ने अपने अभियान को वैश्विक संस्थाओं में सुधार की अपनी पुरानी मांग से जोड़ा है। भारत का तर्क है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अब आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को नहीं दर्शाती है और वैश्विक स्तर पर फैसले लेने की प्रक्रिया में विकासशील देशों को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
भारत अगर UNSC का अस्थाई सदस्य बनता है तो क्या होगा?
अगर भारत चुना जाता है तो उसने संकेत दिया है कि वह आतंकवाद से निपटने, शांति सेना में सुधार, नई टेक्नोलॉजी के जिम्मेदार इस्तेमाल, क्लाइमेट जस्टिस, समुद्री सुरक्षा और टिकाऊ विकास को प्राथमिकता देगा।
भारत संयुक्त राष्ट्र के साथ अपने लंबे जुड़ाव पर भी जोर दे रहा है। लगभग 3,00,000 भारतीय कर्मियों ने संयुक्त राष्ट्र के करीब 50 शांति मिशनों में काम किया है जिससे भारत इस संगठन में सबसे ज़्यादा सैनिक भेजने वाले देशों में से एक बन गया है।
शांति सेना के अलावा नई दिल्ली एशिया, अफ्रीका, यूरोप, लैटिन अमेरिका, खाड़ी और प्रशांत क्षेत्र में बुनियादी ढांचे का विकास, हेल्थकेयर, शिक्षा और क्षमता निर्माण से जुड़े प्रोजेक्ट्स के जरिए विकास साझेदारियों को भी दिखा रही है।
अगर भारत चुना जाता है तो 2028–29 का कार्यकाल सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य के तौर पर उसका नौवां कार्यकाल होगा। इससे पहले वह 1950–51, 1967–68, 1972–73, 1977–78, 1984–85, 1991–92, 2011–12 और 2021–22 में सदस्य रह चुका है।
ताजिकिस्तान से भारत को कितनी बड़ी चुनौती?
ताजिकिस्तान को 57 सदस्यीय इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) का ब्लॉक समर्थन प्राप्त माना जा रहा है। लेकिन अच्छी बात ये है कि ‘ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन’ ने सामूहिक रूप से ताजिकिस्तान का समर्थन नहीं किया है। जिसका मतलब है भारत इस्लामिक देशों के ब्लॉक में सेंधमारी कर सकता है।
जयशंकर यही करने की कोशिश भी कर रहे हैं। उन्होंने यूएनएससी की दावेदारी पेश करने से पहले बहरीन और कुवैत जैसे देशों का दौरा भी किया था।
क्या भारत OIC में सेंधमारी कर पाएगा?
इस्लामिक देशों का संगठन OIC कागजों पर एक गुट की तरह दिखता है लेकिन उसमें कई दरार हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN) के गुप्त मतदान में इसके सभी सदस्य देश एक जैसा वोट नहीं डालते। भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था, खाड़ी देशों के साथ गहरे रणनीतिक संबंध और ‘ग्लोबल साउथ’ यानि विकासशील देशों के नेता के रूप में छवि OIC के भीतर दरार पैदा करेगी। कई मुस्लिम देश ताजिकिस्तान के बजाय भारत के साथ जाना पसंद करेंगे।
भारत के साथ कौन-कौन से देश आ सकते हैं?
- संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के साथ भारत के ऐतिहासिक रूप से सबसे मजबूत आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं। द्विपक्षीय व्यापार और निवेश के कारण ये देश भारत को प्राथमिकता दे सकते हैं।
- इसके अलावा ओमान, कतर, बहरीन और कुवैत के साथ भारतीय विदेश मंत्रालय पहले ही कूटनीतिक संपर्क साध चुका है।
- मिस्र के साथ भारत के काफी मजबूत संबंध रहे हैं इसलिए माना जा रहा है कि मिस्र भारत के पक्ष में वोट डाल सकता है।
- इंडोनेशिया और बांग्लादेश भी एशिया-पैसिफिक क्षेत्र के ये दो सबसे बड़े मुस्लिम-बहुल देश हैं जो भारत के करीबी रणनीतिक और व्यापारिक साझेदार हैं। मोदी ने इसी महीने इंडोनेशिया का दौरा भी किया था।
भारत के साथ वैश्विक महाशक्तियां
अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन के साथ ज्यादातर यूरोपीय देश भारत के पक्ष में मतदान करने वाले हैं। इन देशों ने हमेशा से UNSC में भारत की स्थायी और अस्थायी उम्मीदवारी का खुला समर्थन किया है।
रूस के हालांकि ताजिकिस्तान से अच्छे हैं लेकिन भारत के साथ उसकी ‘विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी’ के कारण वह भारत के पक्ष में जा सकता है।
ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, फिजी और श्रीलंका जैसे देश पहले ही भारत की सदस्यता का समर्थन करने की घोषणा आधिकारिक तौर पर कर चुके हैं।
अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के छोटे देशों के साथ भारत ने ‘वैक्सीन कूटनीति’ और ‘डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर’ जैसे प्रोजेक्ट शुरू किए हैं। भारत इन देशों में कैम्पेन चलाकर इस क्षेत्र में बसे एक बड़े वोट बैंक को अपने पाले में कर सकता है।
ताजिकिस्तान के साथ कौन-कौन से देश आ सकते हैं?
ताजिकिस्तान एक छोटा और लैंडलॉक्ड यानि जमीन से घिरा देश है लेकिन इस रेस में उसका अपना एक मजबूत नेटवर्क है। पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे और अपनी भू-राजनीति के कारण किसी भी कीमत पर भारत को रोकने के लिए ताजिकिस्तान के पक्ष में पूरी ताकत से लॉबिंग करेगा।
वहीं तुर्की और अजरबैजान जैसे देश अक्सर OIC के मंचों पर पाकिस्तान के रुख का समर्थन करते हैं इसलिए इनके ताजिकिस्तान के साथ जाने की पूरी संभावना है।
उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और तुर्कमेनिस्तान जैसे मध्य एशियाई देश ताजिकिस्तान के पड़ोसी देश हैं। ये पड़ोसी देश क्षेत्रीय एकजुटता दिखाने के लिए ताजिकिस्तान का साथ दे सकते हैं।
चीन कर सकता है परदे के पीछे खेल
चूंकि चीन प्रत्यक्ष रूप से भारत की UNSC दावेदारी का विरोध करता रहा है इसलिए वह अफ्रीका और एशिया के उन गरीब देशों पर ताजिकिस्तान को वोट देने का दबाव बना सकता है जो चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के भारी कर्ज तले दबे हैं। चीन अगर ऐसा करने की कोशिश करता है तो भारत को अपना काउंटर प्लान तैयार रखना होगा।
